दलबदल की बढ़ती प्रवृत्ति वोटर के बीच नेता की विश्वसनीयता के लिए घातक

नेताओं के बीच दलबदल जितना सहज और सरल हो गया है, वोटर के लिए नेता उतना ही अविश्वसनीय होता जा रहा है. किसी भी स्तर का चुनाव जीतने के बाद नेताओं के रहन-सहन में जो बदलाव लाता है, वह वोटर की निगाह से बच नहीं पाता. इसका असर विभिन्न स्तर के चुनावों में वोटिंग परसेंटेज में गिरावट के तौर देखा जा सकता है.

Source: News18Hindi Last updated on: August 10, 2022, 12:19 pm IST
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Opinion: दलबदल की बढ़ती प्रवृत्ति वोटर के बीच नेता की विश्वसनीयता के लिए घातक
दल बदल की प्रवृत्ति से नेताओं के प्रति वोटर के मन में विश्‍वास का संकट गहराना लोकतंत्र के लिए खतरा.

मध्यप्रदेश में हाल ही में संपन्न हुए स्थानीय निकायों के चुनाव के बाद ऐसे दृश्य बड़ी संख्या में देखने को मिले हैं, जिसमें जीत का प्रमाण पत्र मिलने के बाद निर्वाचित प्रतिनिधि ने उस दल को छोड़ दिया, जिसके सिंबल पर वह चुना गया. भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही राजनीतिक दलों को अपने नव निर्वाचित जन प्रतिनिधियों को पाले में बनाए रखने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ी. चुनाव के तत्काल बाद जिस तरह से निर्वाचित प्रतिनिधियों ने दलबदल किया उसके बाद वोटर की बीच उसकी छवि पर भी विपरीत असर पड़ा है. दल बदल की बढ़ती प्रवृति लोकतंत्र के लिए भी घातक मानी जा रही है.


नगरीय निकाय में दल बदल रोकने कोई कानून नहीं है


देश के किसी भी राज्य में ऐसा कोई कानून नहीं है जो स्थानीय निकायों के निर्वाचित जन प्रतिनिधियों को दलबदल करने से रोकता हो. अभी सांसद और विधायकों के दलबदल को रोकने वाला ही कानून देश में लागू है. इसके बाद भी देश में बढ़ी संख्या में विधायक दल बदल करते देखे जा सकते हैं. कई राज्यों में बहुमत वाली सरकारें दल बदल के कारण अल्पमत में आईं. बाद में उस दल की सरकार बनी जिसे जनता ने सरकार बनाने का जनादेश नहीं दिया था. कर्नाटक और मध्यप्रदेश में भी विधायकों के इस्तीफे दिए जाने के कारण सरकारें अल्पमत में आईं. मौजूदा दल बदल कानून विधायकों को इस्तीफा देने से नहीं रोकता है.


सैद्धांतिक  तौर पर भी देखा जाए तो सांसद अथवा विधायक के तौर पर निर्वाचित व्यक्ति यदि इस्तीफा देकर दूसरे दल में शामिल होता है तो वह गलत नहीं माना जा सकता. विधायकों और सांसदों के दल बदल में अब यही पैटर्न देखने को मिल रहा है. लेकिन, निकायों के प्रतिनिधि दल को छोड़े बगैर ही क्रॉस वोटिंग के जरिए अपनी प्रतिष्ठा को दांव पर लगा रहे हैं.


पार्षदों के दल बदल से सत्ताधारी दल को भी लगी चोट

मध्यप्रदेश के नगरीय निकाय के चुनाव के बाद पार्षदों की घेराबंदी भी उसी तरह हो रही थी, जिस तरह सरकार बनाने और गिराने के लिए विधायकों की जाती है. मध्यप्रदेश में नगरीय निकाय के चुनाव की दो अलग-अलग व्यवस्था लागू हैं. नगर निगम में महापौर का चुनाव जनता सीधे करती है. जबकि नगर परिषद में अध्यक्ष का चुनाव पार्षदों द्वारा किया जाता है.


मध्यप्रदेश के अधिकांश बड़े शहरों में भारतीय जनता पार्टी के निर्वाचित पार्षदों की संख्या ज्यादा है. लेकिन, कुछ स्थानों पर महापौर कांग्रेस का निर्वाचित हुआ अथवा निर्दलीय या अन्य दल के उम्मीदवार को जीत मिली. परिषद के सभापति का चुनाव पार्षदों द्वारा किया जाता है. सभापति के चुनाव के अलावा नगर परिषद के अध्यक्ष के चुनाव में भी राजनीतिक दलों को अपने पार्षदों की घेराबंदी करना पड़ी. इसके बाद भी कई स्थानों पर बहुमत के बाद भी राजनीतिक दल अपना अध्यक्ष अथवा सभापति निर्वाचित नहीं करा सके.


सबसे बढ़िया उदाहरण शिवपुरी जिले की पिछोर नगर पालिका परिषद का है. यहां बहुमत भाजपा का था लेकिन, पार्षदों ने अध्यक्ष कांग्रेस का चुना. यह उदाहरण इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि क्रॉस वोटिंग कांग्रेस के पक्ष में हुई. जबकि देश में सरकारें गिराने और दल बदल कराने के सबसे ज्यादा आरोप भारतीय जनता पार्टी पर लग रहे हैं. राष्ट्रपति के चुनाव में भी मध्यप्रदेश में कांग्रेस के विधायकों की ओर से क्रॉस वोटिंग हुई थी.


नेताओं की विश्वसनीयता घटाने में दल बदल की भूमिका का असर

नेताओं के बीच दलबदल जितना सहज और सरल हो गया है, वोटर के लिए नेता उतना ही अविश्वसनीय होता जा रहा है. यद्यपि आजादी के बाद से ही नेताओं की छवि पर सवाल खडे होते रहे हैं. जन सेवा का भाव ही नेताओं के एजेंडे से गायब होता जा रहा है. किसी भी स्तर का चुनाव जीतने के बाद नेताओं के रहन-सहन में जो बदलाव लाता है,वह वोटर की निगाह से बच नहीं पाता. देश में लगातार दल बदल की घटनाओं के साथ नेताओं के व्यक्तिगत हित की चर्चा भी व्यापक तौर पर होती है. असर विभिन्न स्तर के चुनाव में वोटिंग परसेंटेज में गिरावट के तौर देखा जा सकता है.


मध्यप्रदेश के हाल ही में संपन्न हुए नगरीय निकाय के चुनाव में साठ प्रतिशत से भी कम वोटिंग ने नेताओं की नींद उड़ा दी थी. नेताओं की घटती विश्वसनीयता के कारण ही वोटिंग मशीन में नोटा का बटन जुड़ने को बड़ा कारण माना गया था. कई चुनावों में तो नोटा के खाते में आए वोटों से हार-जीत का गणित बदलते देखा गया.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
दिनेश गुप्ता

दिनेश गुप्ता

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ आपका जुड़ाव रहा है.

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First published: August 10, 2022, 12:19 pm IST