भाजपाइयों से दादी और पिता के रिश्ते से कैसे आसान हो रही है ज्योतिरादित्य सिंधिया की राह

ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) के भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने के बाद राज्य की सियासत पूरी तरह से बदल गई है. सबसे ज्यादा असर भारतीय जनता पार्टी की आतंरिक राजनीति में देखने को मिल रहा है. सिंधिया अपने हजारों समर्थकों के साथ भाजपा में शामिल हुए हैं. भाजपा में शामिल होने से पहले सिंधिया समर्थक 19 विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था.

Source: News18Hindi Last updated on: July 16, 2020, 4:08 PM IST
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भाजपाइयों से दादी और पिता के रिश्ते से कैसे आसान हो रही है ज्योतिरादित्य सिंधिया की राह
भाजपा में सिंधिया का बदला हुआ रूप सभी को चौंका रहा है. (File)
ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chauhan) के साथ चुनावी सभाओं का शंखनाद कर दिया है. शिवराज सिंधिया की जोड़ी का पहला सार्वजनिक कार्यक्रम हाटपिपलिया में हुआ. मौका कैलाश जोशी की प्रतिमा के अनावरण का था. सिंधिया अपनी दादी विजयाराजे सिंधिया और पिता माधवराव सिंधिया (Madhavrao Scindia) के प्रति पुराने भाजपाइयों के सम्मान का सिरा पकड़कर अपनी नई राजनीतिक पारी शुरू कर रहे हैं. सिंधिया सार्वजनिक रूप से भी पुराने रिश्तों का हवाला देने से नहीं चूक रहे हैं. भाजपा (BJP) में सिंधिया का बदला हुआ रूप सभी को चौंका रहा है.

शिवराज सिंह चौहान के विरोधियों की नजर में सिंधिया

ज्योतिरादित्य सिंधिया के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद राज्य की सियासत पूरी तरह से बदल गई है. सबसे ज्यादा असर भारतीय जनता पार्टी की आतंरिक राजनीति में देखने को मिल रहा है. सिंधिया अपने हजारों समर्थकों के साथ भाजपा में शामिल हुए हैं. भाजपा में शामिल होने से पहले सिंधिया समर्थक 19 विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. इन इस्तीफों के कारण ही कमलनाथ की सरकार अल्पमत आ गई थी. इसका लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिला. मात्र पंद्रह माह में भाजपा की सत्ता में वापसी हो गई. पार्टी के सत्ता में वापस आ जाने से भाजपा विधायकों में मंत्री बनने की लालसा जागना स्वभाविक है लेकिन,शीर्ष नेतृत्व की रणनीति के कारण गैर विधायकों को मंत्रिमंडल में जगह मिली. इस कारण कई वरिष्ठ विधायकों की नाराजगी सामने आई. अजय विश्नोई ने कैबिनेट विस्तार में जबलपुर और रीवा संभाग की अनदेखी पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को एक पत्र लिखकर अपनी नाराजगी प्रकट की. ग्वालियर में जयभान सिंह पवैया भी ऐसे ट्वीट कर रहे हैं,जो पार्टी लाइन के अनुसार नहीं हैं. पवैया ने ग्वालियर में सिंधिया विरोध की राजनीति की है. सिंधिया के साथ प्रद्युमन सिंह तोमर के भाजपा में आ जाने से पवैया को अपनी राजनीतिक संभावनाएं कमजोर दिखाई दे रही हैं. ग्वालियर की राजनीति में केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर भी पवैया के खिलाफ हैं.

शिवराज सिंह चौहान से अलग नहीं दिखना चाहते हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया ?
भारतीय जनता पार्टी के भीतर भी कई गुट हैं. लगभग ढाई दशक तक सुंदरलाल पटवा और कैलाश जोशी के बीच भारतीय जनता पार्टी बंटी रही. पार्टी के पितृ पुरूष कहे जाने वाले कुशाभाऊ ठाकरे की मेहरबानी सुंदरलाल पटवा पर अधिक रही है. पटवा गुट पार्टी में सबसे मजबूत गुट माना जाता था. 90 के दशक की भाजपा की गुटबाजी को मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बेहद करीब से देख चुके हैं. पीएम मोदी मध्य प्रदेश के प्रभारी महामंत्री रह चुके हैं. शिवराज सिंह चौहान भी सुंदरलाल पटवा के करीबी माने जाते रहे हैं. पटवा के कारण ही शिवराज सिंह चौहान ने दीपक जोशी को मंत्रिमंडल में देर से जगह दी. सुरेन्द्र पटवा जबकि दीपक जोशी से जूनियर हैं. दीपक जोशी मंत्री तब ही बना पाए, जब सुरेन्द्र पटवा का नंबर लग गया. इन दिनों दीपक जोशी के तेवर बदले हुए हैं. कांग्रेस से भाजपा में आए मनोज चौधरी उनकी नाराजगी की वजह हैं. चौधरी ने ही दीपक जोशी को हाटपिपलिया विधानसभा क्षेत्र से चुनाव हराया था. सिंधिया ने मंगलवार को शिवराज सिंह चौहान के साथ इस क्षेत्र का चुनावी दौरा शुरू किया. दौरे की शुरूआत बागली में कैलाश जोशी की मूर्ति अनावरण से की. बागली को जिला बनाने की दीपक जोशी की मांग के साथ वे खड़े दिखाई दिए. मुख्यमंत्री चौहान ने बागली को जिला बनाने की मांग तत्काल मान भी ली. कैलाश जोशी को विजयाराजे सिंधिया व्यक्तिगत तौर पर पसंद करतीं थीं. जोशी को राजनीति का संत कहा जाता रहा है. सिंधिया अनावरण कार्यक्रम में इस बात का उल्लेख करना नहीं भुले कि कैलाश जोशी से उनके पारिवारिक रिश्ते कैसे रहे हैं?

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माधवराव सिंधिया के पहले चुनाव में संचालक थे मोघेज्योतिरादित्य सिंधिया ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं को बहुत करीब से देखा है, लेकिन तब वे राजनीति में नहीं थे. ग्वालियर के जयविलास पैलेस में दादी विजयाराजे सिंधिया से मिलने जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयं संघ के कई बड़े नेता आते रहते थे. पिता माधवराव सिंधिया के कांग्रेस में होने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी के कई नेता नियमित तौर पर उनसे मिला करते थे. पूर्व सांसद कृष्ण मुरारी मोघे भी उनमें एक हैं. पिछले दिनों भोपाल में भाजपा मुख्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में जब ज्योतिरादित्य सिंधिया जब कृष्ण मुरारी मोघे को बैठे देखा तो वे मंच से उतर कर सीधे उनके पास चले गए. सिंधिया,मोघे का हाथ पकड़कर मंच पर ले आए. सिंधिया ने भाजपा कार्यकर्ताओं को बताया कि मोघे से उनका पुराना पारिवारिक रिश्ता है. मोघे इस बात की पुष्टि करते हुए कहते हैं कि ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया ने पहला चुनाव जनसंघ के टिकट पर लड़ा था. उस वक्त वे गुना में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जिला प्रचारक थे. माधवराव सिंधिया के चुनाव का संचालन मोघे ने ही किया था. मोघे की तरह ही पूर्व केन्द्रीय मंत्री सत्यनारायण जटिया भी सिंधिया परिवार के करीबी माने जाते रहे हैं.

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उमा भारती से मिलने पहुंचे ज्योतिरादित्य तो पंड़ितों ने किया स्वास्ति वाचन

भारतीय जनता पार्टी में उमा भारती भी उन नेताओं में हैं जिनका ग्वालियर के महल से सीधा जुड़ाव है. वर्ष 2003 में उमा भारती के नेतृत्व में ही भारतीय जनता पार्टी ने दस साल बाद सत्ता में वापसी की थी. उन्हें राजनीति में लाने का श्रेय विजयाराजे सिंधिया को ही है. पिछले दिनों सिंधिया जब भोपाल आए तो वे एयरपोर्ट से सीधे उमा भारती से मिलने उनके बंगले पर पहुंच गए. सिंधिया के साथ वे नवनियुक्त मंत्री भी थे, जो कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए हैं. उमा भारती ने उनके स्वागत में पंड़ितों को बुलाकर स्वास्ति वाचन कराया. सिंधिया ने इस मुलाकात पर कहा कि उनके पुराने पारिवारिक रिश्ते हैं. यद्यपि उमा भारती और शिवराज सिंह चौहान के राजनीतिक रिश्ते बहुत अच्छे नहीं हैं. ताजा मामला मंत्रिमंडल के विस्तार का है. उमा भारती उनके सुझावों की अनदेखा किए जाने पर शिवराज सिंह चौहान और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा को पत्र लिखकर नाराजगी प्रकट कर चुकी हैं. सिंधिया की उमा भारती से मुलाकात को इसी नाराजगी से जोड़कर देखा जा रहा है. सिंधिया से अपनी मुलाकात पर उमा भारती ने कहा कि ''मध्य प्रदेश में चाहे कांग्रेस या फिर बीजेपी की सरकारें रही हों, मेरा संपर्क हमेशा से सिंधिया परिवार से रहा है''

ग्वालियर-चंबल की राजनीति के केन्द्र हैं सिंधिया
ग्वालियर-चंबल की राजनीति पूरी तरह से सिंधिया परिवार के ईदगिर्द ही घूमती है. इस अंचल में ऐसे बहुत से नेता हैं, जो सिंधिया विरोध की राजनीति का रास्ता पकड़कर आगे बढ़े हैं. पूर्व मंत्री जयभान सिंह पवैया अभी भी सिंधिया पर हमले का मौका नहीं छोड़ते. हाल ही में उन्होंने भाजपा के मंत्रियों के रानी लक्ष्मीबाई की समाधी पर न जाने को लेकर तंज भी कसा, लेकिन कोई समर्थन उन्हें हासिल नहीं हो सका. अंचल में केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर भाजपा के बड़े चेहरे के तौर पर देखे जाते हैं, लेकिन महल के विरोध में कोई बयान कभी नहीं दिया. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे अनूप मिश्रा भी महल विरोधी नहीं माने जाते. यद्यपि इन नेताओं के रिश्ते यशोधरा राजे सिंधिया से कभी भी अच्छो नहीं रहे. यशोधरा राजे सिंधिया राज्य की खेल मंत्री है. वे ज्योतिरादित्य सिंधिया की बुआ हैं. राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया इस अंचल की राजनीति में कोई दखल नहीं देती हैं.
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First published: July 16, 2020, 3:53 PM IST
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