OPINION: टाइगर स्टेट का तमगा क्यों नहीं संभाल पाता मध्यप्रदेश?

मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) के जंगलों में टाइगर (Tiger) सुरक्षित क्यों नहीं है, इस पर चिंता की कोई लकीर नेताओं के चेहरे पर दिखाई नहीं दी. मध्य प्रदेश टाइगर स्टेट है. यहां सबसे ज्यादा खतरे में भी टाइगर हैं.

Source: News18 Madhya Pradesh Last updated on: July 5, 2020, 10:24 AM IST
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OPINION: टाइगर स्टेट का तमगा क्यों नहीं संभाल पाता मध्यप्रदेश?
टाइगर के संरक्षण में हो रही लापरवाही चिंताजनक है.
ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा खुद को टाइगर बताए जाने के बाद मध्यप्रदेश के नेताओं की जुवां वन्य प्राणियों और जानवरों का जिक्र करते थम नहीं रही. पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ शादी के घोड़े और रेस के घोड़े का जिक्र कर रहे हैं तो उनके मंत्रिमंडल में वन मंत्री रहे उमंग सिंघार आस्तीन तक पहुंच गए. दिग्विजय सिंह खुद को शेर का शिकारी बता रहे हैं. मध्यप्रदेश के जंगलों टाइगर सुरक्षित क्यों नहीं है, इस पर कोई चिंता की लकीर इन नेताओं के चेहरे पर दिखाई नहीं दी. मध्यप्रदेश टाइगर स्टेट है. सबसे ज्यादा खतरे में भी टाइगर हैं. इसके संरक्षण में हो रही लापरवाही चिंताजनक है. जून माह में ही बांधवगढ़ में दो नर शावकों की मौत हुई है. ये पंद्रह से बीस दिन के ही थे. वर्चस्व स्थापित करने किसी नर बाघ ने इनकी जान ले ली. अप्रैल में ही आठ बाघों की मौत हुई थी.

इसलिए मिला था टाइगर स्टेट का दर्जा
पिछले साल इंटरनेशनल टाइगर डे पर ऑल इंडिया टाइगर एस्टिमेशन 2018 की रिपोर्ट जारी की थी. इस रिपोर्ट में सबसे ज्यादा 526 टाइगर मध्यप्रदेश में होने के आधार पर टाइगर स्टेट का तमगा दिया गया था. दूसरा नंबर कर्नाटक का था. कर्नाटक में 524 टाइगर की गिनती हुई थी. मध्यप्रदेश को टाइगर स्टेट का दर्जा वापस पाने में नौ साल से ज्यादा का वक्त लग गया था. पिछली बार 2010 टाइगर की संख्या का जो आकलन किया गया था, उसमें भी मध्यप्रदेश पहले नंबर पर था, लेकिन, 2014 की जनगणना में कर्नाटक टाइगर स्टेट का तमगा हासिल करने में सफल रहा था. लंबे समय बाद मध्यप्रदेश को मिले टाइगर स्टेट के दर्जे को तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने अपनी बढ़ी उपलिब्ध के तौर पर प्रचारित किया था. राज्य की टाइगर स्टेट के तौर पर ब्रांडिंग भी की थी.

बाघों की मौत ने चौंकाया
मध्यप्रदेश में कुल छह टाइगर सफारी हैं. टाइगर एस्टिमेशन 2018 की रिपोर्ट जब जारी की जा रही थी,उसी दौरान कुछ बाद्यों के मारे जाने की सूचना ने लोगों को चौंका दिया था. प्रदेश में बाघ संरक्षण के लिहाज से पेंच सबसे सुरक्षित अभ्यारण्य माना गया है. दूसरा नंबर कान्हा का आता है। सतपुड़ा टाइगर रिर्जव तीसरे नंबर पर है. वर्ष 2014 में बाघ संरक्षण के मामले में कान्हा टाइगर रिजर्व पहले नंबर पर था, लेकिन बाघों की लगातार मौत के कारण वह एक पायदान नीचे चला गया. टाइगर एस्टिमेशन 2018 के परिणाम घोषित होने के दो दिन बाद ही बांधवगढ़ नेशनल पार्क में 3 बाघों की मौत हो गई. टाइगर रिजर्व में एक बाघिन, उसके नौ माह के शावक और एक अन्य बाघ के शव मिले थे.

14 बाघों की मौत का रहस्य अभी भी बरकरार
पर्यटन के लिहाज से बाघों की संख्या महत्वपूर्ण होने के बाद प्रदेश सरकार इनकी सुरक्षा को लेकर गंभीर दिखाई नहीं देती. केन्द्र सरकार द्वारा वर्ष 2019 में बाघों की मौत के जो आकंडे जारी किए थे, उसमें अकेले मध्यप्रदेश में 28 मौतें होना बताया गया था. यह संख्या पूरे देश में सबसे ज्यादा है. रिपोर्ट में सात बाघों की मौत सामान्य बताई गई थी. जबकि सात का शिकार किया गया. 14 बाघों की मौत का कारण स्पष्ट नहीं हुआ. मध्यप्रदेश सरकार में वन विभाग के अपर मुख्य सचिव रहे रिटायर्ड आईएएस अधिकारी प्रशांत मेहता कहते हैं कि बाघ संरक्षण की दिशा में अभी और काम किए जाने की आवश्यकता है.मौत के पीछे दिए ये तर्क
मध्यप्रदेश के जंगलों में शिकारियों की गतिविधियों को सरकार भी विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में स्वीकार कर चुकी है. सरकार ने अपने जवाब में बताया था कि दिसंबर 2018 से 27 जून 2019 के बीच कुल 17 बाघों की मौत हुई. इसमें तीन की मौत शिकार के कारण हुई. पांच बाघ करंट लगने के कारण मारे गए. बाकी बाघों की मौत आपसी लड़ाई या फिर प्राकृतिक कारणों से होना बताया गया.

तस्करी के केन्द्र बना जबलपुर
मध्यप्रदेश का जबलपुर शहर वन्य प्राणियों के अंगों की तस्करी बड़े केन्द्र के तौर पर उभर कर सामने आ रहा है. जबलपुर के केन्द्र बनने की वजह इसकी भौगोलिक स्थिति है. राज्य के लगभग सभी टाइगर रिजर्व अभ्यारण्य तक जाना जबलपुर से काफी आसान होता है. वन्य जीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो ने वर्ष 2019 में शहर एवं आसपास के क्षेत्रों में वन्य प्राणियों के अंगों की तस्करी के कई मामले पकड़े है. ब्यूरो एवं सहयोगी टीमों ने हाल ही के माहों में मध्य प्रदेश एवं दूसरे राज्यों में 8 मामले में पकड़े. इनमें सर्वाधिक मामले जबलपुर एवं आसपास के क्षेत्रों के थे. जबलपुर के तस्करी का केन्द्र बन जाने के कारण ही यहां टाइगर स्ट्राइक फोर्स (टीएसएफ)का क्षेत्रीय कार्यालय खोला गया. वन विभाग के रिटायर्ड सीसीएफ ओपी तिवारी के अनुसार शिकार के बाद तस्कर कई लोगों का नेटवर्क बनाकर वन्य प्राणियों के अंगों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाते हैं. वे शहर को अपना रूट बनाते हैं, जहां धर-पकड़ करने वालों की नजर न पड़ रही हो. बाघ तेंदुए के बाद पेंगोलिन पर शिकारियों की नजर लगी है.

छोटा मुन्ना को नहीं खोज पा रहे वन अफसर
छोटा मुन्ना अर्थात टी-29 वन विभाग के अफसरों को खोजने पर भी नहीं मिल पा रहा है. 23 अक्टूबर 2019 से लापता है. आठ माह बाद भी कान्हा पार्क में लगे कैमरों में यह दिखाई नहीं दिया है. वन विभाग के अफसर खुलकर तो कुछ नहीं बोल रहे,लेकिन इस आशंका से भी इंकार नहीं कर रहे कि छोटा मुन्ना शायद शिकारियों के हत्थे चढ़ गया है. छोटा मुन्ना की तलाश पेंच और अचानकमार कॉरिडोर में भी की गई. अक्टूबर में जब छोटा मुन्ना गायब हुआ था, तब पार्क के कोर जोन में पर्यटकों ने हथियार बंद आधा दर्जन लोगों की मौजूदगी पाई थी. कॉरिडोर के जंगलों में लगे ट्रैप कैमरों में जनवरी से अप्रैल तक की वाइल्ड एनीमल की तस्वीरों का भी टी-29 से मिलान किया गया, पर 130 तस्वीरों में भी छोटा मुन्ना की झलक देखने नहीं मिली. अनुमान यह भी लगाया जा रहा है छोटा मुन्ना छत्तीसगढ़ के जंगलों में भी जा सकता है. छोटा मुन्ना के पिता का नाम बड़ा मुन्ना है। इसकी खास पहचान है. नंबर टी-17 है. इसके माथे पर अंगे्रजी में कैट लिखा हुआ है। इसे कुछ दिन पहले भोपाल के वन विहार में लाया गया है.

टाइगर की राजनीति में वन्य प्राणियों की चर्चा
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने टाइगर एस्टिमेशन 2018 की रिपोर्ट जारी करते हुए कहा था कि टाइगर जिंदा है कह देने से अकेले कम नहीं चलेगा. उनकी चिंता बाघों के बढ़ते शिकार को लेकर थी. राजनीति में टाइगर जिंदा है को जुमले की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा है. मध्यप्रदेश में जब कमलनाथ की सरकार आई तो सबसे पहले शिवराज सिंह चौहान ने अपनी विपक्षी नेता के तौर पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने के लिए इस जुमले का उपयोग किया था. हाल ही में जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के आरोपों का जवाब इस जुमले से दिया तो पूरी कांग्रेस हमलवार हो गई. वन्य प्राणियों और जानवरों का जिक्र जुमले के तौर पर किया जाने लगा.

जुमले और राजनीति
राज्य के पूर्व वन मंत्री उमंग सिंघार ने तो अपने ट्वीट में आस्तीन का जिक्र कर हमला बोला. कमलनाथ ने शादी के घोड़े और रेस घोड़े के साथ कागजी घोडे को भी नहीं छोड़ा. दिग्विजय सिंह भी कहा पीछे रहने वाले थे. उन्होंने कहा कि वे माधवराव सिंधिया के साथ जगंल में जाकर शेरों का शिकार कर चुके हैं. वन्य प्राणी संरक्षण कानून आने के बाद शेर को सिर्फ कैमरे में उतारते हैं. दिग्विजय सिंह के बयान पर कटाक्ष करते हुए भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा ने कहा कि प्रदेश में टाइगर की संख्या 2003 के बाद तब ही बढ़ पाई जब भाजपा सरकार में आ गई. शर्मा बोले 10 साल दिग्विजय सिंह की सरकार रही और उसकी वजह से 2006 में हमारे यहां टाइगर की संख्या में बहुत तेजी से गिरावट आई. बात ज्यादा बढ़ी तो सिंधिया ने कमलनाथ और दिग्विजय सिंह को निशाने पर लेते हुए कहा कि जब तक सत्ता थी तो उसे नोचने में लगे रहते थे. मैं सही बात कहता हूं तो अब मुझ पर चील की तरह नजर रखे हुए हैं. उन्हें चील की तरह नोचने में आनंद आता है तो अच्छा है. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं)
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First published: July 5, 2020, 8:39 AM IST
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