चुनाव प्रक्रिया को रोकने अन्य राज्यों के लिए उदाहरण बनेगा मध्यप्रदेश!

ओबीसी राजनीति के लिए मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र ने जिस तरह से चुनाव प्रक्रिया को रोका है,इस तरह की कार्यवाही पहले कभी देखने को नहीं मिली. निकाय चुनाव के लिए जिन भी राज्य सरकारों ने स्वतंत्र चुनाव आयोग की स्थापना की है,उसकी प्रक्रिया में दखल का कानूनी प्रावधान नहीं है. दखल के लिए मध्यप्रदेश की सरकार ने पंचायती राज कानून में संशोधन के लिए अध्यादेश का सहारा लिया.

Source: News18Hindi Last updated on: December 30, 2021, 4:41 pm IST
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चुनाव प्रक्रिया को रोकने अन्य राज्यों के लिए उदाहरण बनेगा मध्यप्रदेश!  



ध्यप्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की प्रक्रिया वोटिंग से मात्र नो दिन पहले रोक दिए जाने से अब हमेशा चुनाव को लेकर संदेह बने रहने की संभावना बढ़ गई है. चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद उसमें हस्तक्षेप सुप्रीम कोर्ट भी नहीं करता है. लेकिन, ओबीसी आरक्षण के मुद्दे से राजनीतिक दलों को चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का अवसर मिल गया है. इस बात से भी अब इंकार नहीं किया जा सकता कि मध्यप्रदेश का उदाहरण देकर अन्य राज्य भी कानूनी अड़चन पैदा कर चुनाव प्रक्रिया को रोकने की कोशिश करेंगे. इसी तरह महाराष्ट्र ने भी निकाय चुनाव रोके हैं.



आरक्षण में भी है रोटेशन प्रणाली

संविधान के 73 वें और 74 वें संविधान संशोधन में स्थानीय निकायों को सशक्त बनाकर इसमें लोकतांत्रिक प्रणाली को स्थापित किया गया था. इससे पहले राज्य नगरीय निकायों के चुनाव अपनी सुविधा के अनुसार करते रहते थे. देश के अधिकांश हिस्सों में नगर निगम और नगर पालिकाओं के संचालन की जिम्मेदारी कार्यपालिका के हाथ में रही है. संविधान संशोधनों में अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के प्रतिनिधित्व की भी व्यवस्था की है. लेकिन,ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) के लिए आरक्षण की व्यवस्था को लागू नहीं किया गया.



स्थानीय निकायों के चुनाव और संचालन के नियम बनाने का अधिकार राज्यों को दिया गया है. राज्यों ने अपने अधिकार क्षेत्र का उपयोग कर ओबीसी के लिए निकायों में पद आरक्षित कर दिए गए. निकायों को सशक्त बनाए जाने वाले संविधान संशोधनों में इस बात का खास ख्याल रखा गया था कि आरक्षण के जरिए निचले स्तर सामाजिक ताना बाना न बिगड़े और राजनीतिक नेतृत्व भी उभरकर आए. आरक्षण की रोटेशन प्रणाली इसी सोच का हिस्सा रही होगी.



आरक्षण के नए प्रयोग कर रहे हैं राजनीतिक दल

पिछले दो दशक से आरक्षण के जरिए राजनीतिक लाभ लेने के लिए कई राज्यों में राजनीतिक दलों द्वारा नए-नए प्रयोग किए गए हैं. प्रमोशन में आरक्षण भी इसी प्रयोग के तहत शुरू किया गया. केन्द्र सरकार की नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण नहीं दिया जाता. लेकिन,राज्य दे रहे हैं. आजादी के बाद कांग्रेस को लगातार सत्ता में बनाए रखने वाला वर्ग आरक्षित वर्ग ही रहा है. बहुजन समाजवादी पार्टी के उदय से अनुसूचित जाति वर्ग कांग्रेस से दूर हुआ.



इसे वापस अपनी ओर लाने के लिए दलित एजेंडा जैसे प्रयोग मध्यप्रदेश में किए गए. चरनोई की जमीन को कम कर इस वर्ग के लोगों को बांट दिया गया. निकाय चुनाव में अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण भी मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने अपना जनाधार बढ़ाने के लिए ही शुरू किया था. लगभग दो दशक से इस व्यवस्था को किसी भी स्तर पर रोकने की कोशिश नहीं हुई. अचानक महाराष्ट्र निकाय चुनाव को लेकर दायर की गई याचिका में ओबीसी के आरक्षण पर रोक लगा दी गई.



कुछ दिन बाद इस रोक का विस्तार मध्यप्रदेश में भी हो गया. त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में संविधान का अनदेखी का आरोप लगाते हुए कांग्रेस से जुड़े कतिपय लोगों की ओर से एक याचिका मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में दायर की गई थी. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट ने मनमोहन नागर की याचिका पर ओबीसी सीटों पर चुनाव की प्रक्रिया रोकने के लिए कहा गया. ओबीसी की सीटें सामान्य वर्ग में अधिसूचित किए जाने के बाद ही प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश भी दिए गए.



सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ओबीसी सीटों के चुनाव तो रोक दिए गए, लेकिन सीटें सामान्य घोषित नहीं की गईं. कांग्रेस और भाजपा दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दल इस पक्ष में थे कि चुनाव ओबीसी आरक्षण के बिना न कराया जाए. इसी बीच, महाराष्ट्र में विकास किशन राव गवली मामले पर कार्यवाही करते हुए ओबीसी की सीटें सामान्य कर नया चुनाव कार्यक्रम भी घोषित कर दिया गया.



जातीय जनगणना भी बनेगा राजनीतिक मुद्दा?

सरकारी दावे के अनुसार मध्यप्रदेश में ओबीसी की आबादी लगभग 54 प्रतिशत है. यह पुष्ट आंकड़ा नहीं है. ओबीसी को आरक्षण दिए जाने के लिए सरकार को उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति का डाटा भी कोर्ट के समक्ष रखना है. इस प्रक्रिया में काफी वक्त लगना स्वाभाविक है. देश में हर दस साल में जनगणना की जाती है. इसमें जातीय जनगणना शामिल करने की मांग कई राज्य सरकारों की ओर से केन्द्र के समक्ष रखी गई है.



लेकिन, केन्द्र ने इसे स्वीकार नहीं किया. इसके बाद ही बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य सरकार के खर्च पर अलग से जातीय जनगणना कराने की घोषणा कर दी. इससे पहले कर्नाटक राज्य में यह प्रयोग किया गया था. महाराष्ट्र सरकार लंबे समय से मांग कर रही है कि 2011 की जनगणना के तहत इकट्ठा किया गया इंपेरिकल डेटा केंद्र सभी राज्यों को  उपलब्ध कराए. मध्यप्रदेश के पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण पर लगी रोक के बाद यहां भी गुपचुप तरीके से आंकड़े जुटाने का प्रयास सरकार कर रही है.



ओबीसी आरक्षण की सीमा चौदह से सत्ताईस प्रतिशत किए जाने के लिए भी सरकार को हाईकोर्ट में आंकड़ों की जरूरत है. राज्य में सरकारी सेवाओं में ओबीसी को अभी चौदह प्रतिशत आरक्षण मिलता है. कमलनाथ सरकार ने इसे बढ़ाकर 27 प्रतिशत किए जाने की अधिसूचना जारी की थी. कोर्ट ने बढ़े हुए आरक्षण प्रतिशत पर रोक लगाई हुई है.



ओबीसी से कितनी बदलेगी राजनीति की दिशा

मध्यप्रदेश सबसे बड़ी आदिवासी आबादी वाला राज्य है. यहां हर पांचवा व्यक्ति आदिवासी है. विधानसभा की कुल 47 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित है. आदिवासियों की 21 प्रतिशत से अधिक आबादी के कारण ही इस वर्ग के व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग उठती रहती है. ओबीसी आबादी का अधिकृत आंकड़ा सामने आने पर सियासत पूरी तरह से बदल जाएगी. इसका असर हिन्दी पट्टी के राज्यों के अलावा दक्षिण भारत के कुछ राज्यों पर भी देखने को मिलेगा.



महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उठाए गए अपने कदम को अब पीछे खींच लिया. मध्यप्रदेश की तरह महाराष्ट्र में भी निकाय चुनाव की प्रक्रिया रोक दी गई है. चुनाव रोकने के लिए महाराष्ट्र ने मध्यप्रदेश को नजीर के तौर पर सामने रखा है. मजबूरन अब केन्द्र सरकार को भी ओबीसी आरक्षण बचाने के लिए सामने आना पड़ा है. केन्द्र सरकार की ओर से भी एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई है. इस याचिका में चार माह के समय की मांग की गई है.



ट्रिपल टेस्ट के लिए समय जरूरी भी है. ट्रिपल टेस्ट के अंतर्गत सबसे पहले राज्य को एक कमिशन का गठन करना होगा.  यह कमिशन राज्य में पिछड़ेपन की प्रकृति पर अपनी रिपोर्ट तैयार करेगा इसके बाद पिछड़ेपन के आधार पर तय करेगा कि निकाय चुनाव में ओबीसी वर्ग के लिए कितना आरक्षण दिया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट का रुख इस मामले में बेहद सख्त दिखाई दे रहा है. महाराष्ट्र के गवली और मध्यप्रदेश के मनमोहन नागर मामले में सुप्रीम कोर्ट अपने कड़े रूख को जाहिर भी कर चुका है.



 स्वतंत्र निकाय के तौर पर काम नहीं कर पाएंगे निर्वाचन आयोग

ओबीसी राजनीति के लिए मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र ने जिस तरह से चुनाव प्रक्रिया को रोका है,इस तरह की कार्यवाही पहले कभी देखने को नहीं मिली. निकाय चुनाव के लिए जिन भी राज्य सरकारों ने स्वतंत्र चुनाव आयोग की स्थापना की है,उसकी प्रक्रिया में दखल का कानूनी प्रावधान नहीं है. दखल के लिए मध्यप्रदेश की सरकार ने पंचायती राज कानून में संशोधन के लिए अध्यादेश का सहारा लिया.



अध्यादेश के जरिए सरकार ने 2019 के उस परिसीमन को बहाल कर दिया,जिसे वह नवंबर निरस्त कर चुकी थी. राज्य निर्वाचन आयोग ने चुनाव की घोषणा 4 दिसंबर को की. चुनाव प्रक्रिया निरस्त करने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से जो दलील पेश की गई जिसमें कहा गया कि सरकार द्वारा परिसीमन बहाल किए जाने से वोटर लिस्ट और वह निर्वाचन क्षेत्र की सीमा बदल गई है. यह दलील इस बात की ओर भी इशारा करती है कि भविष्य में कोई भी सरकार इस तरह से निकाय चुनाव को रोक सकती है?

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
दिनेश गुप्ता

दिनेश गुप्ता

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ आपका जुड़ाव रहा है.

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First published: December 30, 2021, 4:41 pm IST

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