अविश्वास की राजनीति में विश्वास पात्र ढूंढते सोनिया-राहुल

राजस्थान कांग्रेस का सियासी संकट पिछले साल पंजाब कांग्रेस में उत्पन्न हुए सियासी संकट की तरह ही है? राजस्थान के सियासी संकट को पंजाब से तुलना कर इसलिए देखा जा रहा है क्योंकि यह भी मुख्यमंत्री के बदले जाने से जुड़ा हुआ है. राजस्थान में भी अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. राजस्थान में अशोक गहलोत का रवैया चौंकाने वाला है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 27, 2022, 4:04 pm IST
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अविश्वास की राजनीति में विश्वास पात्र ढूंढते सोनिया-राहुल
राहुल गांधी और सोनिया गांधी (फाइल फोटो-न्यूज़18)

राजस्थान कांग्रेस का सियासी संकट पिछले साल पंजाब कांग्रेस में उत्पन्न हुए सियासी संकट की तरह ही है? राजस्थान के सियासी संकट की पंजाब से तुलना कर इसलिए देखा जा रहा है क्योंकि यह भी मुख्यमंत्री के बदले जाने से जुड़ा हुआ है. राजस्थान में भी अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं. कांग्रेस के इस मजबूत गढ़ में यदि बगावत होती है तो हिन्दी भाषी राज्यों में भाजपा के लिए कोई बड़ी चुनौती बचेगी नहीं. मध्यप्रदेश में कांग्रेस पहले ही अपनी सत्ता गंवा चुकी है. उत्तरप्रदेश में पार्टी का कोई नाम लेने वाला नहीं बचा है. राजस्थान में अशोक गहलोत का रवैया चौंकाने वाला है. खासकर तब जब कांग्रेस नेतृत्व उन्हें सबसे भरोसेमंद चेहरे के तौर पर देख रहा हो?


ऊपरी तौर पर देखा जाए तो राजस्थान का मामला पंजाब कांग्रेस के सियासी संकट जैसा ही दिखाई देता है. लेकिन,इसमें एक बड़ा अंतर भी है. यह अंतर मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद की भूमिका को लेकर है. पार्टी आलाकमान (सोनिया गांधी-राहुल गांधी) ने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर जिस नाम को स्वीकार किया वह नाम अशोक गहलोत का है. जबकि पंजाब में अमरिंदर सिंह को ऐसा कोई मौका कांग्रेस आलाकमान की ओर से नहीं दिया जा रहा था. कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी है. आज उसकी स्थिति कितनी भी कमजोर क्यों न हो, लेकिन यह एकमात्र पार्टी है जिसकी उपस्थिति हर राज्य में किसी न किसी रूप में दिखाई पड़ जाएगी. इस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद आज भी राजनीतिक दृष्टि बेहद अहम और ताकतवर माना जाता है. अशोक गहलोत इस पद को दबाव में स्वीकार नहीं कर रहे होंगे? निश्चित तौर पर उन्होंने अपनी सहमति दी होगी? शायद सहमति के साथ कोई शर्त भी रखी हो?


राजस्थान-छत्तीसगढ़ जीतने में नए नेतृत्व की भूमिका

राजस्थान के घटनाक्रम से सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों के ही सामने एक नई चुनौती अचानक आकर खड़ी हो गई है. राहुल गांधी कांग्रेस को मजबूत करने की दृष्टि से ही भारत जोड़ों यात्रा पर हैं. वे पार्टी का नेतृत्व संभालना नहीं चाहते. लोकसभा चुनाव के परिणामों पर अपनी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए ही राहुल गांधी 2019 में पार्टी अध्यक्ष का पद छोड़ दिया था. राहुल गांधी चाहते थे कि कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी हार की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार कर पद छोड़ दें. लेकिन, न तो यह पहल अमरिंदर सिंह की ओर से हुई और न ही अशोक गहलोत की ओर से. कमलनाथ और भूपेश बघेल भी चुप रहे. राहुल गांधी की पुराने नेताओं से दूरी लगातार बढ़ती ही गई. अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को पार्टी छोड़ने के बारे में जो पत्र लिखा था, उसमें उन्होंने राहुल गांधी के व्यवहार को लेकर लिखा कि उनके रवैये से अपमानित हुआ. राहुल गांधी राज्यों में कांग्रेस पार्टी का नया नेतृत्व स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं. वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जिन तीन राज्यों में जीत दर्ज की थी उनमें राजस्थान और छत्तीसगढ़ में नए नेतृत्व की भूमिका अहम रही थी. छत्तीसगढ़ में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के नाते भूपेश बघेल और मध्यप्रदेश में कमलनाथ मुख्यमंत्री बन गए लेकिन, राजस्थान में सचिन पायलट को मौका नहीं मिल सका. मार्च 2020 में जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस छोड़ी तब सचिन पायलट के भी बागी तेवर सामने आए थे. गहलोत समर्थक इसी बगाबत को आधार बनाकर पायलट का रास्ता रोकना चाहते हैं.


जमीनी हकीकत से कितना दूर कांग्रेस नेतृत्व

पंजाब की तरह राजस्थान में भी मुख्यमंत्री पद के कई दावेदार हैं. इनमें विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी भी एक हैं. पंजाब में जिस तरह से अमरिंदर सिंह के समर्थक नवजोत सिंह सिद्धू का विरोध कर रहे थे, उसी तरह राजस्थान में सचिन पायलट का हो रहा है. वहां सुनील जाखड़ थे और यहां सीपी जोशी. चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर हुए नुकसान से राहुल गांधी ने कोई सबक लिया है, यह दिखाई नहीं देता है. राहुल गांधी शायद जमीनी हकीकत को पहचान नहीं पाए हैं कि कांग्रेस के जिन बुजुर्ग नेताओं को वे घर बैठाना चाहते हैं उन नेताओं ने पिछले चार दशक में नया नेतृत्व उभरने ही नहीं दिया. राजनीतिक स्तर पर भाजपा से मुकाबला करने में भी बुजुर्ग नेतृत्व विफल रहा है. राहुल गांधी के करीबी भी उनका साथ छोड़ रहे हैं तो इसके पीछे भी पार्टी का बुजुर्ग नेतृत्व ही जिम्मेदार माना जा सकता है. कम से कम ज्योतिरादित्य सिंधिया के मामले में तो यह सही भी है. अपवाद स्वरूप एक-दो अवसरों को छोड़ दिया जाए तो पंजाब और राजस्थान में हर पांच साल में सरकार बदलने का ट्रेंड रहा है. पंजाब में मुख्यमंत्री का बदलना भी ट्रेंड को नहीं बदल सका था. राजस्थान में अगले साल होने वाले चुनाव में मौजूदा राजनीति का असर पड़ेगा इससे इंकार नहीं किया जा सकता. राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पद से हटाया जाता है तो राजनीति कोई भी करवट ले सकती है. हर करवट में नुकसान में कांग्रेस पार्टी का ही होना है. प्रतिकूल परिणाम आने पर जिम्मेदार भी राहुल गांधी की राजनीति को ही ठहराया जाएगा.


गहलोत पर कितना भरोसा कर पाएगा नेतृत्व

पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि आखिर इसके पीछे है कौन? क्या अशोक गहलोत की मौन सहमति विधायकों के साथ थी या वे राजस्थान किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ना चाहते. यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि जब पार्टी के भीतर राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया चल रही है, उस वक्त ही राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन कितना जरूरी था? क्या सोनिया-राहुल गांधी को भरोसा नहीं था कि गहलोत पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद राजस्थान में मुख्यमंत्री की कुर्सी उनकी पसंद के आधार पर बनाएंगे. क्या गहलोत को यह भरोसा नहीं है कि वे पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद राजस्थान में अपनी मर्जी चला पाएंगे? अविश्वास की राजनीति में कांग्रेस नेतृत्व जिस विश्वास को स्थापित करना चाहता है, वह हाथ से निकल चुका है.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
दिनेश गुप्ता

दिनेश गुप्ता

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ आपका जुड़ाव रहा है.

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First published: September 27, 2022, 4:04 pm IST
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