उत्तर की तुलना में दक्षिण भारत में क्या ज्यादा खुल कर खेलते हैं राहुल गांधी

कांग्रेस नेता राहुल गांधी जब देश के दक्षिणी हिस्से में होते हैं तो लगता है वे हिट हैं, जबकि अपने खानदानी गढ़ उत्तर भारत में हिटविकेट से होते दिखने लगते हैं. साउथ के लोग उनसे जुड़ जाते हैं और वे भी जनता से कनेक्ट कर लेते हैं. उत्तर में आखिर क्या दिक्कत आती है.

Source: News18Hindi Last updated on: March 3, 2021, 9:00 PM IST
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उत्तर की तुलना में दक्षिण भारत में क्या ज्यादा खुल कर खेलते हैं राहुल गांधी
राहुल गांधी (फ़ाइल फोटो)
केरल के वायनाड में अपने निर्वाचन क्षेत्र में जब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने उत्तर-दक्षिण की तुलना की तो उनके विरोधियों को हमला करने का एक और मौका मिला गया. राहुल गांधी के राजनीतिक तौर -तरीके भी इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि उनकी दिलचस्पी उत्तर से ज्यादा दक्षिण के राज्यों में है. वजह दक्षिण भारतीयों लोगों का मुद्दों को लेकर जागरूक होना है. उत्तर भारत में मुद्दों पर आधारित राजनीति का अभाव शायद राहुल गांधी को दिखाई देता है. जबकि प्रियंका गांधी यूपी से बाहर निकल कर दूसरे उत्तर भारतीयों के बीच भी अपने को सहज पाती हैं. शायद इसकी वजह उत्तर के मुद्दों को लेकर उनकी समझ है.

जिम्मेदार कौन जनता या उत्तर के कांग्रेस नेता?
कांग्रेस का अस्तित्व लगातार गंभीर संकट में फंसा हुआ दिखाई दे रहा है. राहुल गांधी का चेहरा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तुलना में बेहद कमजोर साबित हुआ है. कांग्रेस उत्तर भारत में लगातार कमजोर हुई है. भारतीय जनता पार्टी का जनाधार मजबूत हुआ है. इसके पीछे उत्तर भारत में कांग्रेस के नेताओं की गुटबाज़ी ज्यादा जिम्मेदार रही है. राहुल गांधी को उत्तर भारत में अपने निर्णय क्रियान्वित कराने में सबसे ज्यादा दिक्कत राज्यों के क्षत्रपों के कारण आई. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पा रही है. 2018 के विधानसभा चुनाव में तीन राज्य मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की वापसी भाजपा मुख्यमंत्रियों की नाराज़गी का परिणाम थी. मध्यप्रदेश और राजस्थान में राहुल गांधी जन भावनाओं के अनुरूप मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं दे सके. परिणामत: मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार टूट गई. पिछले चार दशक से कांग्रेस की राजनीति पर उत्तर भारत के नेताओं का कब्ज़ा है. ये नेता कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के करीबी माने जाते रहे. इन नेताओं ने राहुल गांधी का नेतृत्व कभी स्वीकार नहीं किया.

दक्षिण में सहयोगी दलों की ताकत
राहुल गांधी ने वायनाड में यह स्वीकार किया कि उन्हें उत्तर भारत में एक अलग तरह की राजनीति करने की आदत हो गई थी. शायद उनका इशारा इस बात की ओर था कि लोग विकास और मुद्दों पर दिलचस्पी लेने के बजाए पिछलग्गू बने रहने की राजनीति करने में भरोसा रखते हैं. वर्ष 2014 और फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के ऐसे कई चेहरे चुनाव हार गए जिनका आधार मजबूत माना जाता था. लेकिन,वोटों का धुर्वीकरण ऐसा हुआ कि कांग्रेस अपनी जमीन भी नहीं बचा सकी. दक्षिण भारत में भी कांग्रेस मजबूत स्थिति में नहीं है. लेकिन,यहा क्षेत्रीय दलों के मजबूत होने के कारण चुनाव नरेन्द्र मोदी बनाम राहुल गांधी नहीं होता है. राहुल गांधी को यह स्थिति राजनीतिक तौर पर शायद बेहतर दिखाई देती हो. उन्हें लगता है कि दक्षिण में वोटर व्यक्ति से ज्यादा महत्व स्थानीय मुद्दों को देता है. दक्षिण में कांग्रेस की जय-पराजय का असर कांग्रेस पर सीधा दिखाई नहीं पड़ता. जबकि उत्तर भारत में कांग्रेस की हार-जीत को सीधे नेतृत्व के खाते में डाल दिया जाता है. उत्तर भारत के अधिकांश राज्यों में कांग्रेस आज भी प्रासंगिक है. यद्यपि उसे अपना वर्चस्व बचाए रखने के लिए लगातार साथी तलाश करना पड़ते हैं और बदलना पड़ते हैं. दक्षिण में पिता राजीव गांधी और दादी इंदिरा गांधी की छवि का लाभ राहुल गांधी को अभी भी अपने पक्ष में दिखाई देता है.

सोनिया गांधी को भी उत्तर मिली थी परेशानी
कांग्रेस में नेहरू- गांधी परिवार की अंतिम उम्मीद प्रियंका गांधी हैं. सोनिया गांधी अध्यक्ष का पद छोड़ेगीं तो उत्तराधिकारी कौन होगा? राहुल गांधी या प्रियंका गांधी. उत्तर भारत के नेताओं में सबसे लोकप्रिय चेहरा प्रियंका गांधी का ही सामने आएगा. कांग्रेस के जिन 23 नेताओं ने बगाबत का बिगुल फूंका हैं,उसमें ज्यादा संख्या उत्तर भारत के नेताओं की है. शशि थरूर और पीजी कुरियन जैसे केरल के नेता भी हैं. केरल में विधानसभा के चुनाव है. जी-23 में जनधारा वाले नेताओं में अकेला नाम शायद भूपेन्द्र सिंह हुड्डा का ही होगा. राहुल गांधी की इन नेताओं से संवादहीनता की स्थिति है. संवाद प्रियंका गांधी कर रही हैं. राहुल आर पार के मूड के हैं. नुकसान का अंदाजा नहीं लगा पाते. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इन नेताओं के खिलाफ कठोर कार्यवाही का फैसला नहीं ले पा रही हैं. उन्हें लग रहा है कि इससे एक बार फिर कांग्रेस टूट जाएगी. सोनिया गांधी ने जब सीताराम केसरी को हटा कर कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला था,उस वक्त नारायण दत्त तिवारी, अर्जुन सिंह और माधवराव सिंधिया जैसे नेता क्षेत्रीय दल बनाकर राजनीति कर रहे थे. उत्तर भारत में कांग्रेस के कमजोर होने का सिलसिला भी नब्बे के दशक में ही शुरू हुआ था.प्रियंका को उत्तर की ज़मीनी राजनीति का ज्ञान
राहुल गांधी उत्तर भारत में ही सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा ट्रोल होते हैं. प्रियंका गांधी को निशाने बनाने की कोशिश अभी नहीं हुई है. यद्यपि उनके पति राबर्ट वाड्रा को जरूर घेरने की कोशिश लगातार होती रहती है. उत्तर भारत के लोगों खासकर महिलाओं के बीच प्रियंका गांधी लोकप्रिय चेहरा भी हैं. असम के चाय बागान में जिस तरह से प्रियंका गांधी ने वोटर से अपने आपको जोड़ा राहुल गांधी यह राजनीतिक उपक्रम सफलता से नहीं कर पाते. वे आईिकडो और पुशअप्स लगाते अपने आपको सहज महसूस करते हैं. उन्हें लगता है कि दक्षिण भारत में इस तरह के उपक्रम को मज़ाक के तौर पर नहीं लिया जाएगा. यह उसी तरह के फिटनेस चैलेंज की तरह था,जो विराट् कोहली ने दिया था. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वीकार किया था. प्रियंका गांधी अपने पहनावे से भी उत्तर भारत की राजनीति में पकड़ बनाने की कोशिश करती हैं. वे आम भारतीय महिलाओं से बेहतर संवाद भी कर लेती हैं. प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश की प्रभारी महासचिव हैं. उत्तर प्रदेश की राजनीति में हर फैसला अब वे ही ले रही हैं.
ब्लॉगर के बारे में
दिनेश गुप्ता

दिनेश गुप्ता

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ आपका जुड़ाव रहा है.

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First published: March 3, 2021, 9:00 PM IST
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