भाजपा के निशाने पर आखिर दिग्विजय सिंह ही क्यों हैं?

19 जून को राज्यसभा चुनाव के लिए वोट डाले जाने हैं. कुल तीन सीटों के लिए होने वाले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ( Bharatiya Janata Party) को दो सीट और कांग्रेस को एक सीट मिलना तय माना जा रहा है. इस चुनाव के जरिए भारतीय जनता पार्टी की कोशिश दिग्विजय सिंह को मुद्दा बनाने की है. दिग्विजय सिंह की मिस्टर बंटाधार की छवि उभार कर भाजपा हमेशा राजनीतिक लाभ उठाने में सफल रही है.

Source: News18Hindi Last updated on: June 18, 2020, 9:38 PM IST
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भाजपा के निशाने पर आखिर दिग्विजय सिंह ही क्यों हैं?
भारतीय जनता पार्टी की कोशिश दिग्विजय सिंह को मुद्दा बनाने की है. (file photo)
यद्यपि राजनीति में संभावनाएं हमेशा ही बनी रहतीं हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) और उनके 22 समर्थक विधायकों ने विधानसभा से इस्तीफा देकर राज्यसभा चुनाव (Rajya Sabha Election) में कांग्रेस को तगड़ा झटका दिया. मार्च के इस राजनीतिक घटनाक्रम के बाद कल यानी 19 जून को राज्यसभा चुनाव के लिए वोट डाले जाने हैं. कुल तीन सीटों के लिए होने वाले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ( Bharatiya Janata Party) को दो सीट और कांग्रेस को एक सीट मिलना तय माना जा रहा है. इस चुनाव के जरिए भारतीय जनता पार्टी की कोशिश दिग्विजय सिंह को मुद्दा बनाने की है. दिग्विजय सिंह की मिस्टर बंटाधार की छवि उभार कर भाजपा हमेशा राजनीतिक लाभ उठाने में सफल रही है. इस बार राज्यसभा के चुनाव में अनुसूचित जाति वर्ग के फूल सिंह बरैया (PHOOL SINGH BARAIYA) को दूसरे नंबर पर रखे जाने को भी मुद्दा भी दिग्विजय सिंह को घेरने के लिए ही उठाया गया.

पहली प्राथमिकता पर हैं दिग्विजय सिंह
मध्यप्रदेश में कमलनाथ (kamalnath) के नेतृत्व वाली कांग्रेस ( Congress) की सरकार गिरने की बड़ी वजहों में दिग्विजय सिंह का नाम भी एक है. सिंधिया परिवार और दिग्विजय सिंह के बीच तनाव राजे-राजवाड़ों के दौर से चला आ रहा है. जबकि सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने की वजह राज्यसभा चुनाव की उम्मीदवारी बताई जाती है 22 विधायकों द्वारा इस्तीफा दिए जाने से पूर्व तक वोटों का गणित कांग्रेस के पक्ष में था और वह राज्यसभा की दो सीट जीतने की स्थिति में थी. भारतीय जनता पार्टी को एक सीट का घाटा हो रहा था. लोकसभा चुनाव में गुना-शिवुपरी की पंरपरागत सीट पर मिली पराजय के बाद सिंधिया राज्यसभा की एक सीट के बड़े दावेदार माने जा रहे थे, लेकिन कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के विरोध के चलते यह संभव नहीं हो सका. पार्टी ने दिग्विजय सिंह को दुबारा राज्यसभा भेजने का फैसला किया.जबकि दूसरी सीट पर ग्वालियर-चंबल संभाग में अनुसूचित जाति का चेहरा माने जाने वाले फूल सिंह बरैया को उम्मीदवार बनाया गया. पार्टी ने उम्मीदवारी की घोषणा के साथ ही पहले क्रम पर दिग्विजय सिंह और दूसरे पर बरैया को रखा. कांग्रेस द्वारा राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवारों की घोषणा के साथ सिंधिया अपने विधायकों को लेकर अलग हो गए. इधर,कोरोना वायरस के चलते लॉकडाउन घोषित हो जाने के कारण राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया भी रोक दी गई थी. अनलॉक 1.0 के बाद वोटिंग की तारीख तय की गई.

भाजपा-कांग्रेस ने क्रॉस वोटिंग के खतरे से बदली रणनीति
22 विधायकों के इस्तीफे के बाद कांग्रेस ने राज्यसभा चुनाव में वोटिंग के लिए अपनी रणनीति में बदलाव किया है. यह बदलाव क्रॉस वोटिंग के खतरे को ध्यान में रखकर किया गया है. मौजूदा स्थिति में कांग्रेस सिर्फ 92 विधायक हैं. एक सीट जीतने के लिए कुल 52 विधायकों के वोट चाहिए. जबकि दूसरे उम्मीदवार के लिए उसके पास सिर्फ 40 वोट ही हैं.कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह की जीत सुनिश्चित करने के लिए कुल 54 विधायकों को पहली प्राथमिकता में उन्हें (दिग्विजय सिंह को) वोट करने के लिए कहा गया है. आवश्यकता से अधिक दो विधायकों को दिग्विजय सिंह के पक्ष में वोट के लिए अधिकृत करने पर मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष रामनिवास रावत कहते हैं कि हमने क्रॉस वोटिंग के खतरे के कारण यह नहीं किया है. तकनीकी कारण से कोई वोट रिजेक्ट होने की संभावना को ध्यान में रखकर रणनीति बनाई है. बहुजन समाज पार्टी,समाजवादी पार्टी तथा निर्दलीय विधायक भी कांग्रेस पार्टी को समर्थन नहीं कर रहे हैं. इन विधायकों की कुल संख्या सात है. बुधवार को भारतीय जनता पार्टी द्वारा आयोजित सह भोज में ये विधायक मौजूद थे. कमलनाथ ने इन्हीं विधायकों की मदद से राज्य में पंद्रह माह सरकार भी चलाई. इन विधायकों के भाजपा के पक्ष में जाने से उसके पास दस वोट अतिरिक्त हैं. भाजपा भी दूसरी सीट पर क्रॉस वोटिंग का खतरा नहीं उठाना चाहती. राज्यसभा चुनाव को ध्यान में रखकर ही शिवराज सिंह चौहान मंत्रिमंडल का विस्तार लगातार टालते जा रहे हैं. भाजपा के कुल 107 विधायक हैं. 104 वोट के साथ वह दोनों सीट जीत सकती है.

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अनुसूचित जाति वर्ग की उपेक्षा का मुद्दामध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा राज्यसभा चुनाव में फूल सिंह बरैया को प्राथमिकता में दूसरे नंबर पर रखे जाने पर कांग्रेस पर अनुसूचित जाति वर्ग की उपेक्षा का आरोप लगा रहे हैं. राज्य के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा कहते हैं कि दिग्विजय सिंह को चाहिए कि वे खुद बरैया को पहली प्राथमिकता देने की पहल पार्टी में करें. मिश्रा भी ग्वालियर-चंबल अंचल से आते हैं. अनुसूचित जाति,जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में केन्द्र सरकार द्वारा किए गए संशोधन के बाद 2 अप्रैल 2018 को इस अंचल में जमकर हिंसा हुई थी. घटनाक्रम का लाभ विधानसभा के आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी को मिला था. अंचल की 34 सीटों में से 26 सीटें उसको मिली थीं. कांग्रेस की सरकार बनाने में इस अंचल का बड़ा योगदान रहा. जबकि भारतीय जनता पार्टी सिर्फ सात सीटें जीत पाई थी. एक सीट बहुजन समाज पार्टी के खाते में गई थी. कांग्रेस पार्टी से चुनाव जीतने वाले अधिकांश नेता सिंधिया समर्थक थे. यही कारण है कि उन्होंने सिंधिया का इशारा मिलते ही विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. राज्य में जिन 24 विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव होना है,उनमें 9 सीटें अनुसूचित जाति एवं एक जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित है. अनुसूचित जाति वर्ग की सबसे ज्यादा छह सीटें ग्वालियर-चंबल अंचल की हैं. फूल सिंह बरैया ने मायावती से मतभेद होने के बाद बहुजन समाज पार्टी छोड दी थी। बरैया बसपा के प्रदेशाध्यक्ष थे। उन्होंने बहुजन संघर्ष दल के नाम अलग राजनीतिक पार्टी बनाई थी। लेकिन,सफल नहीं हो सके. भारतीय जनता पार्टी में भी रह चुके हैं. अब कांग्रेस में हैं. बरैया ने केवल एक विधानसभा का चुनाव 1998 में जीता था, तब वे बहुजन समाज पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष थे. प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में से 82 आरक्षित हैं. भाजपा ने 2013 में इनमें से 59 सीटें जीती थीं, लेकिन 2018 में वह 34 पर सिमट गई. कांग्रेस जो कि 2013 में 19 सीटें लाई थी, उसे 2018 में 47 सीटें मिलीं.

दिग्विजय सिंह की छवि में जीत की तलाश
दिग्विजय सिंह राज्य के दस साल मुख्यमंत्री रहे हैं. वर्ष 2003 में कांग्रेस पार्टी जब सत्ता से बाहर हुई थी,तब दिग्विजय सिंह ही राज्य के मुख्यमंत्री थे. भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा चुनाव में ही उन्हें मिस्टर बंटाधार का नाम दिया था. प्रदेश में सड़क,बिजली पानी और बेरोजगारी मुद्दा थे. दिग्विजय सिंह का मिस्टर बंटाधार नामकरण वोटरों में काफी लोकप्रिय हुआ. उमा भारती के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को भारी जीत भी मिली. इस चुनाव के बाद से ही भारतीय जनता पार्टी लगभग हर चुनाव में वोटरों को दिग्विजय सिंह सरकार के दिनों की याद दिलाती है. यह धारणा भी बन चुकी है कि दिग्विजय सिंह के चुनाव प्रचार करने से कांग्रेस पार्टी को नुकसान होता है. इसी धारणा के चलते ही दिग्विजय सिंह ने वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में अपने आपको प्रचार से अलग रखा था. पार्टी से भी उन्होंने प्रचार में न भेजने का आग्रह किया था. दिग्विजय सिंह ने पार्टी के नेताओं के बीच समन्वय की जिम्मेदारी ली थी और चुनाव से पहले समन्वय के लिए उनकी पहल संगत में पंगत के नाम से काफी लोकप्रिय हुई थी. नेता अपने आपसी झगड़े भुलाकर कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने के लिए एकजुट भी हुए थे. कमलनाथ के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद दिग्विजय सिंह की सक्रियता से भारतीय जनता पार्टी को उन पर हमला बोलने का मौका फिर से मिल गया. अब सिंधिया के कांगे्रस छोड़ने की वजह भी दिग्विजय सिंह को ही बताया जा रहा है. पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह कहते हैं कि सिंधिया ने कांग्रेस क्यों छोड़ी यह किसी से छुपा नहीं है. वे केन्द्रय मंत्री बनना चाहते थे. यह काम भारतीय जनता पार्टी ही कर सकती है. दिग्विजय सिंह को घेरने के लिए भारतीय जनता पार्टी की ओर से आईटी एक्ट में एक मामला भी थाने में दर्ज कराया है. दिग्विजय सिंह पर आरोप है कि उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के भाषण वाले वीडियो में छेडछाड़ की है?

सिंधिया के गढ़ में कब्जा जमाने का संघर्ष
ज्योतिरादित्य सिंधिया के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद भी कांग्रेस में गुटबाजी थमती दिखाई नहीं दे रही है. पार्टी अध्यक्ष और विधायक दल के नेता का पद पूर्व सीएम कमलनाथ के पास ही है. ऊपरी तौर पर कमलनाथ और दिग्विजय सिंह साथ दिखाई दे रहे हैं, लेकिन सिंधिया के पार्टी छोड़ने से जो नेतृत्व का जो संकट ग्वालियर-चंबल अंचल में उत्पन्न हुआ है,दोनों ही नेता अपनी-अपनी ताकत यहां बढ़ाने की कोशिश में लगे हुए हैं. दिग्विजय सिंह भी खुलकर अपने आपको ग्वालियर संभाग से जुड़ा बातने लगे हैं. दिग्विजय सिंह गुना जिले के राघोगढ़ के निवासी हैं. जबकि कमलनाथ ने उन लोगों की पीठ पर हाथ रख दिया है,जो सिंधिया के साथ भाजपा में नहीं गए हैं.
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First published: June 18, 2020, 9:16 PM IST
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