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अवसाद में डूबी कांग्रेस को उबारने में दिग्विजय कार्ड असर दिखाएगा?

अब मैं आराम करना चाहता हूं. कमलनाथ के इस बयान के बाद मध्य प्रदेश में कांग्रेस पर अवसाद की छाया दिखाई देने लगी है. नगरीय निकाय के चुनाव में कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाई तो उसे 2023 के विधानसभा चुनाव में भी संभलने का मौका नहीं मिलेगा.

Source: News18 Madhya Pradesh Last updated on: December 15, 2020, 11:06 PM IST
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अवसाद में डूबी कांग्रेस को उबारने में दिग्विजय कार्ड असर दिखाएगा?
मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के प्रभाव से मुक्त नहीं हो सकती है.. (फाइल फोटो)
मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के प्रभाव से मुक्त नहीं हो सकती है. नगरीय निकाय के चुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी दिग्विजय सिंह की मौजूदगी का लाभ लेने से चूकेगी नहीं. इस सच को हर छोटा-बड़ा कांग्रेसी जानता है. कांग्रेसी दिग्विजय सिंह की संगठन क्षमता को भी जानते हैं. यही कारण है कि पार्टी की हार के बाद दिग्विजय सिंह की अनदेखी का आरोप उनके समर्थक लगाते हैं. पंद्रह साल में तीन विधानसभा चुनाव हारे। सरकार आई तो पंद्रह माह में चली गई. नए साल में नगरीय निकायों के चुनाव होना हैं. इन चुनावों के उम्मीदवार तय करने में दिग्विजय सिंह की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहने वाली है,इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता.

समर्थकों के लिहाज से सबसे ताकतवर हैं दिग्विजय सिंह

नगरीय निकाय के चुनाव के उम्मीदवार तय कर पाना अकेले पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के वश की बात नहीं है. कमलनाथ, मध्य प्रदेश कांगे्रस कमेटी के अध्यक्ष भी हैं. इस लिहाज से उनके लिए नगरीय निकाय के चुनाव भी उप चुनाव से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं. राज्य में नगरीय निकाय की व्यवस्था तीन स्तर की है. सबसे छोटी इकाई नगर परिषद है. इनकी कुल संख्या 294 है. मध्यम स्तर पर नगर पालिका हैं. इनकी कुल संख्या 98 है, जबकि नगरों की सबसे बड़ी इकाई नगर निगम है. इनकी कुल संख्या सोलह है. कुल 408 नगरीय निकायों के वार्डों की संख्या लगभग छह हजार है. इतनी बड़ी संख्या में वार्डों के लिए उम्मीदवार तय करना मुश्किल भरा काम है. ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांगे्रस छोड़ने के बाद दिग्विजय सिंह के लिए समर्थकों को टिकट दिलाना बेहद मुश्किल भरा नहीं है. हर नगरीय निकाय में कमलनाथ के समर्थक भी नहीं हैं. विंध्य में पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की पकड़ है, जबकि निमाड़ के कुछ नगरीय निकायों में यादव बंघु(अरूण यादव-सचिन यादव) की पकड़ है. अरूण यादव प्रदेश कांगे्रस के अध्यक्ष रहे हैं. इस कारण हर जिले में उनके समर्थक भी टिकट मांगेगे. उनके भाई सचिन यादव विधायक हैं. कमलनाथ मंत्रिमंडल में कृषि मंत्री थे. पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुरेश पचौरी के खाते में भी कुछ टिकट जाएंगे. नगर निगमों में उम्मीदवारों का चयन पूरी तरह से दिग्विजय सिंह की सहमति से ही हो सकेगा. लेकिन,दिग्विजय सिंह आमजन के बीच लोकप्रिय नहीं हैं. उनकी छवि अभी भी मिस्टर बंटाधार की बनी हुई है. इस छवि का नुकसान कांगे्रस लगातार उठा भी रही है. लेकिन,मुश्किल यह है कि किसी दूसरे नेता की इतनी पकड़ कार्यकत्र्ता पर नहीं है. इस कारण उनका दबदबा बना हुआ है. पुत्र जयवर्द्धन सिंह पिता के समर्थकों के साथ ही राजनीति कर रहे हैं.
मुख्यमंत्री रहते दिग्विजय सिंह खुद तय नहीं कर पाए थे उम्मीदवार
संविधान के 73 वें और 74वें संशोधन के तहत चुनाव कराए जाने वाला मध्य प्रदेश पहला राज्य था. पहली बार वर्ष 1994 में नगरीय निकाय के चुनाव हुए थे. दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे. कांग्रेस की गुटबाजी के चलते वे खुद भी उम्मीदवारों का चयन नहीं कर पाए थे, कांग्रेसियों को चुनाव लड़ने की छूट दे दी गई थी. किसी को चुनाव चिंह नहीं दिया गया. इस बार उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया कांग्रेस ने अभी से ही शुरू कर दी है. मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष और संगठन प्रभारी चंद्रप्रभाष शेखर कहते हैं कि तीन स्तरीय नगरीय निकाय के चुनाव में प्रत्याशी चयन एवं चुनावी रणनीति के लिए जिला कांग्रेस इकाईयों एवं स्थानीय कांग्रेस नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी जा रही है. जिलों में चुनावी रणनीति एवं प्रत्याशी चयन समिति का गठन जिला कांग्रेस अध्यक्ष के नेतृत्व में किया जा रहा है जिसमें उस क्षेत्र के माननीय विधायक/प्रत्याशी 2018, क्षेत्रीय सांसद/प्रत्याशी 2019, प्रतिपक्ष के नेता, मोर्चा संगठन के जिला अध्यक्ष एवं प्रदेश कांग्रेस द्वारा मनोनीत प्रभारी शामिल होंगे.
नगरीय निकाय के चुनाव परिणामों पर पर निर्भर करेगा कांगे्रस का भविष्य

अब मैं आराम करना चाहता हूं. कमलनाथ के इस बयान के बाद मध्य प्रदेश में कांग्रेस पर अवसाद की छाया दिखाई देने लगी है. नगरीय निकाय के चुनाव में कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाई तो उसे 2023 के विधानसभा चुनाव में भी संभलने का मौका नहीं मिलेगा. मध्य प्रदेश में अभी दो दलीय व्यवस्था है. कोई तीसरा दल मजबूत स्थिति में नहीं आ पाया है. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी दोनों ही अपना प्रभाव नहीं बढ़ा पाईं. बहुजन समाज पार्टी अब नगरीय निकाय के चुनाव में भी अपने उम्मीदवार उतारने जा रही है. पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष रमाकांत पिप्पल का दावा है कि बसपा उम्मीदवार बेहतर परिणाम देंगे. बसपा का प्रभाव विंध्य एवं ग्वालियर चंबल अंचल में है. ग्वालियर-चंबल अंचल में कांग्रेस के सामने ज्योतिरादित्य सिंधिया एक बार फिर चुनौती के तौर पर खड़े है. प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी कहते हैं कि कांगे्रस का जहाज डूब चूका है. जल्दी ही कांग्रेसी नेता भी इस सच को मान लेंगे. कांगे्रस की नीति और नेताओं की नीयत इसके लिए जिम्मेदार है.  जवाब में कांग्रेस उपाध्यक्ष चंद्रप्रभाष शेखर कहते हैं कि विधानसभा उप चुनाव में सिंधिया के गढ़ में सात सीटें जीत कर कांग्रेस ने अपनी ताकत का अहसास करा दिया है.महापौर अध्यक्ष का चयन करना भी होगा मुश्किल भरा
मध्य प्रदेश के नगरीय निकाय के चुनाव में महापौर और अध्यक्ष का निर्वाचन प्रत्यक्ष प्रणाली से होता है. पचास प्रतिशत पद महिलाओं के लिए आरक्षित हैं. भोपाल और ग्वालियर महापौर का पद महिला के लिए आरक्षित है. जाति आरक्षण में भोपाल महापौर का पद पिछड़ा वर्ग की महिला के लिए है. कांग्रेस ने उम्मीदवार चयन के लिए जो कमेटी बनाई है,उसमें पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी सदस्य हैं. समिति में उनकी सदस्यता वर्ष 2019 के लोकसभा उम्मीदवार होने के नाते है. कांग्रेस ने उम्मीदवार चयन के लिए जो कमेटी बनाई है उसमें नीतिगत तौर पर उसमें अध्यक्ष शहर कांग्रेस कमेटी,जिला कांग्रेस कमेटी तथा
सांसद/ लोकसभा प्रत्याशी 2019,जिले के विधायक /प्रत्याशी 2018,नेता प्रतिपक्ष नगर पालिका निगम जिला अध्यक्ष युवा कांग्रेस, जिला अध्यक्ष सेवा दल, जिला अध्यक्ष महिला कांग्रेस, जिला अध्यक्ष भाराछासं को सदस्य तथा प्रदेश कांग्रेस द्वारा मनोनीत प्रभारी/सह-प्रभारी भी रखा गया है. भोपाल से ज्यादा इंदौर महापौर के उम्मीदवार को लेकर ज्यादा दिलचस्पी है. विधायक जीतू पटवारी का नाम चला तो उन्होंने विधायक संजय शुक्ला का नाम आगे कर दिया. संजय शुक्ला के यहां विवाह समारोह में पिछले दिनों मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और राज्यसभा सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया भी गए थे. इन दोनों नेताओं का जाने के पीछे राजनीतिक कारण भी तलाश किए गए। कांगे्रस भी चौकन्नी दिख रही है. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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First published: December 15, 2020, 11:03 PM IST
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