पिछड़ों की राजनीति में क्या शिवराज से आगे निकल पाएंगे कमलनाथ?

वर्ष 2018 में पूर्व केन्द्रीय राज्य मंत्री अरुण यादव (Arun Yadav) को हटाकर कमलनाथ को मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया था. यादव पिछड़ा वर्ग चेहरा माने जाते हैं. उनके पिता स्वर्गीय सुभाष यादव पिछड़ा वर्ग के बड़े नेताओं में गिने जाते थे.

Source: News18Hindi Last updated on: July 30, 2021, 12:03 PM IST
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पिछड़ों की राजनीति में क्या शिवराज से आगे निकल पाएंगे कमलनाथ?
शिवराज सिंह चौहान की सबसे बड़ी ताकत अन्य पिछड़ा वर्ग का वोटर ही है.

भोपाल. पिछड़ा वर्ग का आरक्षण चौदह से बढ़ाकर सत्ताइस प्रतिशत किए जाने का असर सड़कों पर दिखाई देने लगा है. यद्यपि पिछड़ा वर्ग महासभा का पहला प्रदर्शन बहुत उत्साहजनक दिखाई नहीं दिया है, लेकिन राजनीतिक पटल पर हलचल जरूर दिखाई दे रही है. कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण बढ़ाया था. लेकिन, हाईकोर्ट ने क्रियान्वयन पर रोक लगाई हुई है. कमलनाथ की कोशिश पिछड़ों के बीच शिवराज सिंह चौहान से आगे निकलने की है.


ओबीसी के चेहरे पर चल रही भाजपा की सियासत

वर्ष 2003 का विधानसभा चुनाव जीतने के बाद मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की पूरी राजनीति अन्य पिछड़ा वर्ग के चेहरे पर चल रही है. उमा भारती और बाबूलाल गौर के बाद मुख्यमंत्री बनाए गए शिवराज सिंह चौहान अन्य पिछड़ा वर्ग के ही हैं. शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में आंकड़े प्रस्तुत कर यह दावा किया गया है कि राज्य में पिछड़ा वर्ग की कुल आबादी पचास प्रतिशत से अधिक है. सरकार ने यह दावा वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर किया है. वर्ष 1994 से राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग को सरकारी नौकरियों में चौदह प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है. जुलाई 2019 में कमलनाथ सरकार ने कानून में संशोधन कर अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण दिए जाने की सीमा चौदह से बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दी थी. कमलनाथ ने यह फैसला लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को मिली करारी हार के बाद लिया था. अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण बढ़ाकर कमलनाथ ने अपनी अल्पमत सरकार को बचाने के लिए बड़ा दांव खेला था. यद्यपि उनकी सरकार नहीं बच पाई. पिछले साल मार्च में ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में हुए दलबदल में उनकी सरकार गिर गई. दल बदलने वाला सदस्यों में पिछड़ा वर्ग के अलावा अनुसूचित जाति वर्ग के विधायक भी थे.


कांग्रेस में पिछड़ रहे हैं ओबीसी चेहरे

वर्ष 2018 में पूर्व केन्द्रीय राज्य मंत्री अरुण यादव को हटाकर कमलनाथ को मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया था. यादव पिछड़ा वर्ग चेहरा माने जाते हैं. उनके पिता स्वर्गीय सुभाष यादव पिछड़ा वर्ग के बड़े नेताओं में गिने जाते थे. अरुण यादव चार साल से भी अधिक समय तक प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे. इस दौरान उन्होंने अन्य पिछड़ा वर्ग को कांग्रेस के पक्ष में लाने की कवायद भी की. कांग्रेस की पंद्रह साल बाद सरकार में वापसी का श्रेय अरुण यादव को नहीं मिला. कमलनाथ राज्य के मुख्यमंत्री बने. अरुण यादव के भाई सचिन यादव कमलनाथ के मंत्रिमंडल में कृषि मंत्री बनाए गए. कमलनाथ मंत्रिमंडल में अन्य पिछड़ा वर्ग के ही कमलेश्वर पटेल भी मंत्री रहे. आरक्षण की सीमा बढ़ाए जाने के पक्ष में पिछड़ा वर्ग महासभा के आंदोलन में अकेले कमलेश्वर पटेल ही शामिल हुए. भाजपा नेता डॉ.हितेश वाजपेयी कहते हैं कि कांग्रेस यदि गंभीर होती तो खुद कमलनाथ आंदोलन की अगुवाई कर रहे होते. कांग्रेस में अन्य पिछड़ा वर्ग के दर्जन भर से अधिक नेता ऐसे हैं, जिनका अपनी जातियों पर खासा असर है. लेकिन, वे हाशिए पर हैं.


उप चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में जाएंगे ओबीसी

शिवराज सिंह चौहान की सबसे बड़ी ताकत अन्य पिछड़ा वर्ग का वोटर ही है. सरकार नौकरियों में आरक्षण की सीमा 27 प्रतिशत किए जाने का मामला कोर्ट में अटक जाने से इस वर्ग में खासी बेचैनी है. पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष कांग्रेस नेता जेपी धनोपिया कहते हैं कि भाजपा की नीति चेहरा दिखाकर वोट लेने की है. वे कहते हैं कि शिवराज सिंह चौहान की मंशा ज्यादा से ज्यादा लोगों को आरक्षण का लाभ देने की नहीं है. राज्य में आने वाले कुछ माह में एक लोकसभा और तीन विधानसभा के उपचुनाव होना है. कांग्रेस की कोशिश आरक्षण का प्रतिशत न बढ़ पाने का ठीकरा शिवराज सिंह चौहान के सिर डालकर उप चुनाव जीतने की है. राज्य के नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्री भूपेन्द्र सिंह कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी और उसकी सरकार पिछड़ा वर्ग का आरक्षण बढ़ाए जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रही है. सरकार सुप्रीम कोर्ट में किस आधार पर याचिका दायर करेगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है. राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का प्रतिशत चौदह से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किए जाने से कुल आरक्षण पचास प्रतिशत की सीमा को पार गया. राज्य में अनुसूचित जनजाति को बीस एवं अनुसूचित जाति को 16 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है. इस कारण ही वर्ष 1994 में दिग्विजय सिंह सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग को अधिकतम उपलब्ध चौदह प्रतिशत आरक्षण दिया था. राज्य में दस प्रतिशत आरक्षण आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को दिए जाने का प्रावधान भी कमलनाथ सरकार ने किया था. इस तरह राज्य में कुल आरक्षण 73 प्रतिशत हो गया. पिछड़ा वर्ग की लड़ाई में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग हाशिए पर चला गया है.


सामान्य वर्ग की नाराजगी से फिसल गई थी सत्ता





वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के हाथ से पंद्रह साल पुरानी सत्ता फिसल गई. पार्टी ने हार के कारणों की समीक्षा की यद्यपि ठोस कारण सामने नहीं आए. अनुमान यह लगाया कि सामान्य वर्ग की नाराजगी की वजह से भाजपा सरकार नहीं बना पाई. चुनाव से कुछ माह पहले ग्वालियर-चंबल संभाग में जातीय संघर्ष के हालात बने थे. इसका फायदा कांग्रेस को मिला. सपाक्स की चुनाव में मौजूदगी ने भी कुछ नुकसान किया. सपाक्स में सामान्य वर्ग के अलावा पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यकों को भी शामिल किया गया था. लेकिन,पिछड़ा वर्ग ने चुनाव से पहले ही अपना पल्ला झाड़ लिया था. अब यदि अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण बढ़ता है तो सामान्य वर्ग की नाराजगी भी उभरकर सामने आएगी?


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
दिनेश गुप्ता

दिनेश गुप्ता

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ आपका जुड़ाव रहा है.

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First published: July 30, 2021, 11:44 AM IST
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