1947 से 5 साल पहले ही आजाद हो गया था बलिया, फिर...

आज जब आजादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत 1942 की अगस्त क्रांति को याद किया जा रहा है, देखना प्रेरक है कि कैसे बलिया 1947 से पांच साल पहले ही आजाद हो गया था. यह आजादी भले कुछ दिन के लिए ही थी, परन्तु इतिहास में अमिट बन गई. बलिया के बागी बलिया बनाने वाली यह क्रांति लोगों को राष्ट्रीय चेतना के लिए उत्प्रेरित करती रहेगी.

Source: News18Hindi Last updated on: August 19, 2022, 6:52 pm IST
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1947 से पांच साल पहले ही आजाद हो गया था बलिया, फिर...
बलिया के बागी बलिया होने की कहानी

1942 की अगस्त क्रांति के दौरान पूरा देश आंदोलित हो उठा था. तब के संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) के बलिया में कुछ ऐसा हुआ, जिस कारण इस जिले को बागी भी कहा जाने लगा. ऐसा जिले भर में बगावत और अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंकने के कारण हुआ. तब कुछ दिनों के लिए चित्तू पाण्डेय के नेतृत्व में वहां ‘स्वदेशी सरकार’ की स्थापना कर ली गई थी. स्वदेशी सरकार ऐसी कि जिला कलेक्टर की कुर्सी पर चित्तू पाण्डेय थे, जो जिला स्तर से लेकर तहसील और थानों के प्रभारी भी स्थानीय लोग बनाए गए. बलियावासियों को इसका खामियाजा भी खूब भुगतना पड़ा. प्राप्त साक्ष्यों के अनुसार इस क्रांति में जिले के 84 लोग शहीद हो गए. पुलिस की पिटाई से घायल और जलाए गए घरों की संख्या तो गिने ही नहीं जा सके.


अंग्रेजी शासनकाल के पुलिस रिकॉर्ड में बलिया के लोगों के लिए कुछ जगह ‘बागी’ संज्ञा आई है, अन्यथा अधिकतर ऐसे लोगों को बलवाई और उनकी भीड़ को ‘मजमा कांग्रेसी’ कहा गया है. आज जब आजादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत 1942 की अगस्त क्रांति को याद किया जा रहा है, देखना प्रेरक है कि अंग्रेजी पुलिस की नजर में इस कथित बलवे के कारण बलिया 1947 से पांच साल पहले ही आजाद हो गया था. यह आजादी भले कुछ दिन के लिए ही थी, परन्तु इतिहास में अमिट बन गई.


1942 के उस अगस्त में यूं तो पूरब में मिदनापुर का तामलूक और पश्चिम में सतारा के कुछ हिस्से भी आजाद हुए थे, परन्तु वे अपनी भौगोलिक कारणों से अंग्रेजों की पहुंच से दूर थे. सतारा में क्रांति सिंह नाना पाटिल भूमिगत रहते हुए समानांतर सरकार (पत्रि सरकार) का नेतृत्व करते रहे. लोगों ने पुलिस को चकमा देकर हथियार ले लिए. गांवों में कमेटियां बनाकर सरकार के समानांतर काम किए गए. मिदनापुर के तामलूक में तो 17 दिसंबर,1942 से सितंबर,1944 तक जातीय सरकार (राष्ट्रीय सरकार) चली. तब राहत कार्य, स्कूलों को अनुदान, आपसी समझौते के लिए अदालतें बनाना और धनी लोगों के कुछ पैसे जरूरमंदों में बांटने तक के काम हुए. हालांकि भौगोलिक स्थिति के कारण तामलूक अंग्रेजों की पकड़ से दूर रहा. इसके विपरीत, बलिया में लोगों ने अंग्रेजों से सीधा मुकाबला किया. रेलवे लाइन से जुड़े बलिया निवासियों ने कई जगह रेल लाइन उखाड़ फेंका, अपने को स्वाधीन करा लिया और कई दिनों तक चित्तू पाण्डेय के नेतृत्व में अंग्रेजी शासन का खात्मा कर अपनी सरकार चलाई.


बाहर से बुलानी पड़ी थी फौज

बलिया में क्रांतिकारी आंदोलन सम्बंधी तथ्य प्रस्तुत करने में सावधानी की जरूरत है. सावधानी यह कि 1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह से जिले के गांवों में चेतना जरूर थी, लेकिन वहां 1942 की अगस्त क्रांति को स्वतः स्फूर्त ही कह सकते हैं. जिले का आंदोलनकारी नेतृत्व जेल में था और नए नेता आगे बढ़कर आंदोलन की कमान संभालते रहे. इनमें दलगत सीमा नहीं रही और गांधीवादी, समाजवादी, गरम दल और कम्युनिस्ट पार्टी से लेकर मुस्लिम लीग तक के कुछ पढ़े लिखे लोग शामिल थे. आठ अगस्त,1942 को तत्कालीन बंबई से गांधी जी के आह्वान के बाद बलिया शहर में 10 अगस्त को छात्र हड़ताल से शुरू इस कथा का पहला अध्याय जिले में स्वदेशी सरकार की साहसपूर्ण स्थापना तक का है. इसी में से जो दूसरा अध्याय बना, उसमें ब्रिटिश सरकार के गवर्नर ‘जनरल’ हैलेट की ओर से बनारस के कमिश्नर नेदरसोल को बलिया के प्रभारी जिलाधिकारी बनाने से शुरू होता है. इस अध्याय में नेदरसोल के नेतृत्व में बलूच फौज और स्थानीय पुलिस का कहर बरपाना शामिल है. तब 23 अगस्त को बक्सर की ओर से जलमार्ग से मार्क स्मिथ के नेतृत्व में और 24 अगस्त की सुबह आजमगढ़ की ओर से कैप्टन मुर के साथ फौज के सिपाही बलिया पहुंचे थे.


बड़ी संख्या में हुई शहादत

इस दौरान 19 अगस्त को साथियों संग जेल से छुड़ा लिए गए चित्तू पाण्डेय जिले के कलेक्टर की कुर्सी पर थे, तो महानन्द मिश्र को पुलिस कप्तान बनाया गया था. तब जिले के तहसीलों और थानों पर तिरंगा लहराता रहा, तो एक तहसील में सरकारी खजाने से कर्मचारियों के छह महीनों तक का अग्रिम वेतन देकर उन्हें स्वदेशी सरकार का हिस्सा बना लिया गया था. इसका खामियाजा बलियावासियों को खूब भुगतना पड़ा था. जब रेल लाइन की मरम्म्त कर और जल मार्ग से बलिया पहुंचीं अंग्रेजी सेना की टुकड़ियों ने जगह-जगह लोगों के घर जलाए और गोली बरसाए. इसके पहले सरकारी भवनों पर स्थानीय लोगों के कब्जे के दौरान भी बहुत से लोग मारे गए, इनमें अकेले बैरिया थाने पर तिरंगा कायम रखने की कोशिश में 13 ग्रामीण मौके पर ही शहीद हो गए थे. इस घटना में गोली लगे युवक कौशल किशोर की रास्ते में तो छह अन्य लोगों की अस्पताल में मृत्यु हो गई. उनकी याद में थाने के बाहर शहीद स्तंभ स्थापित है.


स्वतः स्फूर्त थी क्रांति

बलिया में इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय हलचल को ध्यान में रखना जरूरी है. सात और आठ अगस्त,1942 को तत्कालीन बंबई के गवालिया टैंक मैदान से जुड़ी महासभा और वर्किंग कमेटी की बैठक के बाद गांधीजी के ‘भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो’ के आह्वान पर मुहर लग चुकी थी. उधर, वायसराय की कौंसिल देश के हालात पर नजर रखे हुए थी. आठ अगस्त के ही एक अध्यादेश से महासमिति और आंदोलन की खबरें प्रकाशित करने पर रोक लग गई. नौ अगस्त की सुबह तक महात्मा गांधी सहित सभी बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए. बलिया में यह समाचार रेडियो के माध्यम से उस दिन शाम तक आया. परिणाम ‘नकल कॉन्फिडेंशियल डायरी बलिया कोतवाली’ (29 नवंबर 1942) में दिखता है- “अरज है कि मुख्तसरन इन वाकयात की कैफियत यह है कि इस जिले में कांग्रेसी सरगरमी अव्वलन 10 अगस्त,1942 ई. से लड़कों के जुलूस से शुरू हुई.”


स्पष्ट है कि बलिया के छात्रों अथवा कार्यकर्ताओं को किसी ऊंची कमेटी अथवा नेता से आंदोलन का आदेश नहीं मिला था. हां, जिलेभर में छात्र आंदोलन का नतीजा यह हुआ कि बेल्थरा रोड जैसी जगह पर प्रशासन की ओर से स्कूल बंद किए जाने के बावजूद छात्र स्कूल आकर जुलूस निकालते रहे. इधर, 11 अगस्त को बलिया शहर में छात्रों के जुलूस के साथ स्थानीय प्रतिष्ठानों ने स्वयं बंदी कर जुलूस में भागीदारी की. राम अनंत पाण्डेय ने चौक में जुलूस को संबोधित किया था. उन्हें शाम तक गिरफ्तार कर लिया गया. अगले दिन 12 अगस्त को बलिया में जुलूस निकाल रहे छात्रों पर जमकर लाठियां बरसाई गईं, कई को गिरफ्तार कर लिया गया. ब्रिटिश सरकार में भारत मामलों के सचिव मिस्टर एल. एस. एमरी के रेडियो भाषण ने आग में घी का काम किया. यह भाषण स्थानीय अखबारों में छपा था. एमरी ने कुछ हिंसा की आशंका जताने के बावजूद उस पर नियंत्रण का दावा किया था.


बन चुकी थी पृष्ठभूमि

एमरी के भाषण से बलिया में आंदोलनकारियों को जैसे रास्ता मिल गया. यहां एक और तथ्य ध्यान में रखना होगा कि 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह के बंदी रिहा किए जा चुके थे. परंतु 1942 के मई में इलाहाबाद में हुई वर्किंग कमेटी की बैठक के अनुरूप कार्यकर्ता सक्रिय रहे. बलिया में ‘आजाद हिन्द स्वयंसेवक दल’ का गठन हुआ था. चित्तू पाण्डेय, जगन्नाथ सिंह, शिवपूजन सिंह और राजेश्वर तिवारी जैसे लोग इसके तहत गांवों में काम कर रहे थे. आठ-नौ अगस्त के पहले ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था. उस क्रांति के अंत में जब 19 अगस्त को जिला कारागार से चित्तू पाण्डेय सहित सभी स्वतंत्रता सेनानियों को रिहा करा लिया गया, उसके बाद चित्तू पाण्डेय को संगठन का जिला अध्यक्ष होने के नाते उन्हें जिले का कलेक्टर घोषित किया गया. इस ऐतिहासिक तथ्य के पीछे भी यह ध्यान रखना होगा कि चित्तू पाण्डेय की अद्भुत सांगठनिक क्षमता और भोजपुरी वाले उनके उत्प्रेरक भाषण उन्हे कलेक्टर की जिम्मेदारी दिए जाने के कारण बने. उनकी अद्भुत कूटनीति ही कि जिले का प्रशासन स्वदेशी आंदोलनकारियों को जिले की बागडोर देने पर मजबूर हो उठा. चित्तू पाण्डेय, महानन्द मिश्र, जगन्नाथ सिंह और रामअनंत पाण्डेय जैसे नेताओं ने साफ शब्दों में कहा कि आक्रोश में कुछ भी कर गुजरने को आतुर जिलावासी ‘स्वायत्त सरकार’ बनने पर ही शांत होंगे. बहरहाल, बलिया की इस क्रांति के दौरान जिले में जगह-जगह जो हुआ, वह गाथा प्रणम्य है.


प्रेरित करते रहे युवा सेनानी

नौ अगस्त को अन्य साथियों के साथ गिरफ्तार होते ठाकुर राधामोहन सिंह कह गए कि इस गिरफ्तारी को आंदोलन का अंत न समझें. यदि सुनियोजित ढंग से आप लोग बढ़ते रहे तो हम सभी एक हफ्ते में बाहर आ जाएंगे. बहरहाल, 12 अगस्त को बलिया में छात्रों पर लाठी चार्ज के बाद संयोग से 13 अगस्त को बिल्थरारोड के पास डंबर बाबा की परती पर मेला लगा हुआ था. वहां एक सभा में अगले दिन रेलवे स्टेशन पर धावा बोलने का फैसला हुआ. तब 13 और 14 अगस्त की रात लगभग एक बजे आने वाली ट्रेन सुबह आठ बजे पहुंची. एक दिन पहले सभा कर चुके बीएचयू के पारसनाथ मिश्र, उमादत्त सिंह, केदारनाथ सिंह ने लोगों को ललकारा. तब तो लोग लौट गए, पर फिर तैयारी के साथ आए. खड़ी ट्रेन के आगे रेलवे लाइन तोड़ दी गई. पीछे ट्रेन में चीनी और शीरा लदा था, उसकी लूट शुरू हो गई.


1942 की उस क्रांति में ट्रेनों और बीज गोदाम के साथ तहसील और थाने लूटने की कई घटनाएं हुईं. इस लूट में एक खास बात यह रही कि लूटे गए रुपए स्वायत्त सरकार के संचालन के लिए जमा करा दिए गए. बलियावासियों की इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी. बैरिया थाने की बहुचर्चित घटना के अलावा इसके पहले 16 अगस्त को बलिया शहर के गुदरी बाजार में सात लोग पुलिस की गोली से मारे गए. धोखे से रसड़ा के गुलाबचंद के हाते में बुलाए गए लोगों पर फायरिंग से चार लोगों की मृत्यु हो गई. कई घटनाएं तो ऐसी कि अंग्रेजी सिपाहियों ने लाश भी नहीं दी. रेललाइन तोड़ती भीड़ पर गोली से घायल चंद्रदीप सिंह को सिपाही मालगाड़ी के डिब्बे में डालकर ले गए और फिर घाघरा नदी में फेंक दिया.


चरौंवा गांव में मकतुलिया मालिन ने क्रांतिकारियों पर पिस्तौल ताने कैप्टन मूर को देखा तो पक्षियों से फूल-पौधों को बचाने के लिए बने मिट्टी की हांडी ही उसे दे मारी. इस पर तिलमिलाए मूर ने मकतुलिया को गोली मार दी. इस तरह की कई घटनाएं हैं. महिलाओं ने तो जैसे घर के साथ देश की जिम्मेदारी ले ली थी. प्रारम्भ में ही जिम्मेदार कुर्सियों पर बैठे भारतीयों को ललकारा गया. जानकी देवी ने सिविल जज के कुर्सी नहीं छोड़ने पर उन्हें चूड़ियां भेंट कर पहन लेने को कहा.


जान देकर चुकाई कीमत

नेदरसोल के नेतृत्व में कुलियों एवं इंजीनियर की मदद से रेलवे लाइन ठीक करती ब्रिटिश फौज 22 एवं 23 अगस्त को देर रात बलिया स्टेशन पहुंची. उधर, मार्क स्मिथ के नेतृत्व बक्सर में भी 23 को दोपहर में जल मार्ग से सेना की एक अन्य टुकड़ी आई. इन दोनों ने जिले भर में घूम घूम कर योजनागत ढंग से कहर ढाया. बेमतलब लोगों पर फायर किए गए. सरे बाजार नंगा कर पीटा गया. युवकों को पेड़ से लटकाकर उन्हें संगीनें चुभाई गईं. कई घरों को फूंक दिया गया. जिन्होंने नेतृत्व किया अथवा आंदोलनकारियों को संरक्षण दिया, उन्हें लूटा गया. इस दौरान कई लोगों की मौत हो गई और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए. समय के साथ यह पता चला है कि 1942 की क्रांति के दौरान बलिया में 84 लोग शहीद हुए थे. महत्वपूर्ण यह है कि 1942 की क्रांति की चिनगारी के चलते बलिया ने इतिहास में अपना अमिट स्थान बना लिया. निश्चित ही यह क्रांति लोगों को राष्ट्रीय चेतना के लिए उत्प्रेरित करती रहेगी.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
डॉ. प्रभात ओझा

डॉ. प्रभात ओझापत्रकार और लेखक

हिन्दी पत्रकारिता में 35 वर्ष से अधिक समय से जुड़ाव। नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित गांधी के विचारों पर पुस्तक ‘गांधी के फिनिक्स के सम्पादक’ और हिन्दी बुक सेंटर से आई ‘शिवपुरी से श्वालबाख’ के लेखक. पाक्षिक पत्रिका यथावत के समन्वय सम्पादक रहे. फिलहाल बहुभाषी न्यूज एजेंसी ‘हिन्दुस्थान समाचार’ से जुड़े हैं.

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First published: August 19, 2022, 6:52 pm IST