अपना शहर चुनें

States

Opinion: पीएम मोदी अपने आलोचकों के उलट एक प्रतिबद्ध संविधानवादी हैं

2019 में मन की बात के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने भारतीयों को संवैधानिक आदर्शों और मूल्यों को बनाए रखने और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित किया था.

Source: News18Hindi Last updated on: November 27, 2020, 3:16 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
Opinion: पीएम मोदी अपने आलोचकों के उलट एक प्रतिबद्ध संविधानवादी हैं
2010 में संविधान के 60 साल पूरे होने पर गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी ने गुजरात गौरव यात्रा निकाली थी.
संविधान दिवस (Constitution Day) या उसके आसपास के मौके पर कई ऐसे लोग संविधान (Constitution) को लेकर उमड़ा नया-नया प्रेम जताते दिखेंगे, जिसे उन्होंने हर मौके पर रौंदा है. उन लोगों के विपरीत, जिनके नाम अभिव्यक्ति की आजादी, स्वतंत्रता के सांवैधानिक मूल्यों को रौंदने का रिकॉर्ड है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आधुनिक भारत के संस्थापकों द्वारा दिखाए गए संविधान के जगमगाते पथ पर चलने का संकल्प दिखाया है.

यहां यह बताना उचित होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार यह दिखाया है कि संविधान के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा है, जो लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए नए भारत के विकास के लिए संविधान के तहत बताए गए रास्ते के अनुसार काम कर रहे हैं.

कई लोगों को प्रधानमंत्री मोदी का संविधान के प्रति सम्मान याद होगा, जब उन्होंने 2019 में आम चुनाव जीतने के बाद संसद के केंद्रीय हॉल में सिर झुकाया था. इससे पहले 2014 में उन्होंने लोकतंत्र के मंदिर संसद में प्रवेश से पहले इसकी सीढ़ियों पर माथा टेका था. संविधान और संवैधानिक मूल्यों के प्रति सम्मान के ये उदाहरण उनके प्रधानमंत्री बनने से पहले ही उनकी विश्वदृष्टि का हिस्सा है.

गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने 2010 में संविधान गौरव यात्रा निकाली थी. संविधान दिवस की 60वीं वर्षगांठ मनाने के लिए डॉक्टर बीआर आंबेडर की मूर्ति के सामने संविधान की एक विशालकाय प्रतिकृति रखी गई थी. यह प्रतिकृति एक सजे हुए हाथी पर रखी गई थी, जिसे सार्वजनिक जगहों पर ले जाया गया था. इस दौरान पीएम मोदी ने यह पूरी दूरी पैदल चलकर ही पूरी की. संकेत साफ थे कि उनकी नजर में संविधान तथा उसके आदर्श हर व्यक्ति और हर चीज से काफी ऊपर खड़े हैं.
इस वाक्ये से यह भी पता चलता है कि पीएम मोदी के मन में बाबासाहेब के प्रति कितना सम्मान है. इस बात में कोई आश्चर्य नहीं कि मोदी सरकार उन पांच जगहों को पंच तीर्थ के रूप से विकसित कर रही है, जो डॉक्टर बीआर आंबेडकर के प्रेरणादायी जीवन से काफी नजदीकी तौर पर जुड़े हुए हैं. यही दर्शन रहा, जो नरेंद्र मोदी सरकार को 2015 में केंद्र में संविधान दिवस को राष्ट्र के खास दिन की तरह मनाने की परंपरा शुरू करने की ओर ले गया.

प्रधानमंत्री मोदी ने हमशा कहा है कि संविधान एक सामाजिक दस्तावेज है, जो लोगों को ताकतवर अधिकारों से सशक्त करता है. फिर चाहे 126वां संवैधानिक संशोधन बिल हो, जिसने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को दिए गए आरक्षण को 10 और सालों तक बढ़ाने का काम किया. या जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को भारत में मिलाने के लिए अनुच्छेद 370 के अस्थाई प्रावधानों को हटाते हुए अखंड भारत का सपना पूरा करने का काम किया. वहां एक ऐसे शासन का अंत किया, जिसने लोगों को अलग-थलग रखा हुआ था और महिलाओं, अनुसूचित जाति-जनजाति, विभाजन के बाद आए शरणार्थियों और अन्य लोगों के साथ भेदभाव करता था.

सरकार ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देकर भारत के पिछड़े वर्गों को उनके खिलाफ अत्याचार से लड़ने के लिए सशक्त बनाने का काम किया है. सरकार ने एससी/एसटी एट्रोसिटीज एक्ट को भी मजबूत किया. मोदी सरकार ने आर्थिक असमानता को संबोधित करने के लिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 10 फीसदी आरक्षण देने के लिए एक संवैधानिक संशोधन भी किया था.2019 में मन की बात के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीयों को संवैधानिक आदर्शों और मूल्यों को बनाए रखने और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित किया. हालांकि, यह कोई पहला मौका नहीं था जब यह मुद्दा उठाया गया. पीएम मोदी ने कहा है कि संविधान ने भारतीयों को कई अधिकार दिए हैं, लेकिन इसने नागरिकों के मूल कर्तव्यों पर भी जोर दिया है. अब तक भी उन्होंने बार-बार कहा है कि लोगों को सामान्य जीवन में भी अपने कर्तव्यों के बारे में चर्चा करनी चाहिए और लोगों में जागरूकता बढ़ानी चाहिए.

पीएम मोदी कई बार संस्थानों का सम्मान बनाए रखने के लिए कर्तव्य की इसी भावना के साथ चले हैं, तब भी जब चीजें उस तरह से नहीं चली हैं जैसा वह और उनकी सरकार चाहती थी.

कई चुनावी उतार-चढ़ावों के लिए संस्थानों पर आरोप लगाए बगैर समान रूप से स्वीकार किया. संसद की उत्पादकता बीते दशकों के सभी रिकॉर्ड्स और उम्मीदों को पार कर गई. यहां तक कि कई कई ऐतिहासिक बिल कठिन बहसों के जरिए पास किए गए.

एक वक्त था जब महत्वपूर्ण संस्थानों में होने वाली नियुक्ति या तो भ्रष्ट होती थी या यूपीए के चुने गए उम्मीदवारों की होती थी. हालांकि आज हम ऐसे समय में हैं जब ऐसी नियुक्तियों में कोई विवाद नहीं उठता.

सरकार के नजरिए से अलग आए न्यायपालिका के कई फैसलों का सम्मान किया गया. इसके उलट संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करने की बात करने वाले लोग प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोन लाने की तैयारी करते दिखे. यहां तक कि राम जन्मभूमि को लेकर आए अनुकूल दिख रहे फैसले के बाद भी पीएम मोदी ने इसका अकेले राजनीतिक श्रेय लेने की जगह समाजिक सद्भाव और एकता बनाए रखने पर जोर दिया.

ऐसे में भारत के लोगों के सामने यह स्पष्ट है कि असल संविधानवादी कौन हैं, जो संस्थानों का सम्मान करने, मूल्यों को ऊंचा रखने और उन आदर्शों के प्रति काम करता है, जो हमारे संविधान निर्माताओं ने आधुनिक भारत के लिए तैयार किए हैं.
ब्लॉगर के बारे में
गौरव भाटिया

गौरव भाटियाभाजपा प्रवक्ता, वरिष्ठ वकील

गौरव भाटिया भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हैं.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: November 27, 2020, 8:12 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर