कृषि कानूनः प्रधानमंत्री का संदेश साफ है- सरकार नहीं झुकेगी

प्रधानमंत्री ने भाषण में न सिर्फ किसान बिलों के बारे में उठाई जा रही शंकाओं व भ्रामक धारणाओं का निवारण करने की कोशिश की, बल्कि इस बहाने अपने राजनीतिक विरोधियों को भी बहुत सधे हुए लेकिन तीखे तरीके से निशाना बनाया.

Source: News18Hindi Last updated on: December 25, 2020, 8:21 PM IST
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कृषि कानूनः प्रधानमंत्री का संदेश साफ है- सरकार नहीं झुकेगी
प्रधानमंत्री 100वीं किसान रेल को हरी झंडी दिखाने जा रहे हैं. (फाइल फोटो)
करीब एक महीने से चल रहे किसान आंदोलन के संदर्भ में, शुक्रवार को जिसने भी प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी का भाषण सुना होगा उसे एक बात तो अच्‍छी तरह समझ आ गई होगी कि सरकार इन कानूनों को वापस लेने की आंदोलनकारियों की मुख्‍य मांग पर कतई झुकने वाली नहीं है. प्रधानमंत्री ने ‘तर्कों और तथ्‍यों’ के आधार पर ‘नम्रता’ से बातचीत का प्रस्‍ताव जरूर किया है, लेकिन उनके भाषण से साफ हो गया है कि सरकार ने सामाजिक और राजनीतिक दोनों ही मोर्चों पर इस आंदोलन से निपटने के लिए तैयार कर ली है.

सही है या गलत यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार ने जमीनी तौर पर या इंटेलीजेंस के जरिये जो सूचनाएं जुटाई हैं, उन्‍हें लेकर वह इस बात से आश्‍वस्‍त है कि आंदोलन ज्‍यादा दिन नहीं चलने वाला. साथ ही यह भी कि न तो इस आंदोलन को किसानों के बड़े वर्ग का समर्थन है और न ही भाजपा को इससे कोई राजनीतिक नुकसान नजर आ रहा है. यदि ऐसा नहीं होता तो आंदोलनकारियों को लगातार बातचीत के लिए न्‍योता देने के बीच प्रधानमंत्री इस आंदोलन को ‘इवेंट मैनेजमेंट’ नहीं कहते.

नरेंद्र मोदी ने 50 मिनिट के भाषण में अपनी सरकार की ओर से लाए गए किसान बिलों को लेकर जताई जा रही तमाम शंकाओं को निराधार बताते हुए, बिलों के समर्थन में उन्‍हीं बातों को दोहराया जो सरकार और उसके नुमाइंदे आंदोलन के पहले दिन से ही बताते आ रहे हैं. इन बातों का लब्‍बोलुआब यही है कि जो बिल लाए गए हैं वे किसानों के हित में हैं और किसान तथा देश की खेती के लिए समृद्धि के नए द्वार खोलेंगे. और यह भी कि कुछ ताकतें हैं जो किसानों को गुमराह कर अपने राजनीतिक फायदे के लिए उनसे इन बिलों का विरोध करवा रही हैं.

प्रधानमंत्री ने भाषण में न सिर्फ किसान बिलों के बारे में उठाई जा रही शंकाओं व भ्रामक धारणाओं का निवारण करने की कोशिश की, बल्कि इस बहाने अपने राजनीतिक विरोधियों को भी बहुत सधे हुए लेकिन तीखे तरीके से निशाना बनाया. खास निशाना पश्चिम बंगाल की सरकार और मुख्‍यमंत्री ममता बैनर्जी रहीं जिन पर मोदी ने आरोप लगाया कि वे किसान कल्‍याण योजना का पैसा राज्‍य के किसानों तक पहुंचने देने में सबसे बड़ा अडंगा बनी हुई हैं जबकि इसमें राज्‍य सरकार का एक पैसा भी नहीं लगना है.
इसी तरह केरल की वापमंथी सरकार को निशाना बनाते हुए उन्‍होंने कहा कि आपने तो अपने यहां एपीएमसी की व्‍यवस्‍था ही खत्‍म करके रखी है फिर आप किस मुंह से इस मुद्दे पर बात कर रहे हैं. ऐसे ही उन्‍होंने पंजाब में अमरिंदरसिंह के नेतृत्‍व वाली कांग्रेस सरकार से पूछा कि आपके यहां तो कांट्रैक्‍ट फार्मिंग की व्‍यवस्‍था पहले से चली आ रही है फिर आज इसका विरोध करने का क्‍या मतलब है? यानी मोदी ने चुन चुनकर उन रानजीतिक दलों, खासतौर से वामपंथियों और कांग्रेस को निशाना बनाया जो इस आंदोलन में बढ़चढ़कर बयानबाजी कर रहे हैं.

इस आंदोलन से निपटने के लिए भाजपा और केंद्र सरकार की सामाजिक और राजनीतिक रणीनीति का पता इसी बात से चलता है कि मोदी ने असम, राजस्‍थान और जम्‍मू कश्‍मीर में हुए पंचायत एवं जिला परिषदों के चुनावों का हवाला देते हुए कहा कि ये चुनाव ग्रामीण संस्‍थाओं के ही थे जिनमें ज्‍यादातर उन्‍हीं लोगों ने भाग लिया जो खेती किसानी से जुड़े हैं.


यदि आंदोलन का इतना ही असर होता तो, आंदोलन को लेकर हवा बनाने वाले दलों की, इन चुनावों में वैसी हवा नहीं निकलती जैसी निकली है. उलटे यहां के लोगों ने भाजपा को समर्थन देकर एक तरह से आंदोलन को नकारा और बिलों का समर्थन ही किया है.दूसरी तरफ प्रधानमंत्री ने किसानों के बीच ही खासतौर से लघु और सीमांत किसानों पर ज्‍यादा जोर दिया. उन्‍होंने कहा कि इन बिलों का फायदा छोटे और गरीब किसानों को सबसे ज्‍यादा होगा और उनकी आय बढ़ने के साथ, उनके लिए खुशहाली के दरवाजे भी खुलेंगे. ऐसे किसानों की बात करते समय मोदी ने न सिर्फ नए बिलों के फायदे गिनाए बल्कि लगे हाथ उन्‍होंने इस वर्ग को अपनी सरकार की अन्‍य कल्‍याणकारी योजनाओं से होने वाले फायदे भी गिना दिए. मकान, बिजली, पानी, सिंचाई, गैस, चिकित्‍सा से जुड़ी कई योजनाओं का हवाला देते हुए उन्‍होंने कहा कि सरकार हर तरह से गरीब किसानों की मदद में लगी है लेकिन कुछ ताकतें हैं जो ऐसा नहीं होने देना चाहतीं.

इसका मतलब यह है कि आने वाले दिनों में सरकार और सत्‍तारूढ़ दल भाजपा, एक तरफ कांग्रेस और वामपंथी दलों पर अपना हमला तेज करेंगे, वहीं लघु और सीमांत किसानों तथा बड़े किसानों के बीच लकीर खींचते हुए, इस आंदोलन को बड़े और समृद्ध किसानों का शगल बताते हुए उनके बरक्‍स छोटे व गरीब किसानों को खड़ा करने की कोशिश करेंगे. हो सकता है ऐसे छोटे किसानों का प्रतिनिधित्‍व करने वाले कुछ संगठन भी आने वाले दिनों में सरकार के साथ खड़े नजर आएं.

किसान आंदोलन को लेकर होने वाले प्रचार प्रसार पर भी मोदी ने तीखा हमला करते हुए कहा कि कुछ लोग इस आंदोलन में ‘फोटो अपॉर्चुनिटी’ देख रहे हैं. उन्‍होंने टोल नाकों का विरोध किए जाने और हिंसा के आरोपियों को जेल से छुड़ाने की मांग का हवाला देते हुए यह बताने की कोशिश की यह आंदोलन किसानों का नहीं बल्कि उनके बहाने किन्‍हीं और ही लोगों का है. मोदी ने किसानों से ऐसे किसी बहकावे में न आने की अपील करते हुए कहा कि 21 वीं सदी में खेती को आधुनिक बनाना ही होगा और सरकार को भरोसा है कि किसान उसे अपना समर्थन देंगे. सरकार भी किसानों के भरोसे को टूटने नहीं देगी.
कुल मिलाकर प्रधानमंत्री के किसानों से संवाद के बाद यह बात बिलकुल साफ है कि सरकार ने आंदोलन के सामने न झुकने का फैसला कर लिया है. अब उसे या तो इसके परिणामों की कोई चिंता नहीं है या फिर उसके पास इस बात का कोई पुख्‍ता आकलन है कि आंदोलन से उसका राजनीतिक रूप से कोई नुकसान नहीं होने वाला. प्रधानमंत्री की इस दो टूक के बाद आंदोलनरत किसान संगठन क्‍या और कैसी प्रतिक्रिया देते हैं, वे बातचीत के लिए आगे आते हैं या फिर आंदोलन को जारी रखते हैं इस पर सारी निगाहें टिकी होंगी. बस सबसे बड़ा खतरा एक ही बात का है कि अब तक जो आंदोलन मोटे तौर पर शांतिपूर्ण तरीके से चला है, कहीं वह कोई हिंसक मोड़ न ले ले.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
गिरीश उपाध्याय

गिरीश उपाध्यायपत्रकार, लेखक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. नई दुनिया के संपादक रह चुके हैं.

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First published: December 25, 2020, 6:59 PM IST
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