इस ‘पोस्‍ट ट्रुथ’ माहौल में सच पर अड़ने वाले गांधी को कहां खोजें

महात्मा गांधी (Gandhi Jayanti) अपने कर्म में विशुद्ध सत्‍य यानी प्‍योर ट्रुथ की बात करते हैं, लेकिन आज पोस्‍टट्रुथ का जमाना है. सवाल यह है कि पोस्‍टपेड और प्रीपेड राजनीति के इस दौर में पोस्‍टट्रुथ जैसी स्थितियों से हम कैसे निपट पाएंगे. हर आंदोलन के पीछे एक विचार होता है. आज कौन है जो विचार या विचारधारा पर चल रहा है. दरअसल जो चल रहा है वह ‘राजनीतिक सुविधावाद’ है और सारे दलों में यह वाद, निर्विवाद रूप से मौजूद है.

Source: News18Hindi Last updated on: October 2, 2020, 7:10 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
इस ‘पोस्‍ट ट्रुथ’ माहौल में सच पर अड़ने वाले गांधी को कहां खोजें
महात्मा गांधी.
महात्‍मा गांधी के अवदान को लेकर जब भी चर्चा होती है उसमें उनके द्वारा शुरू किए गए अलग अलग आंदोलनों का जिक्र जरूर होता है. दरअसल, गांधीजी ने न सिर्फ भारत को बल्कि पूरी दुनिया को आंदोलन का एक अनूठा रास्‍ता दिखाया था. ऐसा रास्‍ता जो हिंसा या उग्रता पर आधारित न होकर भारतीय मूल्‍यों के अनुरूप अहिंसा और संयम पर आधारित था. लेकिन आज यदि देखें तो लगता है कि विरोध और असहमति प्रकट करने का जो रास्‍ता गांधी ने हमें बताया था उससे अलग हम आंदोलनों की हिंसक और आक्रामक राह पर चल पड़े हैं.

यह बात अलग है कि गांधी के आंदोलनों के तौरतरीकों को लेकर संविधान की मसौदा समिति के अध्‍यक्ष बाबा साहब आंबेडकर भी अलग राय रखते थे. संविधान का मसौदा तैयार करने के बाद, संविधान सभा के समक्ष दिए गए अपने अंतिम और धन्‍यवाद भाषण में बाबा साहब आंबेडकर ने कहा था- ‘यदि हमें अपने सामाजिक और आर्थिक उद्देश्‍यों को प्राप्‍त करना है तो हमें संवैधानिक प्रक्रियाओं और विधियों को मजबूती से पकड़कर रखना होगा. इसका मतलब है कि हम खूनी क्रांति के रास्‍ते को बिलकुल त्‍याग दें.’
और सिर्फ खूनी क्रांति ही नहीं, बाबा साहब ने तो सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्‍याग्रह जैसे आंदोलन के गांधीवादी तरीके भी त्‍यागने को कहा था. उनकी नजर में ये सारे तरीके असंवैधानिक थे. उन्‍होंने ऐसे सारे तौर तरीकों को ‘अराजकता के व्‍याकरण’ का नाम दिया था.

हमने संविधान तो बना दिया, कानून भी बना दिए लेकिन इस बात का कोई पुख्‍ता मैकेनिज्‍म तैयार नहीं किया कि यदि संविधान और कानून ही अपना काम न कर पाएं तो आजाद और लोकतांत्रिक भारत में उस स्थिति से कैसे निपटा जाए? विडंबना यह है कि अव्‍वल तो ऐसा कोई कारगर तरीका हमारे पास नहीं है और यदि उसके कुछ सूत्र हैं भी तो वे उस जन या लोक के पास नहीं है जो संविधान और कानून का निर्माण करने वाली संस्‍थाओं का निर्माता है. ऐसे सारे सूत्र सत्‍ता या सरकारों के ही हाथ में हैं, जबकि करीब करीब सारे आंदोलन इनके ही खिलाफ होते हैं.
यह सवाल कई बार उठाया जाता है कि यदि हम सरकार के किसी फैसले के विरोध में हों और विरोध में न भी हों तो उससे असहमत ही हों, तो हम अपनी असहमति या आपत्ति को कैसे प्रकट करें? कारण ये कि असहमति और आपत्ति प्रकट करने के जो प्रचलित तौरतरीके हैं वे कानून के उल्‍लंघन के दायरे में बता दिए जाते हैं. यदि कोई सरकार के किसी फैसले से असहमत होते हुए, व्‍यक्तिगत तौर पर या किसी समूह के साथ, उसके खिलाफ प्रदर्शन या आंदोलन करता है, तो उससे निपटने का तरीका सरकार के पास सिर्फ उसी कानून के अंतर्गत है जो कानून हमने बुनियादी तौर पर अपराधों से निपटने के लिए बनाया है. यानी हमारे पास न तो असहमति या आपत्ति को प्रकट करने की कोई पुख्‍ता संवैधानिक मेथड है और न ही ऐसी स्थिति से निपटने का कोई सम्‍मानजनक तरीका.

एक मुद्दा आंदोलनों के नेतृत्‍व का भी है. गांधी ने जिन आंदोलनों का नेतृत्‍व किया उनके लगभग सारे सूत्र उनके हाथ में रहते थे. आंदोलन को शुरू करने से लेकर उसे खत्‍म करने या बीच में ही रोक देने की ताकत और सामर्थ्‍य दोनों उनमें थे. आज ऐसा नहीं दिखता. गांधी में दम था कि वे आंदोलन खड़ा करने और उस आंदोलन के उनकी योजना के विपरीत जाने या उसमें हिंसा होने पर वे उसे वापस लेने की ताकत भी रखते थे. चौरीचौरा कांड इसका बेहतरीन उदाहरण है. यानी टेक ऑफ और लैंडिग के गियर गांधी के हाथ में होते थे.


आज उस तरह के नेतृत्‍व का अभाव नजर आता है. अव्‍वल तो अब वैसे आंदोलन होते नहीं और थोड़ा बहुत धरना प्रदर्शन आदि होता भी है तो किसी भी नेता में इतना दम नहीं कि वह बेकाबू हो चुके आंदोलनाकरियों को चुप या शांत करवा कर आंदोलन को अराजक होने से रोक सके. आज आग लगाने के लिए, भड़काने वाले तो बहुत मिल जाएंगे, मॉब लिंचर्स को उकसाने वाले मिल जाएंगे लेकिन कोई माई का लाल ऐसा नहीं मिलेगा जो आग लगाने या मॉब लिंचिंग पर उतारू भीड़ को एक आवाज में वापस बुला सके या उन्‍हें रोक सके.कई बार आंदोलनों के गांधीवादी तरीके से किए जाने की बात तो उठती है लेकिन समान रूप से यह सवाल भी उठता है कि जब आंदोलन के सूत्रधार ही उसके सूत्रों या उसकी लगाम को थामे रखने की कूवत नहीं रखते तो फिर हम गांधीवादी तौर तरीकों वाले आंदोलनों के बारे में सोच भी कैसे सकते हैं. एक और विडंबना देखिए कि जिस देश ने व्‍यापक जन आंदोलनों के जरिए आजादी पाई हो, वह आजाद होने के बाद ऐसे किसी भी आंदोलन या विरोध प्रदर्शन को नाजायज मानने लगा है. हिंसा अगर हो तो किसी आंदोलन पर कार्रवाई की बात समझ में आती है लेकिन आज तो सरकारें आंदोलनों के लिए जगह तक देने को तैयार नहीं हैं.

और अब तो स्थिति यह है कि सरकारें ही किसी आंदोलन के विरोध में खुद समानांतर आंदोलन खड़े करने लगी हैं. ऐसे आंदोलन सड़क से लेकर सोशल मीडिया पर छाए रहते हैं. इनका मकसद वास्‍तविक समस्‍याओं से ध्‍यान भटकाकर दूसरी तरफ ध्‍यान बंटाने का होता है. यानी आंदोलन की काट आंदोलन से ही की जा रही है.


गांधी ने कभी किसी व्‍यक्ति के लिए आंदोलन नहीं किया और न ही किसी व्‍यक्ति की सत्‍ता को स्‍थापित करने की कोशिश की. पर आज के आंदोलनों के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता. मेरे विचार से गांधी के बाद यदि कोई आंदोलन हुआ जिसे सचमुच आंदोलन कहा जा सकता है तो वह जेपी आंदोलन था. उसके बाद, यानी 1975 के बाद से देश में वैसा कोई आंदोलन नहीं हुआ. कुछ लोग इस सिलसिले में अण्‍णा आंदोलन का जिक्र कर सकते हैं लेकिन हमें यह भी स्‍वीकार करना होगा कि उस आंदोलन की भी अपनी सीमाएं और विवशताएं थीं. इसके अलावा होने वाले मोमबत्तियां धरना, प्रदर्शनों को मैं आंदोलन की श्रेणी में नहीं रखता.

गांधी का आंदोलन स्‍वदेशी था. उनका विचार भी स्‍वदेशी था और उनके आंदोलनों के टूल्‍स भी स्‍वदेशी थे. आज स्‍वदेशी की भावभूमि पर तो कोई आंदोलन दिखता ही नहीं. भूमंडलीकरण को हावी करने वाली ताकतें ऐसे किसी स्‍वदेशी विचार को पनपते ही कुचल देती हैं जो उनके विस्‍तारवाद के लिए खतरा हो. गांधी की राजनीति सत्‍य और अहिंसा पर आधारित थी. आज की राजनीति खुल्‍लमखुल्‍ला झूठ और हिंसा पर टिकी है. और यह हिंसा केवल शारीरिक ही नहीं है, वैचारिक, मानसिक और पारिस्थितिक भी है. भारतेंदु हरिश्‍चंद्र का एक मशहूर नाटक है ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’, आज यह बदलकर ‘राजनीतिक हिंसा, हिंसा न भवति’ हो गया है.

गांधी अपने कर्म में विशुद्ध सत्‍य यानी प्‍योर ट्रुथ की बात करते हैं, लेकिन आज जमाना पोस्‍टट्रुथ का है. सवाल यह है पोस्‍टपेड और प्रीपेड राजनीति के इस दौर में पोस्‍टट्रुथ जैसी स्थितियों से हम कैसे निपट पाएंगे. हर आंदोलन के पीछे एक विचार होता है. पर आज कौन है जो विचार या विचारधारा पर चल रहा है. दरअसल जो चल रहा है वह ‘राजनीतिक सुविधावाद’ है और सारे दलों में यह वाद, निर्विवाद रूप से मौजूद है.

आज भी लगता है कि भारत के लिए गांधी का तरीका सबसे मुफीद है. लेकिन दिक्‍कत यह हुई है कि गांधी के विचार या तौरतरीकों को हमने हमेशा पूज्‍य भाव से लिया. समय और परिस्थितियों के हिसाब से उसमें संशोधन या बदलाव की कोशिश नहीं की, उसे आज की जरूरतों और परिस्थितियों के हिसाब से ढालने का प्रयास नहीं किया. गांधी ने तो सत्‍य के साथ भी प्रयोग किए थे, लेकिन हमने आजाद भारत में गांधी के साथ कितने प्रयोग किए. हां, राजनीतिक लाभ के लिए उनके नाम का उपयोग या दुरुपयोग जरूर किया. आज सबसे ज्‍यादा जरूरत गांधी को ‘रिथिंक’ और ‘रिडिफाइन’ करने की है. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
गिरीश उपाध्याय

गिरीश उपाध्यायपत्रकार, लेखक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. नई दुनिया के संपादक रह चुके हैं.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: October 2, 2020, 7:16 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर