निकिता केस: ‘दोस्‍ती और प्रेम’ के नाम पर बढ़ते अपराध और जान गंवातीं महिलाएं?

चिंता की बात यह है कि ऐसी घटनाओं में शिकार लड़कियां ही हो रही हैं फिर चाहे शादी के पहले हो या फिर शादी के बाद. उनका किसी से परिचय हो या फिर ‘एकतरफा’ मामला. ‘दोस्‍ती’ और ‘प्रेम’ जैसे शब्‍द ही जब अविश्‍वास के घेरे में आ गए हों तो समाज में हम सद्भाव और सौहार्द की बात सोच भी कैसे सकते हैं?

Source: News18Hindi Last updated on: October 29, 2020, 2:24 PM IST
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निकिता केस: ‘दोस्‍ती और प्रेम’ के नाम पर बढ़ते अपराध और जान गंवातीं महिलाएं?
बल्लभगढ़ में छात्रा की गोली मारकर हत्या
निकिता तोमर... यह तो जैसे बस एक नाम है, जो वल्लभगढ़ में सामने आया. ऐसी ना जाने कितनी लड़कियां हैं, जो रोज किसी सिरफिरे की दोस्ती या प्रेम को ठुकराने के कारण जान गंवा रही हैं. देश में हो रही इन घटनाओं ने इस बात पर सोचने को मजबूर किया है कि महिला सुरक्षा की जितनी अधिक बातें हो रही हैं, क्या महिलाएं उतनी ही अधिक असुरक्षित होती जा रही हैं? खासतौर से युवा लड़कियों पर तो असुरक्षा का यह खतरा बहुत अधिक बढ़ गया है. युवा लड़कियों के साथ होने वाली घटनाओं ने यह सवाल भी उठाया है कि क्‍या प्रेम और स्‍नेह जैसे शब्‍द अपना अर्थ ही खोते जा रहे हैं?
कुछ ताजा मामले लीजिये. पहले हाथरस, फिर बलरामपुर, फिर बल्‍लभगढ़ और अब इंदौर... इन सभी घटनाओं के पीछे आपको एक कॉमन फेक्‍टर नजर आएगा. करीब-करीब सभी में मामला या तो एकतरफा प्रेम का है या फिर प्रेमी या प्रेमिका पर कथित अविश्‍वास का. और खतरनाक बात ये है कि इन सभी की परिणति लड़कियों की मौत के रूप में हुई है.

हाथरस कांड में यह बात भी कही गई थी कि मृतका और उसकी मौत के जिम्‍मेदार आरोपी के बीच पुरानी जान पहचान थी. यानी दोनों एक दूसरे से अपरिचित तो कतई नहीं थे. दोनों के बीच परिचय/दोस्‍ती या इन दोनों बातों से भी आगे बढ़कर कुछ है, इस बात की जानकारी समाज को भी थी. बलरामपुर में भी लड़की के साथ वारदात करने वाले अपरिचित नहीं थे. परिवार भले ही जानता हो या न जानता हो लेकिन लड़की को पता था कि कोई उसके पीछे पड़ा है.

अंतत: लड़की को जान गंवानी पड़ी...
बल्‍लभगढ़ में हुई घटना का संदर्भ भी तात्‍कालिक नहीं है. वहां भी लड़की और लड़के बीच अपरिचय जैसा कुछ नहीं था. अलबत्‍ता लड़के ने कुछ समय पहले भी लड़की का अपहरण करने की कोशिश की थी और मामला पुलिस तक गया था. बाद में लड़के वालों का दबाव कहिये या फिर उनकी ओर से की गई समझौते की पेशकश, कि लड़की के परिवारजनों ने मामला वापस ले लिया. पर लड़के की तरफ से मामला खत्‍म नहीं हुआ और अंतत: लड़की को जान गंवानी पड़ी.

सबसे ताजा मामला इंदौर का है जहां विधानसभा अध्‍यक्ष रह चुके एक राजनेता के परिवार के एक सदस्‍य ने अपनी युवा पत्‍नी को सिर्फ इसलिये मार दिया कि उससे उसके एक पुराने दोस्‍त ने कथित रूप से संपर्क किया था. इस मामले में हैरान कर देने वाली बात यह है कि लड़के ने लड़की को चार माह पहले अपनी कंपनी में नौकरी दी, उसके एक महीने बाद उससे शादी की और शादी के ढाई महीने बाद बर्बर तरीके से उसकी हत्‍या कर दी. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक युवती गर्भवती थी.

 इन घटनाओं को हम किस नजरिये से देखें?अब सवाल ये है कि इन घटनाओं को हम किस नजरिये से देखें. इन्‍हें समाज में पनप रही कौनसी बुराई के साथ जोड़ें और इनसे निपटने का ऐसा कौनसा तरीका खोजें जिससे इन घटनाओं को रोकने की कोई सूरत बन सके. क्‍योंकि लगातार हो रही ये घटनाएं छुटपुट तौर पर होने वाला अपराध नहीं बल्कि समाज में पनप रही एक स्‍थायी प्रवृत्ति की ओर इशारा करती हैं.

सबसे पहली बात तो यह कि ये घटनाएं हो क्‍यों रही हैं. दरअसल समाज में जिस तरह से खुलापन बढ़ रहा है और संचार के संसाधनों ने जिस तरह एक अलग किस्‍म की आजादी दे दी है, उसके चलते परिचय और अपरिचय का भेद मिट गया है. जिसे ‘दोस्‍ती’ नाम दिया जाता है उसमें ‘दोस्‍ती’ को सही अर्थों में समझने और निभाने का भाव कहीं नहीं होता. अकसर यह डिपार्टमेंटल स्‍टोर या किसी मॉल में होने वाली ‘विंडो शॉपिंग’ की तरह होती है, जहां जो सामान पसंद आया उठा लिया... जी हां, अब इस तरह के रिश्‍ते सोशल मीडिया या अपने आसपास की बस्तियों से पसंदीदा सामान उठा लेने की तर्ज पर ही बन रहे हैं.

जब कोई रिश्‍ता बिना किसी भावनात्‍मक लगाव या एक दूसरे को अच्‍छी तरह जाने बूझे बिना आनन फानन में बनता है तो उसके उसी तेजी के साथ कभी भी टूट जाने की आशंका हमेशा बनी रहती है. इस तरह के रिश्‍ते को बहुत आसानी से ‘दोस्‍ती’ या ‘प्रेम’ का नाम दे दिया जाता है, लेकिन दोनों ही पक्षों को इन शब्‍दों की समझ तक नहीं होती, उन्‍हें निभाना तो बहुत दूर की बात है... दोस्‍ती या प्रेम की पहली पायदान ही त्‍याग और निस्‍वार्थ भाव है. आप एक दूसरे के लिए अपने अहं का, अपने स्‍वार्थ का कितना त्‍याग कर सकते हैं, प्रेम की राह पर पहला कदम तभी बढ़ता है.

 रिश्‍ते को छिपाने की जरूरत पड़े उसकी नींव कभी मजबूत नहीं होती
लेकिन जब आप बिना सोचे विचारे, बिना एक दूसरे को अच्‍छी तरह जाने-बूझे, किसी अन्‍यथा ‘आकर्षण’ के चलते कोई कदम उठाते हैं, तो तय मानिये कि आप जोखिम की भट्ठी में उतर रहे हैं. आपके साथ कभी भी कोई भी हादसा हो सकता है. ऐसे समय में जरूरी है कि आप सबसे पहले स्‍वयं के स्‍तर पर ऐसी किसी भी जान पहचान को अच्‍छी तरह परखें और उसके बाद कोशिश करें कि उस बारे में अपने परिवार से, अपने आसपास के हितैषियों से राय लें. याद रखें जिस रिश्‍ते को छिपाने की जरूरत पड़े उसकी नींव कभी मजबूत नहीं होती.

दूसरी बात ऐसी घटनाओं पर होने वाली प्रतिक्रियाओं की है. इन दिनों देखने में आ रहा है कि जब भी ऐसी घटनाएं होती हैं या तो वे मीडिया का शिकार हो जाती हैं या फिर राजनीति का. हाथरस में भी यही हुआ था और बल्‍लभगढ़ में भी यही हो रहा है. समस्‍या के मूल में जाने के बजाय या गंभीरता से ऐसे मसलों का हल खोजने के बजाय, राजनीतिक आरोप प्रत्‍यारोप के घटाटोप में अपराध को दबा दिया जाता है. राजनीति का हो हल्‍ला इतना ज्‍यादा हो जाता है कि मूल घटना और उसका शिकार हुए लोगों पर तो बात ही नहीं हो पाती. परिवार की पीड़ा सड़क पर रखी गई लाश के रूप में नीलाम होती रहती है.

दूसरी बात मीडिया और सोशल मीडिया के रोल की है. इन दिनों मीडिया जल्‍दी में है और सोशल मीडिया उससे भी ज्‍यादा जल्‍दी में. जब भी कोई घटना होती है उसमें जातिवादी, सांप्रदायिक, धार्मिक या राजनीतिक एंगल फिट करके खबर को सनसनी या चटखारा बनाने का उपक्रम शुरू हो जाता है. ऐसे कई गिरोह समाज में इसी काम के लिए तैयार बैठे रहते हैं कि कब कोई घटना हाथ लगे और उसे अपने हिसाब से इस्‍तेमाल करने का अवसर मिले.

सार्थक पहल करने की राह में कांटे बिछा दिए गए?
राजनीति और मीडिया की इस ‘आपराधिक’ प्रवृत्ति ने ऐसी घटनाओं पर गंभीर सामाजिक बहस होने और उसके हल की दिशा में सार्थक पहल करने की राह में कांटे बिछा दिए हैं. निश्चित रूप से समाज का ढांचा बदल रहा है. इस बदलाव ने व्‍यक्तिगत और सामूहिक दोनों तरह के संबंधों पर असर डाला है. परिवार नाम की इकाई इससे सबसे ज्‍यादा प्रभावित हुई है. लड़के और लड़की में संबंध का कारण कोई भी हो, लेकिन उनका एक दूसरे से ‘जीवनसाथी’ के रूप में जुड़ना अंतत: परिवार नाम की इकाई का गठन करना ही है. लेकिन इस जुड़ाव से पहले और जुड़ाव के बाद होने वाली घटनाएं बता रही हैं कि परिवार नाम की संस्‍था ही खतरे में है.

चिंता की बात यह है कि ऐसी घटनाओं में शिकार लड़कियां ही हो रही हैं फिर चाहे शादी के पहले हो या फिर शादी के बाद. उनका किसी से परिचय हो या फिर ‘एकतरफा’ मामला. ‘दोस्‍ती’ और ‘प्रेम’ जैसे शब्‍द ही जब अविश्‍वास के घेरे में आ गए हों तो समाज में हम सद्भाव और सौहार्द की बात सोच भी कैसे सकते हैं?

(डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.) 
ब्लॉगर के बारे में
गिरीश उपाध्याय

गिरीश उपाध्यायपत्रकार, लेखक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. नई दुनिया के संपादक रह चुके हैं.

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First published: October 29, 2020, 2:19 PM IST
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