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पतंगबाजी में छिपे हैं बेहतर जीवन प्रबंधन के गुण

पतंग इंसान के हौसले की उड़ान का ही एक नमूना है. पतंग को आसमान से छुआकर इंसान यह तसल्‍ली कर सकता है कि उसके हाथ में भी आसमान को छू सकने की ताकत है. मकर संक्रांति सूर्य का उत्‍सव है और सूर्य अपने प्रकाश से पृथ्‍वी का जीवनदाता है.

Source: News18Hindi Last updated on: January 14, 2021, 2:14 PM IST
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पतंगबाजी में छिपे हैं बेहतर जीवन प्रबंधन के गुण
पतंग
नई दिल्ली. मकर संक्रांति (Makar Sankranti) का पर्व सूर्य के दक्षिणायन से उत्‍तरायण होने के पर्व के साथ ही भारत के कई राज्‍यों में पंतगबाजी उत्‍सव के रूप में भी मनाया जाता है. गुजरात, राजस्‍थान और मध्‍यप्रदेश जैसे राज्‍यों में तो मकर संक्रांति के दिन पतंगबाजी की धूम अलग ही दिखाई देती है. वैसे तो पतंग को एक खेल या शौक के रूप में ही लिया जाता है, लेकिन गहराई से देखें तो पतंग (Kites) के साथ जीवन का बहुत बड़ा दर्शन और जिंदगी के बहुत सारे सबक भी जुड़े हैं. आधुनिक परिभाषा में कहें तो पतंग हमें बेहतर जीवन प्रबंधन के कई गुर सिखाती है.

पंतग दरअसल मनुष्‍य के आसमान को छू लेने की कोशिश का ही प्रतीक है. जमीन पर रहकर आकाश को छू लेने की हसरत मनुष्‍य में सदियों से रही है. लेकिन उसका कद इतना छोटा है कि वह कभी भी इस हसरत को भौतिक रूप से पूरा नहीं कर सकता. यानी अपने हाथों से आसमान नहीं छू सकता. अलबत्‍ता वह अपने हौसलों और कोशिशों से न जाने कितने नए आसमान छू सकता है. आसमान को छूने की यह हसरत, यह हौसला और यह कोशिश ही इंसान को इंसान बनाती है. और पतंग उसकी इस कोशिश और कोशिश में सफलता का प्रतीक है.

पतंग इंसान के हौसले की उड़ान का ही एक नमूना है. पतंग को आसमान से छुआकर इंसान यह तसल्‍ली कर सकता है कि उसके हाथ में भी आसमान को छू सकने की ताकत है. मकर संक्रांति सूर्य का उत्‍सव है और सूर्य अपने प्रकाश से पृथ्‍वी का जीवनदाता है. तो एक मायने में पतंग भी जीवन के स्रोत और प्रकाश तक पहुंचने का प्रयास है.

सूर्य ऊष्‍मा का प्रतीक है, जीवन में यदि ऊष्‍मा या ऊर्जा न हो तो मनुष्‍यता ही नष्‍ट हो जाएगी. और सिर्फ मनुष्‍यता ही क्‍यों, ऊष्‍मा और ऊर्जा के बिना तो पूरी प्रकृति का ही अस्तित्‍व नहीं रहेगा. पतंग जीवन की ऊष्‍मा और ऊर्जा को बनाए रखने या उससे जुड़े रहने की प्रेरणा देती है.
जिन लोगों ने पतंग उड़ाई है या जो लोग पतंगबाजी करते रहे हैं वे अच्‍छे से जानते हैं कि आसमान में अधिक ऊंचाई तक उड़ने और वहां शान से टिके रहने लायक पतंग का चुनाव कितना मुश्किल होता है. यही हाल इंसान की इच्‍छाओं, कोशिशों और उपलब्धियों का भी है. जीवन में भी हम कितना ही ऊंचा उठने का सपना देखें लेकिन उस सपने को साकार करने वाले माध्‍यम का चयन बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए. ऐसा माध्‍यम जो हमें ऊपर उठाने के बाद भी विपरीत या तेज हवाओं के बहाव में टिकाए रख रख सके.

पतंग का चयन करते समय उसके कागज या ताव से लेकर बांस की खपच्चियों से बने उसके ढांचे और आकार तक का बहुत महत्‍व है. पतंग का ढांचा बांस की दो खपच्चियों का बना होता है. पतंग के बीचों बीच थोड़ी अधिक मोटाई वाली सीधी खपच्‍ची और उसी पर टिकी थोड़ी कम मोटाई की एक धनुषाकार खपच्‍ची.

मनुष्‍य को सीधा खड़ा रहने, चलने या ऊंचाई तक पहुंचने में सबसे ज्‍यादा जरूरत मजबूत रीढ़ की होती है. पंतग में भी उसके आधार को संभाले रखने वाली बांस की खपच्‍ची रीढ़ का ही काम करती है. यह खपच्‍ची मजबूत न हो तो पतंग या तो ठीक से उड़ नहीं पाएगी या फिर जैसे तैसे उड़ भी गई तो तेज हवा के झोके सहन न कर पाने के कारण टूटकर नीचे आ गिरेगी. जीवन में भी यही होता है. आगे बढ़ने के लिए मजबूत रीढ़ की जरूरत होती है. सिर्फ इरादों के रूप में ही नहीं आचरण और नैतिकता के लिहाज से भी मजबूत रीढ़.लेकिन पतंगबाज पतंग के इस ढांचे को सिर्फ उसकी मजबूती से ही नहीं जांचता. वह उसके लचीलेपन को भी जांचता है. पतंग की क्‍वालिटी परखते समय वह बीच वाली खपच्‍ची और धनुषाकार खपच्‍ची दोनों को थोड़ा थोड़ा मोड़कर देखता है कि उनमें पर्याप्‍त लचीलापन है कि नहीं. मोड़कर देखने के दो फायदे होते हैं. एक तो यह पता लग जाता है कि खपच्‍ची में कहीं कोई ऐसी कमजोर गांठ तो नहीं है जो जरा सा दबाव पड़ने पर टूट जाएगी, दूसरे यह कि उसमें हवा के रुख का सामना करते हुए दिशा बदल सकने लायक लचीलापन है कि नहीं.

यदि लचीलापन नहीं हुआ तो पतंग का उड़ना ही मुश्किल हो जाता है. यही बातें हमारे जीवन और आगे बढ़ने की कोशिशों पर भी लागू होती हैं. इरादों की मजबूत रीढ़ के साथ ही उनमें लचीलापन भी होना जरूरी है ताकि आवश्‍यकतानुसार हम अपनी दिशा को मोड़ सकें.

पतंग को उड़ाने के लिए तैयार करते समय हवा में उसका संतुलन साधने, उसे इच्छित दिशाओं में मोड़ सकने और डोर से उसका रिश्‍ता बनाए रखने के लिए कन्‍ने बांधे जाते हैं. पतंगबाजी करने वाले जानते हैं कि पतंग को ठीक से उड़ा सकने लायक बनाने में कन्‍नों का कितना महत्‍व है. यदि कन्‍नों का संतुलन बिगड़ा तो हो सकता है पतंग उड़ ही नहीं पाए. जीवन में अरमानों की उड़ान को पूरा करने के लिए भी ऐसा ही संतुलन जरूरी है. वह संतुलन जो हमारे हौसलों की उड़ान के साथ ही हमारे जीवन को भी बचाए रखे. ऐसा न हो कि हम ऊपर तो उठ जाएं लेकिन संतुलन बना न रहने के कारण लड़खड़ाकर नीचे आ गिरें.

अच्‍छा पतंगबाज यह भी बारीकी से देखता है कि पतंग के कागज में कही कोई छेद तो नहीं है. यदि ऐसा हुआ तो उड़ने के बाद वह छेद हवा के दबाव के कारण पतंग के फट जाने का कारण भी बन सकता है. जीवन में भी आपके इरादों में गलत उद्देश्‍यों का कोई छेद नहीं होना चाहिए, वरना आपके सारी उम्‍मीदें, सारे सपने तार-तार हो जाएंगे.

पतंगबाजी में यूं तो सारा महत्‍व या श्रेय पतंग को ही दे दिया जाता है, लेकिन दरअसल पतंग को पतंग बनाने या उसे आसमान तक ऊंचा उठाने वाली तो डोर ही होती है. एक लिहाज से यह डोर ही है जो पतंग को साधे भी रखती है और उसे इच्छित दिशाओं में लहराने की ताकत भी देती है. पतंग और डोर का यह रिश्‍ता इंसान की जिंदगी का बहुत बड़ा दर्शन है.

आपके सपने कितने ही बड़े और ऊंचे हों उन्‍हें सफल तो कोशिश की डोर ही बनाती है. इसी तरह जीवन में भी आप स्‍वयं सबकुछ नहीं होते. आपके साथ के, आपके आसपास के लोग आपका संबल बनकर आपको ऊंचा उठने में मदद करते हैं. समन्‍वय की यह डोर न हो तो जीवन की पतंग भी कभी आसमान को नहीं छू सकती.

एक बात और... आमतौर पर पतंगबाजी में जब पेंच लड़ाए जाते हैं तो उसके नतीजे में कहा जाता है कि पतंग कट गई. लेकिन किसी भी पेंचबाजी में पतंग नहीं कटती. कटती तो डोर ही है. इसलिए डोर का यानी आपकी कोशिशों का मजबूत होना बहुत जरूरी है. साथ ही आपके आसपास के लोगों का, सहयोगियों का मजबूत होना भी आवश्‍यक है.

सामूहिक कोशिशों से ही कोई समाज उम्‍मीदों का आसमान छू सकता है. इसके साथ ही आप इच्‍छा भले ही आसमान को छू लेने या पा लेने की करें, लेकिन आपका जमीन से जुड़ा रहना बहुत जरूरी है. डोर, इसी बात को रेखांकित करती है. पतंग भले ही आसमान में उड़ रही होती है लेकिन तभी तक जब तक उसका रिश्‍ता जमीन यानी डोर से जुड़ा हो. जिस क्षण यह डोर कटी, उस क्षण पता नहीं हवा पतंग को कहां ले जाकर पटके कोई नहीं कह सकता.

बचपन में पतंग उड़ाना सीखते समय पुराने पतंगबाज कई तरह के गुर सिखाया करते थे. मुझे याद है ऐसा ही एक गुर था कि पतंग यदि आसमान में उड़ने के बाद किसी एक दिशा में ज्‍यादा झुकने लगे तो क्‍या करना चाहिए. ऐसे समय में पतंग को नीचे उतारकर वजन का संतुलन परखा जाता था. और इसे साधने के लिए विपरीत दिशा में धागे का वजन (मध्‍यप्रदेश के मालवा क्षेत्र की पतंगबाजी की शब्‍दावली में इसे खिरनी बांधना कहते हैं) बांधा जाता था. यानी हवा में पतंग यदि दायीं ओर झुक रही है तो खिरनी बायीं ओर बांधी जाती थी और बायीं ओर झुक रही है तो दायीं ओर. जीवन प्रबंधन में भी बिगड़ी हुई दिशा को साधने के लिए इस तरह के संतुलन जरूरी होते हैं.

कुल मिलाकर पतंग या पतंगबाजी सिर्फ खेल या शौक भर नहीं, बहुत बड़ा जीवन दर्शन भी है. यदि हम इसके प्रतीकों को समझें तो उससे बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं. हो सकता है हमारे जीवन की दिशा भी तब दक्षिणायन से उत्‍तरायण होने लगे.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
गिरीश उपाध्याय

गिरीश उपाध्यायपत्रकार, लेखक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. नई दुनिया के संपादक रह चुके हैं.

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First published: January 14, 2021, 2:14 PM IST
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