Corona: अब डॉक्टरी पेशे के लिए खतरनाक हो रहे हैं हालात

जैसे-जैसे कोरोना महामारी (Covid19 Pandemic) का संक्रमण बढ़ रहा है, जैसे-जैसे इससे होने वाली मौतों का आंकड़ा ऊपर उठता जा रहा है, मेडिकल प्रोफशन से जुड़े लोगों के प्रति वह सम्‍मान, आदर का भाव खत्‍म होता जा रहा है. उनकी सेवा को अब दूसरी ही नजर से देखा जाने लगा है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 29, 2020, 11:18 AM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
Corona: अब डॉक्टरी पेशे के लिए खतरनाक हो रहे हैं हालात
भारत में कोरोना वायरस 96 हजार से ज्यादा लोगों की जान ले चुका है.
कोरोना काल जब शुरू हुआ था उसके बाद एक समय ऐसा भी आया था जब पूरे देश ने चिकित्‍सा जगत से जुड़े लोगों को भगवान मानते हुए उनके प्रति कृतज्ञता जताई थी. देश में डॉक्‍टरों को कोरोना वॉरियर्स ही नहीं, बल्कि भगवान की संज्ञा दी जाने लगी थी. डॉक्‍टरों, पैरा मेडिकल स्‍टाफ और चिकित्‍सा एवं स्‍वास्‍थ्‍य सेवा से जुड़े लोगों की चारों तरफ सराहना हो रही थी.

उसी दौरान देश ने वह समय भी देखा जब लोगों ने कोरोना की जांच और इलाज करने गए डॉक्‍टरों, नर्सों और पैरा मेडिकल स्‍टाफ की टीमों पर हमला किया, उनके साथ बहुत बुरा बर्ताव किया गया. उन घटनाओं का भारी विरोध हुआ और समाज डॉक्‍टरों के पक्ष में खड़ा नजर आया. सरकारों ने भी कोरोना इलाज में लगे, डॉक्‍टरी पेशे से जुड़े लोगों की सुरक्षा के लिए कानून में संशोधन किए. ऐसे पेशेवरों से मकान खाली करवाने या उन्‍हें मकान में न घुसने देने जैसे कदम उठाने वालों को खुद समाज ने सबक सिखाया.

ऐसा लगता है कि जैसे-जैसे कोरोना महामारी का संक्रमण बढ़ रहा है, जैसे-जैसे इससे होने वाली मौतों का आंकड़ा ऊपर उठता जा रहा है, मेडिकल प्रोफशन से जुड़े लोगों के प्रति वह सम्‍मान, आदर का भाव खत्‍म होता जा रहा है. उनकी सेवा को अब दूसरी ही नजर से देखा जाने लगा है. एक समय ऐसी खबरों की भरमार हुआ करती थी जिनमें डॉक्‍टरों और मेडिकल स्‍टाफ द्वारा कोरोना मरीजों का इलाज करने और अपनी जान पर खेलकर उनकी जान बचाने के किस्‍से होते थे. लेकिन अब ऐसे किस्‍सों और खबरों की भरमार है जिनमें इस नोबल प्रोफेशन पर उंगलियां उठ रही हैं.

जैसे-जैसे कोरोना काल लंबा खिंच रहा है, देश में मेडिकल प्रोफेशन की छवि के लिए खतरा बढ़ता जा रहा है. यदि यह सिलसिला जारी रहा तो कोरोना न सिर्फ देश के स्‍वास्‍थ्‍य को गहरा घाव देकर जाएगा, बल्कि वह मेडिकल प्रोफेशन पर भी ऐसा आघात लगाएगा जिससे उबरने में इस पेशे से जुड़े लोगों को कई साल लग सकते हैं. फिर भी इस बात की गारंटी नहीं होगी कि अब जो दाग धब्‍बे इस प्रोफशन पर लग रहे हैं वे पूरी तरह धुल पाएं.
दरअसल मरीजों की बढ़ती संख्‍या और कोरोना से होने वाली मौतों के दबाव ने देश में चिकित्‍सा और स्‍वास्‍थ्‍य के ढांचे को ध्‍वस्‍त कर दिया है. सरकारों के दावे अपनी जगह हैं लेकिन सचाई यह है कि अब हमारा स्‍वास्‍थ्‍य और चिकित्‍सा का ढांचा कोरोना मरीजों की देखभाल और उनके इलाज में लाचार साबित हो रहा है.

एक तरफ मरीज बढ़ते जा रहे हैं और दूसरी तरफ जांच और इलाज की व्‍यवस्‍थाएं लगातार कम होती जा रही हैं. और न सिर्फ कम, बल्कि कई जगह तो वे बची ही नहीं हैं. मरीजों के बोझ के चलते चिकित्‍सा की वर्तमान व्‍यवस्‍था और स्‍वास्‍थ्‍य ढांचे ने मानो दम तोड़ दिया है.


हालात ये हैं कि बीमारों को इलाज के लिए अस्‍पतालों में भरती करने की जगह नहीं बची है. मरीजों को इलाज के लिए अस्‍पताल में भरती करवाने में राजनेताओं, अफसरों और यहां तक कि मंत्रियों और मुख्‍यमंत्रियों तक की सिफारिश लगवानी पड़ रही है. जो लोग अस्‍पतालों में भरती हैं उन्‍हें देखने के लिए पर्याप्‍त डॉक्‍टर नहीं हैं, उन्‍हें जरूरी सेवा मुहैया कराने वाला पैरा मेडिकल स्‍टाफ नहीं है. वेंटिलेटर की तो बात छोडि़ये, कई राज्‍यों में गंभीर मरीजों को ऑक्‍सीजन तक मुहैया नहीं हो पा रही है. ऑक्‍सीजन सप्‍लाय करने वाले प्रदेश, पहले अपने राज्‍य के लोगों के लिए सुविधा मुहैया कराने के नाम पर ऑक्‍सीजन की सप्‍लाय रोक रहे हैं.एक तरफ मरीजों का यह हाल है और दूसरी तरफ खबरें आ रही हैं कि सरकारी अस्‍पतालों में जहां जगह नहीं बची है वहीं निजी अस्‍पतालों में इलाज के नाम पर लूट मची हुई है. सोशल मीडिया पर रोज ऐसे सैकड़ों वीडियो अपलोड हो रहे हैं जहां या तो मरीज खुद या फिर उनके नाते रिश्‍तेदार अपनी पीड़ा को उजागर कर रहे हैं. इलाज के नाम पर मनमानी राशि वसूले जाने, अस्‍पतालों की नारकीय पीड़ा और लापरवाही से डरे हुए लोग अब अस्‍पताल जाने के नाम से ही घबराने लगे हैं, और ऐसा करके एक तरह से वे अपनी मौत का ही इंतजार करने को मजबूर हो रहे हैं.

इन स्थितियों ने देश के पूरे मेडिकल प्रोफेशन के प्रति गुस्‍से और नफरत का वातावरण बनाना शुरू कर दिया है, जो भविष्‍य में मेडिकल प्रोफेशन के लिए खतरे का संकते है. डॉक्‍टरों और पैरा मेडिकल स्‍टाफ पर हमले कोरोना के शुरुआती समय में भी हुए थे, लेकिन तब कारण दूसरा था और अब कारण दूसरे हैं. ऐसी बात नहीं है कि डॉक्‍टर इलाज नहीं कर रहे. लेकिन दो तरह की परिस्थितियां पूरे स्‍वास्‍थ्‍य तंत्र के प्रति लोगों के मन में गुस्‍सा पैदा कर रही हैं. इनमें पहली है मरीजों की तुलना में स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाओं का कम पड़ जाना या ढह जाना और दूसरी है इलाज के नाम पर (खासतौर से निजी अस्‍पतालों में) होने वाली कथित मनमानी या लूट.

मरीजों का बढ़ता दबाव कहें या लापरवाही पर पिछले दिनों कुछ ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जो स्‍वास्‍थ्‍य ढांचे के वर्तमान हालात को रोंगटे खड़े कर देने वाले अंदाज में उजागर करती हैं. इंदौर के सबसे बड़े सरकारी अस्‍पताल में एक मृतक की बॉडी स्‍ट्रेचर पर ही पड़े पड़े सड़ गई. वहीं एक बच्‍चे की लाश कई दिनों तक मुर्दाघर के फ्रीजर में पड़ी रही. इंदौर के ही एक निजी अस्‍पताल में कोरोना से मृत एक बजुर्ग मरीज के पार्थिव शरीर को चूहों द्वारा कुतर लिए जाने जैसी घटना सामने आई.


इन घटनाओं ने लोगों को न सिर्फ आहत किया है बल्कि व्‍यवस्‍था के प्रति उनके मन में भारी नाराजगी और गुस्‍सा पैदा किया है. यदि यही हालात जारी रहे तो हो सकता है इनसे पैदा होने वाले असंतोष के चलते सरकारों और प्रशासन के लिए कानून व्‍यवस्‍था की स्थिति संभालनी मुश्किल हो जाए. व्‍यवस्‍था के प्रति पनप रहा लोगों का यह गुस्‍सा कब, कहां और किस रूप में फूटेगा, कहा नहीं जा सकता, लेकिन इतना तय है कि इसका पहला शिकार या निशाना अस्‍पताल और मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े लोग ही होंगे.

यदि ऐसा होता है तो देश की स्‍वास्‍थ्‍य और चिकित्‍सा व्‍यवस्‍था को बहुत गंभीर क्षति पहुंच सकती है. हमारे यहां स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाओं की स्थिति पहले ही ठीक नहीं है. ऐसे में यदि अस्‍पताल और डॉक्‍टर किसी भी कारणवश लोगों के गुस्‍से का शिकार बनते हैं तो इससे हालात और बदतर ही होंगे. ऐसा नहीं है कि सभी जगह, सारे डॉक्‍टर ऐसी लापरवाही या मरीजों के प्रति उपेक्षा बरत रहे हों. यह भी नहीं है कि सभी अस्‍पताल लोगों से इलाज के नाम पर लूट मचाए हुए हों, लेकिन इतना जरूर है कि अस्‍पतालों और वहां के हालात के प्रति लोगों की शिकायतों का दायरा फैलता जा रहा है.

उधर, सरकारों पर भी इलाज के खर्चे का बढ़ता बोझ आर्थिक दबाव को लगातार बढ़ा रहा है. कई सरकारों ने अब मरीजों को या तो घर पर ही रहने या फिर निजी अस्‍पतालों में इलाज करवाने की सलाह देनी शुरू कर दी है. पिछले दिनों मध्‍यप्रदेश में कोरोना मरीजों को दी गई यह सलाह मायने रखती है कि जो लोग इलाज का खर्च उठा सकते हैं वे मुफ्त में इलाज कराने के बजाय इलाज के एवज में कुछ न कुछ राशि का भुगतान जरूर करें.

इसी बीच एक और खबर ने चिंता बढ़ाई है. यह खबर कोरोना के संक्रमण के कारण होने वाली डॉक्‍टरों और पैरा मेडिकल स्‍टाफ के लोगों की बढ़ती मौतों के बारे में है. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने 17 सितंबर को बयान जारी कर बताया है कि कोरोना संक्रमण से अब तक 382 डॉक्‍टरों की मौत हुई है और 2238 डॉक्‍टर संक्रमित हुए हैं. इतनी बड़ी संख्‍या में डॉक्‍टरों की मौत होना पूरे देश के लिए चिंता का विषय है. एक तरफ भारत में वैसे ही आबादी के अनुपात में डॉक्‍टरों की भारी कमी है. विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के मापदंडों के अनुसार प्रति एक हजार की आबादी पर एक डॉक्‍टर होना चाहिए लेकिन हमारे यहां यह अनुपात डेढ़ हजार पर एक डॉक्‍टर का है.

भारत में दवाओं, खासतौर से एंटीबॉयोटिक के उपयोग को लेकर अमेरिकी संस्‍था ‘सेंटर फार डिसीज डायनॉमिक्‍स, इकानॉमिक्‍स एंड पॉलिसी’ की पिछले साल आई रिपोर्ट के अनुसार भारत में 6 लाख डॉक्‍टरों और 20 लाख नर्सों की कमी बताई गई थी. उस लिहाज से देखें तो भारत में कोरोना काल के दौरान 382 डॉक्‍टरों की मौत हमारे लिए बहुत बड़ा झटका है. मरीजों के साथ साथ हमें डॉक्‍टरों और पैरा मेडिकल स्‍टाफ को बचाने पर भी ध्‍यान देना होगा.


कुल मिलाकर कोरोना काल न सिर्फ मरीजों के लिहाज से बल्कि हमारी चिकित्‍सा और स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के साथ साथ डॉक्‍टरों व पैरा मेडिकल स्‍टाफ के लिहाज से भी बहुत भारी पड़ रहा है. एक तरफ डॉक्‍टरों की मौत और उनमें फैल रहा संक्रमण और दूसरी तरफ प्रोफशन में दिख रही लापरवाही और लूट की प्रवृत्ति ने हालात और गंभीर बना दिये हैं. इसका हल सरकारों और मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े लोगों को मिलकर ही करना होगा. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
गिरीश उपाध्याय

गिरीश उपाध्यायपत्रकार, लेखक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. नई दुनिया के संपादक रह चुके हैं.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: September 29, 2020, 11:18 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर