देश के दूसरे शहर इंदौर से क्‍या सीखें

इंदौर वैसे तो मध्‍यप्रदेश का सबसे बड़ा और सबसे प्रमुख वाणिज्यिक शहर है लेकिन इसकी पहचान अपनी एक खास तासीर की वजह से भी है जिसे ‘इंदौरियत’ कहा जाता है. मेरा गृहनगर होने के कारण मैं इस शहर की कई ऐसी रवायतों से वाकिफ हूं जो सिर्फ यहीं देखने को मिल सकती हैं. एक समय इंदौर देश के सबसे हरे भरे शहरों में शुमार होता था. बचपन में हमने यहां की सड़कों व नालियों की झाड़ बुहार के बाद उन्‍हें पानी से धुलते भी देखा है. नगर निगम में भिश्‍ती का काम करने वाले कामगार पीठ पर चमड़े की मशक लादे सड़कों को धोते चलते थे.

Source: News18Hindi Last updated on: November 25, 2021, 11:25 AM IST
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देश के दूसरे शहर इंदौर से क्‍या सीखें



देश भर में स्‍वच्‍छता की मिसाल बन चुके इंदौर ने लगातार पांचवीं बार सबसे स्‍वच्‍छ शहर का तमगा हासिल कर सफाई का शानदार पंच लगाया है. यह न सिर्फ इंदौर के लिए बल्कि पूरे मध्‍यप्रदेश के लिए गर्व का विषय है. देश में स्‍वच्‍छता अभियान शुरू होने के बाद से ही साफ सफाई के प्रति लोगों में जागरूकता भी आई है और उनका मानस भी बदला है. ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर इंदौर में ऐसी क्‍या बात है या कि इंदौर ने ऐसा क्‍या किया जो लगातार पांच बार देश में स्‍वच्‍छता में अव्‍वल आने का सम्‍मान अपनी झोली में डाला. इंदौर की सफलता के सूत्रों को पकड़ना इसलिए भी जरूरी है ताकि देश के बाकी शहर भी उनसे प्रेरणा लेकर अपने यहां स्‍वच्‍छता अभियान के नए प्रतिमान गढ़ सकें.


इंदौर वैसे तो मध्‍यप्रदेश का सबसे बड़ा और सबसे प्रमुख वाणिज्यिक शहर है लेकिन इसकी पहचान अपनी एक खास तासीर की वजह से भी है जिसे ‘इंदौरियत’ कहा जाता है. मेरा गृहनगर होने के कारण मैं इस शहर की कई ऐसी रवायतों से वाकिफ हूं जो सिर्फ यहीं देखने को मिल सकती हैं. एक समय इंदौर देश के सबसे हरे भरे शहरों में शुमार होता था. बचपन में हमने यहां की सड़कों व नालियों की झाड़ बुहार के बाद उन्‍हें पानी से धुलते भी देखा है. नगर निगम में भिश्‍ती का काम करने वाले कामगार पीठ पर चमड़े की मशक लादे सड़कों को धोते चलते थे.


लेकिन धीरे धीरे समय के साथ शहर का मिजाज बदलता गया. आबादी के दबाव और चौतरफा बेतरतीब विस्‍तार के चलते नगरीय व्‍यवस्‍थाएं और सुविधाएं भी चरमराती गईं. ज्‍यादा पुरानी बात नहीं है जब इंदौर के गली मोहल्‍लों में कचरे के ढेर और सड़कों पर कूडा दिखना आम बात थी. लेकिन आज वही शहर देश के सबसे चकाचक शहर के रूप में अपनी पहचान बना चुका है. और यहीं से मन में सवाल उठता है कि आखिर ऐसा हुआ कैसे?


यह एक शहर के लोगों की किसी अभियान में सक्रिय भागीदारी का नायाब उदाहरण है. और यह भागीदारी पूरे संकल्‍प के साथ सभी ने साथ मिलकर निभाई फिर चाहे वे राजनेता हों, अफसर हों या फिर शहर की जनता. और उसी का नतीजा है कि आज इंदौर सफाई का सिरमौर बना हुआ है. स्‍वच्‍छता पुरस्‍कारों का सिलसिला जब वर्ष 2016 में शुरू हुआ तो उस समय मनीष सिंह इंदौर नगर निगम के आयुक्‍त थे. वे इस समय इंदौर के कलेक्‍टर हैं. मनीष सिंह को प्रदेश की नौकरशाही में तेजतर्रार और सख्‍त प्रशासक माना जाता है.

स्‍वच्‍छता पुरस्‍कार शुरू होने के बाद से ही इंदौर नगर निगम ने इस संकल्‍प के साथ काम शुरू किया कि उसे किसी भी हालत में यह पुरस्‍कार हासिल करना ही है. इस काम में सबसे बड़ी बाधा खुद नगर निगम के सफाई कर्मचारी ही थे. देश की करीब करीब सभी नगरीय संस्‍थाओं में सफाई कर्मचारियों के बारे में यह बात आम है कि वे या तो काम पर आते नहीं और आते भी हैं तो काम को ठीक से अंजाम नहीं देते. सफाईकर्मियों की भरती में होने वाली राजनीति और बाद में सफाईकर्मियों की खुद की राजनीति इसका बहुत बड़ा कारण है.


इंदौर नगर निगम के ही लोग बताते हैं कि पहला पुरस्‍कार पाने का संकल्‍प लेकर चलने वाले आयुक्‍त मनीष सिंह ने इस मामले में महापौर मालिनी गौड़ से सीधी बात की और उनसे अनुरोध किया कि वे सफाई के मामले में किसी भी राजनीति को आड़े न आने दें. महापौर ने भी शहर की बेहतरी के इस काम में पूरी तरह साथ देने का वायदा किया. महापौर एवं आयुक्‍त की लाजवाब ट्यूनिंग ने शहर में सफाई को एक अभियान का रूप देने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई.


तत्‍कालीन आयुक्‍त ने दोनों तरह की रणनीति पर काम किया. एक तरफ जहां सफाई कामगारों को सख्‍ती से काम पर लगाया गया वहीं उनके नेताओं से भी बात करके उन्‍हें भी अलग अलग जिम्‍मेदारी सौंपी गई. इससे अभियान में आड़े आ सकने वाली नेतागिरी पर लगाम लग सकी. शहर में कचरे के प्रबंधन की रणनीति तय हुई और चीजें धीरे धीरे आकार लेने लगीं और सड़कें, गली मोहल्‍ले साफ होते चले गए.


2017 में पहली बार इंदौर को जब स्‍वच्‍छता में अव्वल आने का पुरस्‍कार मिला तो शहरवासियों में खुशी का भाव तो था लेकिन कई लोग इसे तुक्‍का मानकर भी चल रहे थे. ऐसा इसलिए था क्‍योंकि इंदौरियों का मिजाज बदलना इतना आसान नहीं होता. धारणा यह थी कि एक बार पुरस्‍कार मिल गया बस, अब चीजें और लोगों का रवैया धीरे धीरे उसी पुराने ढर्रे पर आ जाएगा. इस बीच अभियान को एक और झटका ये लगा कि मनीषसिंह का आयुक्‍त पद से तबादला हो गया और 2018 में आशीष सिंह नए आयुक्‍त बनकर आए.

आमतौर पर नौकरशाही में यह बात देखी गई है कि कोई भी अफसर किसी दूसरे अफसर की, खासतौर से अपने पूर्ववर्ती अफसर की लाइन को आगे बढ़ाने में बहुत ज्‍यादा भरोसा नहीं रखता. वह अपनी अलग लाइन खींचकर उसके जरिये अपनी पहचान बनाने की कोशिश करता है. लेकिन यह इंदौर की खुशकिस्‍मती थी कि आशीष सिंह ने मनीष सिंह के काम को न सिर्फ जारी रखा बल्कि उसकी सफलता में पूरी ताकत झोंक दी. इसके पीछे एक बात शायद यह भी काम कर रही थी कि कहीं इंदौर के लोग ये न कहें कि नए आयुक्‍त ने पुराने आयुक्‍त द्वारा दिलाया गया तमगा शहर से छिनवा दिया.


मनीष सिंह ने इंदौर में स्‍वच्‍छता के जिस काम को शुरू किया था आशीष सिंह ने उसे लोगों की आदत बनाने का काम किया. यही कारण रहा कि उनके दो साल के कार्यकाल में भी इंदौर ने स्‍वच्‍छता के मामले में अव्‍वल आने का सिलसिला जारी रखा. इसे किसी अभियान की सफलता का असर और चस्‍का कह सकते हैं कि सफाई के प्रति आशीष सिंह के मन में जो आग्रह पनपा था वह उनके इंदौर से तबादला होकर कलेक्‍टर के रूप में उज्‍जैन जाने पर भी वैसा ही बना रहा और उन्‍होंने उज्‍जैन को भी स्‍वच्‍छ शहरों की सूची में बहुत आगे ला दिया.


आशीष सिंह के जाने के बाद 2020 में इंदौर को प्रतिभा पाल के रूप में अपने इतिहास की पहली महिला आयुक्‍त मिलीं और उन्‍होंने भी इस मसले की गंभीरता और इस उपलब्धि के महत्‍व को समझते हुए कोई कोताही नहीं बरती. जिस भाव और समर्पण से उनके पूर्ववर्ती अधिकारियों ने इस काम को शुरू किया था उन्‍होंने उसी भाव को आगे बढ़ाया और इसका नतीजा यह रहा कि प्रतिभा पाल के कार्यकाल में भी लगातार दो बार इंदौर ने सबसे स्‍वच्‍छ शहर का सम्‍मान हासिल करते हुए स्‍वच्‍छता का पंच लगा दिया.


इस शानदार उपलब्धि के पीछे के कारणों को गिनाते हुए प्रतिभा पाल ने कहा कि इसका सबसे बड़ा श्रेय इंदौर की जनता को है जिसने स्‍वच्‍छता को अपनी आदत बना लिया. यह पूछे जाने पर कि आपने ये किया कैसे? प्रतिभा पाल कहती हैं- ‘’हमने सबसे पहले लोगों को जरूरी सुविधाएं मुहैया कराईं. हमारा मानना है कि जब आप कचरे के निष्‍पादन की या लोगों को टॉयलेट आदि की सुविधाएं तक नहीं देंगे तो कचरा सड़कों पर दिखेगा ही.

उसके अलावा निगम ने सफाई से संबंधित वाहनों, उपकरणों आदि की खरीद को सर्वोच्‍च प्राथमिकता दी. इससे हमारे काम में गति भी आई और परिणाम भी अच्‍छे मिले. जागरूकता का काम निरंतर चलता रहा, इसका नतीजा है कि अब गीले सूखे कचरे को अलग करने के लिए लोगों से कहना नहीं पड़ता, वे यह काम अपने स्‍तर पर ही कर रहे हैं. इससे कचरे के निष्‍पादन में आसानी हुई और हम अब उस कचरे से खाद आदि बनाने के मामले से आगे बढ़कर बिजली व गैस उत्‍पादन की भी रणनीति बना रहे हैं.


ऐसे अभियानों में मीडिया की भूमिका भी बहुत महत्‍वपूर्ण होती है. इंदौर के मीडिया ने भी इस अभियान को दिल खोलकर सहयोग और समर्थन दिया. इंदौर प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष अरविंद तिवारी बताते हैं कि अभियान में जब कभी कोई कमी दिखाई भी दी या कुछ गड़बड़ी भी हुई तो मीडिया ने उसे नकारात्‍मकता के साथ पेश करने या अभियान को चोट पहुंचाने के बजाय सकारात्‍मक तरीके से प्रस्‍तुत कर सफाई अमले का हौसला नहीं टूटने दिया. बाद में तो यह पूरे शहर का अभियान बन गया. अब तो हालत ये है कि लोग इधर उधर कचरा फेंकने वालों को अपने स्‍तर पर ही रोक टोक देते हैं.


अरविंद तिवारी कहते हैं कि इस काम में शहर के एनजीओ ने भी महत्‍वपूर्ण रोल अदा किया. एक तरह से उन्‍होंने पूरे अभियान की ‘इंस्‍टेंट सोशल ऑडिटिंग’ की. एनजीओ के लोग सफाईकर्मियों की हाजिरी वाली जगह खुद मौजूद रहकर उनकी उपस्थिति और उनके काम की गुणवत्‍ता दोनों पर बारीक नजर रखते रहे. कई सामाजिक संगठन भी इस मामले में आगे आए. जैसे सिख समाज ने शहर में निकलने वाले अपने सालाना जुलूस आदि के दौरान होने वाले कचरे को साफ करने का प्रबंधन खुद किया. इसका असर यह हुआ कि कई और संगठनों ने उनका अनुकरण किया.


शहर को मिले इस सम्‍मान में सबसे बड़ी भूमिका सफाई मित्रों की रही जिन्‍होंने न दिन देखा न रात, न ठंड, गरमी या बारिश. दिवाली की रात सफाईकर्मियों ने आतिशबाजी हो चुकने के बाद कमान संभाली और सुबह होते होते सारी सड़कों से पटाखों का कचरा साफ कर दिया. वरना वो कचरा कई कई दिन तक सड़कों पर यूं ही पड़ा रहता था. क्रिकेट मैच के दौरान मैच हो जाने के बाद स्‍टेडियम के चारों ओर फैला कचरा चंद घंटों में साफ कर दिया गया. ये ऐसे उदाहरण थे जिन्‍होंने सफाई के प्रति नगर निगम के अमले की गंभीरता को स्‍थापित किया.

कुल मिलाकर इंदौर का सफाई मॉडल देश के दूसरे शहरों के लिए भी मिसाल है. यदि देश के सभी शहरों के लोग सफाई को अपनी आदत बनाने की ठान लें और नगरीय निकायों व अन्‍य प्रशासनिक विभागों के अधिकारी आपसी मतभेद या अहं भाव को परे रखकर किसी अभियान में पूरी ताकत से जुट जाएं और राजनीतिक नेतृत्‍व भी ऐसे अफसरों को पूरा संरक्षण दे तो देश का हर शहर इंदौर बन सकता है. लेकिन इसमें सबसे बड़ी भागीदारी लोगों को खुद निभानी होगी.


इंदौर के लोग अपने शहर को सफाई का ब्रांड बनाने के इरादे से किस हद तक गए इसका उदाहरण इसी बात से समझा जा सकता है कि शहर की सड़कों के साफ सुथरा होने का स्‍तर बताने के लिए इंदौर के परिवारों ने सड़क के किनारे बैठकर पिकनिक मनाते हुए खाना खाया. जिन सड़कों पर गंदगी के कारण नंगे पैर रखने में हिचक होती हो वहां बैठकर खाना खाने से बड़ा उदाहरण सफाई का और क्‍या हो सकता है?  इंदौरियों को उनकी इस ताजा उपलब्धि पर इंदौरी अंदाज में ही बधाई देते हुए मुख्‍यमंत्री शिवराजसिंह ने ठीक ही कहा- ‘वाह भिया! छा गया अपना इंदौर….’



(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
गिरीश उपाध्याय

गिरीश उपाध्यायपत्रकार, लेखक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. नई दुनिया के संपादक रह चुके हैं.

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First published: November 25, 2021, 11:25 AM IST
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