OPINION: सीबीआई, एम्स जैसी संस्‍थाओं को संदिग्‍ध बनाकर हम क्‍या हासिल कर रहे हैं?

यदि इसी तरह सारी एजेंसियां खारिज की जाने लगीं तो फिर जांच और अभियोजन का मतलब ही क्‍या रहेगा और यह काम आखिर करेगा कौन? कहीं न कहीं तो हमें किसी एजेंसी पर, उसके विशेषज्ञों पर निर्भर होना ही पड़ेगा.

Source: News18Hindi Last updated on: October 7, 2020, 11:26 PM IST
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OPINION: सीबीआई, एम्स जैसी संस्‍थाओं को संदिग्‍ध बनाकर हम क्‍या हासिल कर रहे हैं?
हाथरस गैंगरेप मामले में न्याय की मांग करते प्रदर्शनकारी लोग
इन दिनों हमारे आसपास जो कुछ हो रहा हैं उसमें सिर्फ प्रत्‍यक्ष तौर पर दिखने वाली घटनाएं ही नहीं हैं. इन घटनाओं के पीछे या इनके कारण भी, बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जो इनके असर से भी ज्‍यादा गंभीर और ज्‍यादा गहरा घाव करने वाला है. आज भले ही हमारा ध्‍यान इस ओर उतनी बारीकी से न जा रहा हो, लेकिन भविष्‍य में इसके दुष्‍परिणाम निश्चित तौर पर पूरे भारतीय समाज को भुगतने होंगे.

कुछ उदाहरण लीजिये. इन दिनों मीडिया में दो घटनाएं बहुत जोर शोर से प्रचारित-प्रसारित हो रही हैं. इनमें से एक को चलते हुए महीना डेढ़ महीना हो गया है, जबकि दूसरी अभी हाल ही की है. पहली घटना फिल्‍म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत से जुड़ी है तो दूसरी घटना हाथरस में एक दलित युवती के साथ हुए बर्बर सलूक की, जिसके चलते युवती की जान चली गई.

मूल रूप से दोनों ही घटनाओं के पीछे आपराधिक संदर्भ हैं. चूंकि उस पर बहुत कुछ कहा जा रहा है इसलिए उसे दोहराने के बजाय इन घटनाओं से जुड़े कुछ ऐसे संदर्भों को देखिये जो कुछ और भी कह रहे हैं. सबसे पहले सुशांत केस को ले लीजिये. इसमें मीडिया के एक सेक्‍शन ने जो एजेंडा या नैरेटिव चलाया वह सुशांत की हत्‍या का था. हालांकि उसके पीछे कोई प्रामाणिक तथ्‍य नहीं था, लेकिन वह नैरेटिव इतना हावी हो गया कि करीब-करीब सारे चैनल उस रौ में बहने के लिए मजबूर हो गए. यह मजबूरी प्रोफेशनल कम, कारोबारी प्रतिस्‍पर्धात्‍मक ज्‍यादा थी. प्रतिस्‍पर्धा खुद की कुर्सी डांवाडोल होने की, ऊंची पायदान से नीचे गिरने या धड़ाम हो जाने की. सो ऊपर चढ़ने या ऊपर बने रहने की जद्दोजहद में किसी ने भी जमीन की परवाह नहीं की. इस बात को भी भुला दिया कि कोई भी शिखर हवा में नहीं लटकता, उसका एक आधार जरूर होता है.

हवाबाजी का यह सिलसिला थोड़ा थमा ही था कि एक नई लहर ने फिर से उथल पुथल मचा दी. और यही वो लहर है जिस पर आज बात करना जरूरी है. सुशांत की मौत की जांच कर रही सीबीआई के अनुरोध पर दिल्‍ली के एम्‍स की फोरेंसिक टीम ने निष्‍कर्ष दिया कि वह मौत आत्‍महत्‍या ही थी हत्‍या नहीं. यह रिपोर्ट आनी भर थी कि प्रतिस्‍पर्धा का नया दौर चल पड़ा. सुशांत की हत्‍या का नैरेटिव बनाने वाले धड़े ने जहां एम्‍स की फोरेंसिक टीम पर सवाल उठाते हुए उसे लीपापोती बता दिया वहीं दूसरे धड़े ने रिपोर्ट को ‘सुशांत का सच’ करार देते हुए उसका समर्थन किया.
हाथरस वाली घटना में भी कोई कम उठापटक नहीं हुई. एक धड़ा वह था जिसने कहा कि युवती से सामूहिक दुष्‍कर्म हुआ, उसकी रीढ़ की हड्डी तोड़ दी गई और वह कोई बयान न दे सके इसलिए उसकी जीभ काट दी गई. जबकि पुलिस रिपोर्ट और मेडिकल जांच में कहा गया कि गैंग रेप की पुष्टि नहीं हुई है, लड़की की जीभ नहीं काटी गई और उसकी रीढ़ की हड्डी में चोट वाली बात भी वैसी नहीं है जैसी प्रचारित की जा रही है. लड़की के साथ दुष्‍कर्म मामले में अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज की मेडिको लीगल टीम और आगरा की फोरेंसिक लेबोरेटरी की टीमें आमने सामने आ गईं और उनके परस्‍पर विरोधाभासी बयानों ने मामले को और उलझा दिया. विवाद उन नामों पर भी हुआ जिन्‍हें लड़की के साथ दुष्‍कर्म का आरोपी बनाया गया.

दरअसल इन दोनों मामलों में घटना का होना और उस पर होनी वाली कार्रवाई की बात अपनी जगह है लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में स्‍थापित एजेंसियों की साख की जो धज्जियां उड़ी हैं या उड़ाई गई हैं वो गहरी चिंता का विषय है. हमारे यहां अपराध की जांच और अभियोजन की पूरी प्रक्रिया वैसे ही विश्‍वसनीयता की दृष्टि से संदेह के घेरे में रही है. ऐसे में यदि किसी भी मामले की जांच करने वाली और जांच से संबंध रखने वाली अन्‍य एजेंसियों की रिपोर्ट इसी तरह हमेशा ज्ञात-अज्ञात कारणों से संदिग्‍ध बताई जाती रही तो फिर न्‍याय होगा कैसे और कोई न्‍याय की उम्‍मीद करेगा भी कैसे?

यह बात निराधार नहीं है कि कई मामलों में अपराध की जांच से जुड़ी एजेंसियां अपना ‘खेल’ करती हैं. यह खेल अकसर राजनीतिक या उच्‍चस्‍तरीय हस्‍तक्षेप के कारण होता है, लेकिन उसके बावजूद हमें किसी न किसी एजेंसी को तो जांच सौंपनी ही होगी. ऐसा कैसे चल सकता है कि जैसे ही कोई घटना हो, उसके बारे में एक निश्चित नैरेटिव बना लिया जाए और अपेक्षा यह की जाए कि जांच और अभियोजन एजेंसियों से लेकर न्‍याय तंत्र भी उसी नैरेटिव के तहत या उसी एजेंडा को फॉलो करते हुए, उसी लाइन पर अपनी रिपोर्ट या फैसला दें.सबसे चिंताजनक बात यह है कि नैरेटिव बनाने या एजेंडा चलाने का यह काम मुख्‍य मीडिया कर रहा है. यानी समाज वह जिम्‍मेदार संस्‍था जिसकी भूमिका ऐसे मामलों में निष्‍पक्ष जांच सुनिश्‍चत करवाने की होनी चाहिए, वह पक्षकार बनकर जांच को प्रभावित करने में लगी है. और उससे भी आगे, जांच की रिपोर्ट अपने द्वारा चलाए गए नैरेटिव या एजेंडे के अनुरूप न आने पर उस एजेंसी को ही खारिज किया जा रहा है. यदि इसी तरह सारी एजेंसियां खारिज की जाने लगीं तो फिर जांच और अभियोजन का मतलब ही क्‍या रहेगा और यह काम आखिर करेगा कौन? कहीं न कहीं तो हमें किसी एजेंसी पर, उसके विशेषज्ञों पर निर्भर होना ही पड़ेगा.यदि इसी तरह सारी एजेंसियां खारिज की जाने लगीं तो फिर जांच और अभियोजन का मतलब ही क्‍या रहेगा और यह काम आखिर करेगा कौन? कहीं न कहीं तो हमें किसी एजेंसी पर, उसके विशेषज्ञों पर निर्भर होना ही पड़ेगा.

यदि पुलिस नाकारा, सीबीआई नाकारा, एम्‍स के डॉक्‍टर नाकारा यहां तक कि संसद और न्‍यायपालिका भी नाकारा तो फिर जांच सौंपी किसे जाए? आसमान से उतर कर तो कोई जांच करने आने वाला नहीं है. हमें काम तो इन्‍हीं एजेंसियों को सौंपना होगा, जिम्‍मेदारी और जवाबदेही इनकी ही तय करनी होगी. यह जो प्रवृत्ति पनपती जा रही है कि मनोनुकूल काम न हो तो आप किसी भी एजेंसी को खारिज कर दो, यह हमारे गवर्नेंस के समूचे ढांचे के लिए ठीक नहीं है. हम भीड़तंत्र के हाथों में फैसला करने का अधिकार नहीं दे सकते. आज जो हो रहा है वह गवर्नेंस के हमारे पूरे सिस्‍टम की ‘मॉब लिंचिंग’ जैसा है. इस ‘मॉब लिंचिंग’ को हमें रोकना ही होगा अन्‍यथा अविश्‍वास का एक ऐसा भयानक वातावरण तैयार होगा जो समाज में हिंसक अराजकता का कारण बनेगा.

राजनीति के तंत्र ने तो अविश्‍वास के इस माहौल को तैयार करने में बहुत बड़ा रोल अदा किया ही है, अब यदि बाकी लोग भी इसी लाइन पर चल पड़ें और सरकार, संसद, सुप्रीम कोर्ट सब को विश्‍वास के योग्‍य न बताते हुए संदेह के दायरे में खड़ा कर दें तो जरा सोचिये ऐसी स्थिति समाज और लोकतंत्र के लिए कितनी घातक होगी. आज जो हो रहा है, वह उसी दिशा में बढ़ता दिखाई दे रहा है. इसे रोकना और संस्‍थाओं को विश्‍वसनीय एवं जवाबदेह बनाने के साथ-साथ उनमें विश्‍वास कायम करना जरूरी है, अन्‍यथा वह दिन दूर नहीं जब हमें सारी संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्‍थाओं की दीवारें दरकती नजर आएंगी.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
गिरीश उपाध्याय

गिरीश उपाध्यायपत्रकार, लेखक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. नई दुनिया के संपादक रह चुके हैं.

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First published: October 7, 2020, 11:01 PM IST
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