क्‍या अब नौकरशाही भी सांप्रदायिक खांचों में बंटेगी?

आरोप है कि एक टीवी चैनल ने अपने कार्यक्रम में मुस्लिमों को अखिल भारतीय सेवाओं में जाने से रोकने की बात की. अब यह मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में है. वहीं, सोशल मीडिया में वायरल एक वीडियो में कहा जा रहा है कि यदि मुस्लिमों को आगे बढ़ना है और समाज में दबदबा कायम करना है तो उन्‍हें बाकी काम छोड़कर अखिल भारतीय सेवाओं में अधिक से अधिक संख्‍या में नौकरियां पाने के जतन करने चाहिए.

Source: News18Hindi Last updated on: September 22, 2020, 11:19 AM IST
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क्‍या अब नौकरशाही भी सांप्रदायिक खांचों में बंटेगी?
आईएएस बनने के लिए यूपीएससी द्वारा आयोजित परीक्षा पास करना होती है.
सुशांत-रिया प्रकरण, कोरोना महामारी, चीन के साथ टकराव और अब कृषि सुधार को लेकर आए बिल के समानांतर देश में कुछ ऐसी भी घटनाएं हो रही हैं जिन पर बात भले ही उस गंभीरता से न की जा रही हो, लेकिन वे मामले न सिर्फ गंभीर हैं, बल्कि यदि समय रहते उन पर ध्‍यान नहीं दिया गया तो वे देश के संवैधानिक और लोकतांत्रिक ढांचे के साथ साथ सामाजिक तानेबाने के लिए भी बहुत बड़ा खतरा साबित हो सकते हैं.

ऐसा ही एक मामला अखिल भारतीय सेवाओं यानी आईएएस, आईपीएस, आईएफएस, आईआरएस आदि में सांप्रदायिक आधार पर घुसपैठ का है. वैसे तो यह मामला पिछले कई दशकों से अलग अलग ढंग से उठता रहा है. मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति की समीक्षा और उसमें सुधार के उपायों को लेकर 2005 में गठित सच्‍चर कमेटी की रिपोर्ट के बाद से तो इस पर लगातार बात होती रहती है.

मुस्लिम समुदाय के साथ गैर बराबरी के मुद्दे को लेकर सरकार ने 9 मार्च 2005 को जस्टिस राजिंदरसिंह सच्‍चर की अध्‍यक्षता में उच्‍चस्‍तरीय समिति का गठन किया था. इस समिति ने 17 नवंबर 2006 को अपनी रिपोर्ट दी थी और उसी महीने उसे संसद के पटल पर रख दिया गया. कमेटी ने कुल 76 सिफारिशें की थीं जिनमें से सरकार ने 72 सिफारिशें मान लीं. तीन सिफारिशें नामंजूर कर दी गईं और एक सिफारिश को स्‍थगित रखा गया. उसके बाद से मुस्लिम समुदाय के साथ गैरबराबरी की या उनके उत्‍थान की जब भी बात होती है, हमेशा सच्‍चर कमेटी का उदाहरण दिया जाता है.

ताजा विवाद कुछ हटकर है. यह विवाद एक टीवी चैनल के उस कार्यक्रम को लेकर पैदा हुआ है जिसको लेकर कथित तौर पर यह आरोप लगाया गया कि वह मुस्लिमों को अखिल भारतीय सेवाओं में जाने से रोकने की बात करता है. यह मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में है और वहां चैनल की ओर से हलफनामा दायर कर कहा गया है कि उसने किसी समुदाय विशेष को अखिल भारतीय सेवाओं में जाने से रोकने की बात नहीं की बल्कि इस बात को उठाया है कि जो संगठन अखिल भारतीय सेवाओं में जाने के लिए मुस्लिम युवाओं को तैयारी करवा रहे हैं, उन्‍हें पैसा देने वालों में कुछ ऐसे संगठन भी हैं जिनका आतंकवादी गतिविधियों से नाता रहा है. चूंकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है इसलिये उस पर ज्‍यादा टिप्‍पणी करना मुनासिब नहीं होगा.
इसी बीच सोशल मीडिया पर कुछ ऐसी क्लिपिंग वायरल हो रही हैं जिनकी सच्चाई का पता लगाया जाना और उनमें कही गई बातों के पीछे के मकसद को जानना बहुत जरूरी है. ऐसी ही एक क्लिपिंग में कथित तौर पर कहा जा रहा है कि मुस्लिमों को यदि आगे बढ़ना है और समाज में अपना मुकाम और दबदबा कायम करना है तो उन्‍हें बाकी कामों को छोड़कर अखिल भारतीय सेवाओं में अधिक से अधिक संख्‍या में नौकरियां पाने के जतन करने चाहिए. बात रखने वाला व्‍यक्ति इसके लिए ‘कब्‍जा’ शब्‍द का इस्‍तेमाल करता हुआ कहता है कि यदि आपको कुछ करना है तो आईएएस, आईपीएस जैसी जगहों पर कब्‍जा करना होगा. इसी सिलसिले में ‘जकात फाउण्‍डेशन’ को भी कठघरे में खड़ा किया जा रहा है.

इस पूरे मामले को केवल एक टीवी चैनल या सिर्फ एक या दो संगठनों से जोड़कर नहीं बल्कि समग्रता में देखना होगा. फौरी नतीजा निकालने के बजाय देश और भारतीय समाज पर इसके कारण पड़ने वाले असर और खतरे को समझना होगा. निश्चित रूप से भारतीय संविधान भारत के हर पात्र नागरिक को अपनी आजीविका पाने का अधिकार देता है. फिर चाहे वह किसी निजी संगठन में काम करे या फिर सरकारी संगठन में, किसी निजी उद्योग का कर्मचारी बने या स्‍वयं का उद्यम स्‍थापित करे. उसे ऐसा करने की स्‍वतंत्रता और अधिकार दोनों हैं. भारत के किसी भी नागरिक को सरकारी सेवाओं में इस आधार पर नहीं रोका जा सकता कि वह इस या उस धर्म अथवा पंथ का अनुयायी है.

इन अधिकारों और इस बाजादी के बरक्‍स हमें यह भी देखना होगा कि सरकारी सेवाओं में जाने या वायरल हो रही क्लिपिंग की भाषा में कहें तो उन पर ‘कब्‍जा’ करने के पीछे मकसद क्‍या है? जब हम स्‍वाभाविक तौर पर किसी सरकारी नौकरी को पाने के उपक्रम की बात करते हैं तो उससे किसी को कोई आपत्ति नहीं होती, होनी भी नहीं चाहिए. लेकिन जब हम तरह तरह के उदाहरण देते हुए एक ‘रणनीति’ के तहत ऐसी नौकरियों और पदों पर ‘कब्‍जा’ करने की बात करते हैं तो कान खड़े होना स्‍वाभाविक है.
चाहे हिंदू हो या मुसलमान, या फिर कोई किसी अन्‍य पंथ का अनुयायी ही क्‍यों न हो, उसे इस बात की इजाजत नहीं दी जा सकती कि वह अखिल भारतीय सेवाओं में या किसी भी सरकारी अथवा गैर सरकारी सेवा में किसी धर्म या पंथ का प्रतिनिधि बनकर बैठे या अपने धार्मिक या पांथिक उद्देश्‍यों के टारगेट को पूरा करने के मकसद से उन सेवाओं को जॉइन करे. अखिल भारतीय सेवाओं जैसी सेवा में आने वाला व्‍यक्ति सिर्फ और सिर्फ भारतीय संविधान, भारतीय कानून के पालन और भारत की समग्र जनता के प्रति जवाबदेही के भाव से आना चाहिए न कि किसी धर्म या पंथ विशेष के ‘टारगेट’ को पूरा करने के लिहाज से.

जरा कल्‍पना करके देखिये. यदि कोई जिला कलेक्‍टर या एसपी खुद को जनता का सेवक मानने के बजाय हिंदू या मुसलमान मानने लगे, या कि अपने धर्म और पंथ के लोगों को छोड़कर बाकी लोगों को अनसुना करने लगे, उनसे भेदभाव बरतने लगे या किसी अतिवादी मकसद को पूरा करने लगे तो क्‍या होगा? क्‍या हम ऐसे किसी तंत्र को इजाजत दे सकते हैं, क्‍या ऐसे किसी व्‍यक्ति को उस पद पर स्‍वीकार कर सकते हैं?

आज बात अखिल भारतीय सेवाओं पर सांप्रदायिक या पांथिक दृष्टिकोण से काबिज होने की हो रही है, कल को यह मामला और गहरे जाकर जातीय दृष्टिकोण से काबिज होने तक पहुंचेगा, जरा सोचिये तब क्‍या होगा? ऐसे कई कानून हैं, जिनमें कुछ जातियों और समुदायों को विशेष अधिकार मिले हैं, उन कानूनों के दुरुपयोग की बात किसी से छिपी नहीं है. उत्‍तरप्रदेश में विकास दुबे कांड में हम देख चुके हैं कि किस तरह पुलिस तंत्र के ही कुछ लोगों की अन्‍यान्‍य प्रतिबद्धताओं के चलते पुलिस बल को कितना बड़ा नुकसान उठाना पड़ा. यदि हमारी सरकारी सेवाओं में धर्म का, पंथ का, संप्रदाय का, समुदाय का या जाति का जहर फैला तो इस देश को बरबाद होने से कोई नहीं बचा सकेगा. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
गिरीश उपाध्याय

गिरीश उपाध्यायपत्रकार, लेखक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. नई दुनिया के संपादक रह चुके हैं.

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First published: September 22, 2020, 11:19 AM IST
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