OPINION : सचिन पायलट को अभी मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनना चाहिए ? जानिए इसकी सियासी वजह

इसमें कोई दो-राय नहीं कि 2013 में वसुंधरा राजे (Vasundhra Raje) के जबर्दस्त प्रदर्शन से सत्ता में आई भाजपा के बाद कांग्रेस की हालत लस्त—पस्त थी। ऊर्जाविहीन, बिखरी और निष्क्रिय कांग्रेस को एक बार फिर खड़ा करने का श्रेय सचिन पायलट (Sachin Pilot) को जाता है। लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री (Chief Minister) बनने के लिए धैर्य के घोड़ों पर सवार होना चाहिए।

Source: News18Hindi Last updated on: June 22, 2021, 3:34 PM IST
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OPINION : सचिन पायलट को अभी मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनना चाहिए ? जानिए इसकी सियासी वजह
इन हालातों में सचिन को क्या करना चाहिए, ये जानना जरूरी है. (फाइल फोटो)
टीवी के एक चर्चित शो के दौरान तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने कहा था कि पीएम और सीएम के बीच मतभेदों का खामियाजा राजस्थान की जनता को उठाना पड़ा. पायलट ने तब पुरजोर अंदाज में कहा कि किन्हीं मुद्दों पर पीएम और वसुंधरा राजे की आपस में अनबन हो सकती है, लेकिन राजस्थान की जनता इसे क्यों भुगते ? तब संदर्भ भाजपा का था और वर्तमान में ऐसे ही हालात कांग्रेस के हैं ! सवाल पूछा ही जाएगा कि पहले जब सीएम और डिप्टी सीएम के बीच नहीं बन रही थी, तब क्या इसका असर राजस्थान के विकास पर नहीं पड़ा ? राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के दो बड़े ध्रुव आपस में बार—बार टकरा रहे हों तो क्या इसका खामियाजा राज्य की जनता को नहीं भुगतना पड़ रहा है ?

पायलट ही कांग्रेस को ड्राइविंग सीट पर लेकर आए
इसमें कोई दो-राय नहीं कि 2013 में वसुंधरा राजे के जबर्दस्त प्रदर्शन से सत्ता में आई भाजपा के बाद कांग्रेस की हालत लस्त—पस्त थी. ऊर्जाविहीन, बिखरी और निष्क्रिय कांग्रेस को एक बार फिर खड़ा करने का श्रेय सचिन पायलट को जाता है. पायलट ने ही पार्टी के रूप में कांग्रेस को 2018 का विधानसभा चुनाव लड़ने का माद्दा दिया. लेकिन सेना को युद्ध के लिए तैयार करना और उसे जीतना दोनों अलग—अलग बाते हैं. चुनाव रूपी युद्ध जीतने के लिए कुशल रणनीति के साथ ही अलग—अलग संभागों के स्थानीय क्षत्रपों, राजनीतिक और जातिगत समीकरणों और जनता की नब्ज को पहचानना जरूरी है. राजनीतिक बिसात पर शह—मात के खेल में वही योद्धा साबित होता है जो अपने प्यादे से लेकर घोड़े—वजीर तक सही जगह फिट करता है.अशोक गहलोत इस बिसात पर पायलट से इक्कीस साबित हुए.

अति महत्वाकांक्षा नहीं कराया आत्मघाती गोल
फिर भी यह अकाट्य सत्य है कि पायलट ही कांग्रेस पार्टी को ड्राइविंग सीट पर लाए. चुनाव में जीत के बाद पार्टी ने भी उन्हें वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर नंबर दो नेता बनाया. प्रदेश अध्यक्ष के साथ—साथ डिप्टी सीएम. पर कुछ समय बाद ही पायलट ने इसे लात मारकर दूसरा रास्ता चुना. कहते हैं कि महत्वाकांक्षी होना जितना जरूरी है, अति महत्वाकांक्षी होना उतना ही खतरनाक. शायद यह अति महत्वाकांक्षा ही सचिन के लगातार आगे बढ़ते कदमों का खा गई. छोटी उम्र में ही राजनीति के आकाश पर देदीप्यमान सूर्य की तरह दमकने वाले पायलट की उड़ान पर खुद उन्होंने ही ब्रेक मार दिया. सीएम पद अविलंब पाने की अति महत्वाकांक्षा ने ही पिछले साल सियासी संकट में उनसे आत्मघाती गोल कराया.

सीएम की कतार लंबी, सचिन को सलाहकारों ने डुबोया
किसी राज्य का मुख्यमंत्री बनने की चाहना रखना गलत नहीं है. गहलोत तो सीएम हैं ही. उनके अलावा भी कांग्रेस में और भी नेता हैं, जो मन ही मन सीएम बनने की चाहत पाले हैं. इनकी कतार लंबी है. वे इस दिशा में नाप—तौल के कदम भी बढ़ा रहे हैं. लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा धैर्य के घोड़ों पर सवार है. वे उस वक्त के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. वक्त को मुठ्ठी में कैद कर सीएम बने की उत्कंठा उनमें नहीं है. सचिन के आसपास की मंडली और सलाहकारों ने यही धैर्य उनसे छीन लिया. उनमें तत्काल सीएम बनने की उत्कंठा जाग्रत कर दी. "अभी नहीं तो कभी नहीं" का जाप कराकर वे ही उन्हें बगावती रास्ते पर ले आए.अभी सीएम बनने के अनुकूल नहीं है परिस्थितियां
उनके अंतरर्मन में यह ठूंस दिया गया कि राज्य की जनता 'एक बार भाजपा और एक बार कांग्रेस' को जिताती है. यदि अभी सीएम नहीं बने तो अगले चुनाव में भाजपा आ सकती है. ऐसे में कांग्रेस और उनकी अगली बारी नौ—दस साल बाद आएगी. उनके समर्थक और सलाहकार अच्छा तर्क गढ़ते हैं...देश में अरुणाचल प्रदेश में पेमा खांडू 37 वर्ष, अखिलेश यादव और हेमंत सोरेन 38 साल और उमर अब्दुल्ला 39 साल की कम आयु में मुख्यमंत्री बनने वाले नेता हैं. 2018 में सचिन पायलट 41 साल के थे. ऐसे में यदि वे मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे थे तो इसमें क्या गलत है ? गलत मुख्यमंत्री बनने में नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुकूल न होने में है.

बगावत ने खोल दी सचिन की बंद मुट्ठी, निकले 20 विधायक
पिछले साल बगावत ने पायलट की बंद मुठ्ठी खोल दी, जिसमें सिर्फ 20 विधायक ही बंद थे. यानी बहुमत के लिए जरूरी एक चौथाई से भी कम! सारे हालात गहलोत के पक्ष में थे. और जब परिस्थितियां अनुकूल होती हैं तो गलतियां भी क्षम्य हो जाती हैं.

गहलोत वर्सेस पायलट राज्य के विकास में बाधक
अब सचिन के ही तर्क पर आते हैं. क्या गहलोत वर्सेज पायलट से राज्य की जनता का नुकसान विकास न होने के रूप में नहीं हो रहा है ? इस सियासी घमासान का मजा छुटभैइये नेता ले रहे हैं. सत्तारूढ़ नेताओं को विकास से ज्यादा दिलचस्पी कुर्सी बचाने और कुर्सी से गिराने में है. इस सियासी घमासान और रस्साकशी से इतर यदि सचिन धैर्य के रथ पर सवार होते तो आज हालात दूसरे ही होते.

सचिन बदल सकते हैं परिपाटी, जीते तो बनेंगे सीएम
वे निर्विवाद रूप से वे राज्य के दूसरे नंबर के नेता होते. प्रदेश अध्यक्ष भी रहते. युवा सचिन में वह ताकत है कि वह गहलोत के साथ मिलकर एक बार भाजपा और एक बार कांग्रेस की परिपाटी को बदल देते. वे जनता में विश्वास जगाते कि कांग्रेस ही प्रदेश को विकास की पथ पर सरपट दौड़ा सकती है. ऐसे में यदि कांग्रेस 2023 में जीतती तो सचिन को मुख्यमंत्री बनाने में कोई किन्तु—परंतु नहीं चलती. तब जनता से लेकर हाईकमान तक एक ही आवाज आएगी कि सचिन ही हमारा मुख्यमंत्री हो! पायलट ही राजस्थान के विकास का जहाज उड़ाएं !!
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
हरीश मलिक

हरीश मलिक पत्रकार और लेखक

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक. कई वर्षों से वरिष्ठ संपादक के तौर पर काम करते आए हैं. टीवी और अखबारी पत्रकारिता से लंबा सरोकार है.

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First published: June 21, 2021, 5:48 PM IST
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