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सियासत के नए दौर की नींव पूर्वांचल से रखी जाएगी

सियासत के नए दौर की नींव पूर्वांचल से रखी जाएगी
सोलहवीं लोकसभा के अंतिम चरण के मतदान के तहत यूपी की जिस धरती से देश की राजनीति की अगामी दिशा...

सोलहवीं लोकसभा के अंतिम चरण के मतदान के तहत यूपी की जिस धरती से देश की राजनीति की अगामी दिशा और दशा तय होनी है वो इलाका ठेठ पूर्वी उत्तर प्रदेश का है यानि पूर्वांचल। इस क्षेत्र विशेष, जिस पर सारे देश की निगाहें टिकी हैं वहां मिट्टी से मिट्टी का और कुएं से कुएं के पानी का रिश्ता है।

वाराणसी मुंशी प्रेमचन्द्र की जन्मभूमि है तो गोरखपुर कर्मभूमि उनकी कर्मभूमि। एक तरफ वाराणसी यानि काशी में बाबा विश्वनाथ तो दूसरी तरफ बाबा गोरखनाथ। दोनों के बीच आजमगढ़ का इलाका जहां साहित्य से लेकर सियासत तक के हलकों में नए अध्याय लिखे गए।

हालांकि बीते दो लगभग डेढ़ दशकों से आजमगढ़ को सरकारी एजेंसियों की रिपोर्टों को आधार बना कर हिन्दूवाद के पैरोकारों ने इस क्षेत्र को आतंकियों का गढ़ करार दे इस धरती की पवित्रता को दूषित करने से भी गुरेज नहीं किया।

फर्जी एनकाउंटरों के लिए कुख्यात गुजरात के गृह मंत्री व भाजपा के महासचिव अमित शाह मौजूदा चुनाव में भी चुनाव आयोग की तमाम पाबंदियों के बावजूद अपनी बदजुबानी से बाज नहीं आए। उन्होंने गत दिवस आजमगढ़ पहुंच कर वहां आजमगढ़ को आतंकवाद का अड्डा' बताने वाला भड़काऊ बयान दे डाला।

बहरहाल अंतिम चरण के मतदान के कुछ दिनों शेष होने की वजह से आजमगढ़ और वाराणसी सहित पूर्वांचल का पूरा इलाका दिल्ली की गद्दी के लिए जूझ रहे प्रधानमंत्री पद के दावेदारों, उनके समर्थक दलीय नेताओं एवं प्रचारकों के लिए चुनावी दंगल के अखाड़े में तब्दील हो चुका है। इसकी वजह भी साफ है।

ठेठ पूर्वांचल सहित पांचवें चरण के तहत प्रदेश की जिन 15 सीटों पर सात मई को मतदान हुआ वे सभी लगभग पूर्वांचल से लगी हुई हैं। यानि इस क्षेत्र की कुल पैंतीस सीटों पर बड़ी जीत हासिल करने वाले दल के लिए दिल्ली का रास्ता आसान होना है।

मौजूदा चुनाव में भी सियासत के नए दौर की नींव भी इसी जमीन से रखी जाएगा। क्षेत्र विशेष से जुड़ी सीटों में से 15 सीटों पर मतदान सात मई को हो चुका है बाकी 18 सीटों पर 12 मई को मतदान होना है। पूर्वांचल के इस महत्वपूर्ण सियासी गलियारे के एक तरफ पड़ोसी राष्ट्र नेपाल है तो दूसरी तरफ बिहार के सीमावर्ती क्षेत्र।

तीसरी ओर झारखण्ड, उड़ीसा और मध्य प्रदेश की सीमा, जहां के सांस्कृतिक और सामाजिक हालात भी इस अंचल को प्रभावित करते हैं। पूर्वांचल के मतदाता पहली बार भाजपा के नरेन्द्र मोदी, समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और नवजात, लेकिन आश्चर्यजनक तरीके से देश के राजनीतिक क्षितिज पर उभरी आम आदमी पार्टी, यानि आप के अरविन्द केजरीवाल का इम्तिहान लेंगे।

इसी के साथ पूर्वांचल की धरती से जुड़े कद्दावर नेताओं योगी आदित्य नाथ, कलराज मिश्र और केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री आर.पी.एन. सिंह की साख का भी खाका यहां के मतदाता ही तय करेंगे।

इस क्षेत्र विशेष के सियासी परिदृष्य पर गौर करने से यह बात एक बार फिर से साफ हो गयी है कि राजनेताओं और उनके प्रचारकों के बुने ताने-बाने के बीच यहां के स्थानीय मुद्दे जिनमें बाढ़ से होने वाली तबाही, बन्द चीनी मिलों से बेहाल किसानों की दुर्दशा और सबसे गम्भीर समस्या इन्सेफ्लाइटिस जैसी बीमारी, जिसकी गिरफ्त में साल दर साल सैकड़ों की तादाद में बच्चे मौत का शिकार हो जाते हैं शामिल हैं वे गुम से हो गए हैं।

उनकी जगह केवल आतंक और नीच बातों व नीची जातियों पर बहस ने ले ली है। केन्द्र और राज्य के सत्ताधारी दलों को निशाने पर रखने के लिए विपक्षी दल भाजपा व बहुजन समाज पार्टी मंहगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को भी अपनी सभाओं में उठा रहे। देश और प्रदेश में व्यवस्था में बदलाव के लिए मोदी का मंत्र हो या केजरीवाल की हुंकार के मुद्दे भी यही हैं।

नारायणी, सरयू, राप्ती, गंगा, तमसा, वरुणा, गंडक, छोटी गंडक और सोन के पाटों से घिरे पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिन 18 सीटों पर इस चरण में मतदान होना है उनमें डुमरियागंज, महाराजगंज, गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, बांसगांव, लालगंज, आजमगढ़, घोसी, सलेमपुर, बलिया, गाजीपुर, जौनपुर, मछलीशहर, चन्दौली, वाराणसी, मिर्जापुर और राबर्ट्सगंज की सीटें शामिल हैं।

अल्पसंख्यक बहुल के साथ ही लगभग हर सीट पर यादव, अन्य पिछड़े और अति पिछड़ों सहित दलित मतदाताओं की अच्छी तादाद वाले इस क्षेत्र में पिछले चुनाव में उलेमा कौंसिल हो या फिर पीस पार्टी भले ही कोई करिश्मा नहीं कर सकी पर मौजूदा चुनाव में इन संगठनों का शोर सपा, बसपा, कांग्रेस और भाजपा सभी को डरा रहा है।

माफिया डान मुख्तार अंसारी से सम्बंधित कौमी एकता दल से भी सपा, बसपा और भाजपा में खौफ है। मोदी के खिलाफ मुख्तार की कौमी एकता दल ने वाराणसी में कांग्रेसी उम्मीदवार अजय राय को समर्थन दे दिया है। हालांकि इन दोनों ही बाहुबलियों के बीच खूनी रंजिश का मुद्दा पूर्वांचल में अब तक आम रहा है।

पूर्वांचल में प्रदेश की सत्ता पर काबिज सपा के यादव परिवार के मुखिया व कद्ददावर नेता मुलायम भी मैनपुरी की अपनी परम्परागत सीट के साथ ही पूर्वांचल के आजमगढ़ में पहली बार दावेदारी ठोंकने आ पहुंचे हैं। उन्होंने आजमगढ़ को यूं ही नहीं चुना है। यह सीट उनके एम-वाई (मुस्लिम-यादव) फार्मूले के हिसाब से सटीक बैठती है।

वैसे उनकी यहां आमद की एक वजह वाराणसी में भाजपा की ओर से मोदी की उम्मीदवारी भी अहम कारण है। मुलायम पूर्वांचल की इस उर्वर जमीन में दोबारा से मण्डल पर कमण्डल को हावी नहीं होने देना चाहते और उनकी यही रणनीति उन्हें और उनके कुनबे को पूर्वांचल में खींच लाई है। वैसे भी अगर बीते 2009 के लोक सभा चुनाव के परिणामों में पर गौर करें तो साफ है कि यहां सपा 6 सीटों पर जीत हासिल कर सबसे आगे थी। उसके पीछे बसपा 5 सीटों के साथ तो भाजपा व कांग्रेस ने 4 और 3 सीटों को जीत कर ठेठ पूर्वांचल में अपनी मौजूदगी दर्ज करायी थी।

बहरहाल इस क्षेत्र में अभी भी उलेमा, जातीय समीकरण और आतंकवाद का मुद्दा जिन्दा है, लेकिन अगर पूर्वांचल के गौरवशाली इतिहास पर गौर करें तो यह क्षेत्र 1990-91 में मण्डल-कमण्डल और उसके बाद जातीय समीकरणों का दौर चालू होने के पूर्व सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से बेहद समृद्ध रहा है।

पूर्वांचल को स्व. लाल बहादुर शास्त्री और स्व. चन्द्रशेखर के रूप में देश को दो प्रधानमंत्री देने का गौरव हासिल है। प्रदेश के कई कद्दावर मुख्यमंत्रियों और राजनेताओं तथा महान साहित्यकारों, कवियों व शिक्षाविदों को भी इसी धरती ने दिया है। और अब एक बार फिर पूर्वांचल पर देश को न केवल प्रधानमंत्री पद के दावेदारों को चुनने का जिम्मा आ गया है बल्कि देश का राजनीतिक व सामाजिक ताना-बाना क्या होगा, उसकी दिशा और दशा क्या होगी उसे तय करने की जिम्मेदारी भी है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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