दिलीप साहेब एक्टर तो बहुत बड़े थे ही, आदमी के तौर पर उससे भी बड़े रहे

दिलीप कुमार का बड़प्पन उनकी सहजता थी. ये उनकी ही खासियत थी कि वो बाल ठाकरे के दोस्त थे तो फैज अहमद फैज के भी. अपनी तहजीब और समृद्ध परंपरा के कारण लखनऊ उन्हें बहुत अजीज था. जब भी लखनऊ से कोई न्योता मिलता वो जरूर आते थे और अदीब शायरों से मिलते थे.

Source: News18Hindi Last updated on: July 7, 2021, 6:23 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
दिलीप साहेब एक्टर तो बहुत बड़े थे ही, आदमी के तौर पर उससे भी बड़े रहे
मौत से किसकी रिश्तेदारी है, आज नहीं तो कल हमारी बारी है. लेकिन दिलीप कुमार उन चंद लोगों में रहे जो जिये तो पूरी शान से और बहुतों को हौसले के साथ जीने की हिम्मत दी, प्रेरित किया. नए लोगों को उन्होंने बहुत बढ़ावा दिया और हमेशा मदद की. दिलीप साहेब दरअसल सिर्फ अदाकार ही नहीं सही मायनों में फनकार थे और उनके संबंध अनेक लेखकों, शायरों और नाटककारों से थे. मसलन कुंवर महेंद्र सिंह बेदी, राजेंद्र सिंह बेदी और जावेद अख्तर.

जावेद साहेब से तो उनकी नजदीकी बहुत अधिक थी. मैं भी जावेद साहेब से जुड़ा रहा और उनके जरिए दिलीप साहेब की बातें सुनने को मिलती रहती थीं. हर बार मन में ये आता कि आखिर मैं कब दिलीप साहेब से मिल पाऊंगा. जावेद साहेब अक्सर रात में दिलीप साहेब से फोन पर बातें करते. उसके बाद दिलीप साहेब से मिलने की मेरी चाहत और बढ़ जाती. लेकिन बार बार कहा भी नहीं जा सकता था. बहरहाल, मेरी दिलीप साहेब से मुलाकात की चाहत लखनऊ में पूरी हुई. हालांकि एक दफा मुंबई में उन्हें नजदीक से देखने का मौका मिला. खुमार साहेब की याद में एक मुशायरा था. वहां दिलीप साहेब को बुलाया गया था. उस समय वो बीमार थे लेकिन दिलीप साहेब ह्वील चेयर पर वहां आए और कहा भी कि वो खुमार साहेब से रिश्ता निभाने आए हैं. मंच पर नहीं चढ़ सके और नीचे से ही एक छोटी सी तकरीर करके चले गए. रिश्ते निभाने की इस अदा से उनके लिए मेरे मन में और इज्जत पैदा हो गई.

ये भी पढ़ें :- RIP Dilip Kumar: युसुफ खान के दिलीप कुमार बनने और एक्टिंग लीजेंड होने की काफी रोचक है कहानी

सहजता ऐसी कि यकीन करना मुश्किल
तो लखनऊ में पहली बार जब दिलीप कुमार साहेब को अवध रत्न के लिए बुलाया गया उस वक्त मंच के संचालन की जिम्मेदारी मुझे दी गई. प्रोग्राम हुआ जिसके बाद वो होटल के अपने सूइट में चले गए. इस दरम्यान मेरी पत्नी ने ख्वाहिश की कि एक फोटो दिलीप कुमार साहेब के साथ होनी चाहिए. मैंने ये बात हसन कमाल साहेब से कही. हसन साहेब सूइट में लेकर गए और वहां दिलीप साहेब को ये बात बताई. दिलीप साहेब तुरंत बाहर आ गए और फोटो खिंचवा ली. एक्टिंग की दुनिया के बादशाह की इस सहजता पर उस वक्त यकीन करना आसान नहीं था.

ये भी पढ़ें :- यादों में Dilip Kumar: कोर्ट में दिए एक बयान ने तोड़ दिया था दिलीप कुमार और मधुबाला का 7 साल पुराना रिश्ता

शक्ति में एक्टिंग की बनी मिसालये वो वक्त था जब अमिताभ बच्चन की फिल्में सिर चढ़ कर बोल रही थीं. उसी दौर में फिल्म शक्ति आई. कानपुर के रहने वाले मुशीर रियाज साहब ने ये फिल्म बनाई थी. इसमें एक ओर ट्रेज़डी किंग दिलीप कुमार थे तो दूसरी ओर एंग्रीमैन बन चुके अमिताभ बच्चन साहब. लेकिन दिलीप कुमार साहेब की एक्टिंग इसमें भी मिसाल की तरह आई. एक सीन में राखी की मौत हो जाती है, सिरहाने दिलीप साहेब बैठे हैं. अमिताभ आते हैं और देखते हैं दिलीप साहेब के हाथों में हाथ रखते हैं और एक दूसरे की आंखों में देखते हैं फिर चले जाते हैं. यहां कोई डायलाग नहीं हुआ. लेकिन एक्टिंग ऐसी की मिसाल बन गई.

ये भी पढ़ें :- दिलीप कुमार ने जब पुणे में अंग्रेजों के खिलाफ दिया था भाषण, जेल जाकर बने थे 'गांधीवाला'

बाल ठाकरे से दोस्ती, फैज से भी पटती थी बहुत
दिलीप कुमार और नौशाद साहेब के बीच बहुत अच्छे ताल्लुक थे. दरअसल, मुंबई में नौशाद साहेब रहते भी दिलीप कुमार साहेब के घर के पास ही थे और दोनों ही बड़े फनकार थे. लिहाजा दोनों में बहुत गहरी छनती थी. नौशाद साहेब से उन्होंने लखनऊ के खाने और यहां की ऐतिहासिक इमारतों के बारे में सुन रखा था. लिहाजा जब भी लखनऊ आते तो ऐतिहासिक महत्व की जगहों को खोजते रहते. यहां का खाना तो खासतौर से उनके लिए लाया जाता था. क्योंकि इतने बड़े एक्टर का दुकानों पर जाना मुमकिन नहीं था. वैसे तो दिलीप साहेब बहुत ही खामोश तबीयत के आदमी थे लेकिन लाखनऊ आने पर उस दौर के बड़े शायरों और लेखकों से हालाते हाजरा पर लंबी चर्चाएं किया करते थे. याद दिलाना चाहूंगा कि बाल ठाकरे के दोस्त रहे इस महान एक्टर की फैज अहमद फैज से बहुत पटती थी. जब भी फैज साहेब हिंदुस्तान आते तो मुंबई में दिलीप साहेब के घर एक महफिल जरूर सजती थी. ऐसे बड़े कलाकार के जाने से फिल्मी दुनिया के एक बहुत ही शानदार दौर का अंत जरूर हो गया लेकिन अपनी एक्टिंग के साथ मुश्तरिका तहजीब के लिए भी याद रखे जाएंगे.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
हसन काज़मी

हसन काज़मीशायर और पत्रकार

हसन काजमी जाने माने शायर,पत्रकार और रंगकर्मी है. देश के तकरीबन हर हिस्से के साथ विदेशों में भी मुशायरों में बुलाए और सम्मानित किए गए है. लखनऊ दूरदर्शन के अलावा सहारा नेटवर्क के उर्दू चैनल 'आलमी' के हेड रह चुके हैं. पत्रकारिता के साथ-साथ रंगमंच में भी हसन साहब की खासी दिलचस्पी है. लखनऊ में ऐतिहासिक पृष्टभूमि के कई नाटकों में यादगार भूमिकाएं की हैं.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: July 7, 2021, 12:10 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर