यूपी में कोरोना की दूसरी लहर, पंचायत चुनावों ने और बढ़ाया मर्ज, हालात बेकाबू-सिस्टम लाचार!

Corona Epidemic in UP: उत्तर प्रदेश में कोरोनाकाल में हो रहे पंचायत चुनावों में उमड़ रही भीड़ और बाहरी राज्यों से आ रही प्रवासी मतदाताओं की फौज ने स्वास्थ्य संकट पैदा कर दिया है. प्रदेश में जो हालात हैं वो कमोबेश सरकार के नियंत्रण से बाहर हो चुके हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: April 20, 2021, 4:07 PM IST
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यूपी में कोरोना की दूसरी लहर, पंचायत चुनावों ने और बढ़ाया मर्ज, हालात बेकाबू-सिस्टम लाचार!
यूपी में सरकारी और जनता के स्तर पर बरती गई लापरवाही से कोरोना संक्रमण में आई तेजी.
उत्तर प्रदेश में कोरोना की दूसरी लहर के सामने सब बेबस हैं. प्रदेश में ऑक्सीजन की कमी से दम तोड़ रहे मरीजों के परिजनों में गुस्सा बढ़ता जा रहा है. ऑक्सीजन की किल्लत से मारे-मारे फिर रहे तीमारदारों का गुस्सा सड़कों पर दिखने लगा है. अपने परिजनों के लिए ऑक्सीजन तलाश रहे तीमारदारों ने स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों पर राजधानी लखनऊ में हमला बोल दिया. गुस्साई भीड़ कई जगहों पर ऑक्सीजन के कारखानों और आपूर्ति करने वाले प्रतिष्ठानों को घेरे हुए है. रेमडेसिविर जैसे प्राणरक्षक इंजेक्शन की भी प्रदेश में भारी किल्लत है. इसकी जमकर कालाबाजारी हो रही है. हालांकि, मुख्यमंत्री ने ऑक्सीजन व रेमडेसिविर इंजेक्शन की कालाबाजारी करने वालों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) लगाने को कहा है.

कोरोना संक्रमण से रोकथाम को लेकर खुद अपनी पीठ थपाथपा रही उत्तर प्रदेश सरकार को उसके ही मंत्री विधायक सांसद और नेता कटघरे में खड़ा कर रहे हैं. प्रदेश में कई चरणों में हो रहे पंचायत चुनावों ने कोढ़ में खाज का काम किया है. पंचायत चुनावों में उमड़ रही भीड़ और बाहरी राज्यों से आ रही प्रवासी मतदाताओं की फौज ने स्वास्थ्य संकट पैदा कर दिया है. प्रदेश की राजधानी सहित ज्यादातर बड़े शहरों में मरीजों की भारी तादाद के चलते अस्पतालों में बेड नहीं बचे हैं, तो मृतकों के अंतिम संस्कार के लिए लंबी लाइन लगी है और घंटों इंतजार करना पड़ रहा है.

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव का दूसरा चरण सोमवार को खत्म हुआ है, जिसमें भारी तादाद में लोगों ने मतदान किया. सोमवार को 20 जिलों में मतदान हुआ है, जबकि 18 जिलों में पहले ही हो चुका है. अब पंचायत चुनाव के साइड इफेक्ट्स भी सामने आने लगे हैं. जिन 18 जिलों में प्रथम चरण के मतदान 15 अप्रैल को हुए थे. उनमें से 16 जिलों में कोरोना के केस बढ़ गए हैं. हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह तो होना ही था. सरकार अब जो सुविधाएं कोरोना के नाम पर शुरू कर रही है, बढ़ती मांग के चलते वह भी नाकाफी होगी.


सामने आ रहे पंचायत चुनाव के साइड इफेक्ट
पंचायत चुनाव के प्रथम चरण के लिए 18 जिलों, अयोध्या, आगरा, कानपुर, गाजियाबाद, गोरखपुर, जौनपुर, झांसी, प्रयागराज, बरेली, भदोही, महोबा, रामपुर, रायबरेली, श्रावस्ती, संत कबीर नगर, सहारनपुर, हरदोई और हाथरस में 15 अप्रैल को मतदान हुए थे. इन जिलों में 2.21 लाख पदों के लिए चुनाव हुए हैं, लेकिन अब इनके साइड इफेक्ट सामने आ रहे हैं. खुद अधिकारियों का मानना है कि प्रदेश में पंचायत चुनाव में कोरोना प्रोटोकॉल का पालन नहीं हो रहा है. स्वास्थ्य विभाग के विशेषज्ञों का ही कहना है कि बिना भीड़ के कौन सा चुनाव होता है? उनका कहना है कि पंचायत चुनाव में निर्वाचन आयोग द्वारा बड़ी-बड़ी बातें की गई, लेकिन कोई एक जगह इस तरह की नहीं है जहां कोरोना प्रोटोकॉल का पालन किया गया हो. यहां तक कि कोरोना मरीजों को भी वोटिंग के लिए छूट दी गई है. मतदान केंद्रों पर सोशल डिस्टेंसिंग नहीं ही दिखी. विशेषज्ञों ने कहा कि सरकार ने धारा 144 लगाई थी कि 5 लोग से ज्यादा इकट्ठा न होने पाए लेकिन इसका असर चुनावों के दौरान नहीं दिखा. अब हालात ये हो गए हैं कि इसका असर आने वाले दिनों में और दिखेगा. एक तरफ सरकार चिकित्सा सुविधाओं की डिमांड पूरी करने में लगी है तो दूसरी तरफ मरीज बढ़ रहे हैं.

दरअसल, पंचायत चुनावों में वोट डालने को भारी तादाद में महानगरों से प्रवासी मजदूर लौट रहे हैं. लखनऊ के चारबाग स्टेशन पर मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों से आने वाली कई ट्रेनों से रोजाना के करीब 10 से 15 हजार यात्री उतर रहे हैं. इनमें से ज्यादातर यात्री पंचायत चुनावों में वोटिंग के लिए आए हैं. प्रवासी मजदूरों के लिए पंचायत चुनाव तो है ही, साथ ही प्रवासी मजदूरों को डर है कि यह महानगर लॉकडाउन की तरफ बढ़ रहे है. ऐसे में लोग बिना परेशानी और तकलीफ के जल्द से जल्द अपने गांव पहुंचना चाहते हैं लेकिन यूपी सरकार की तैयारी इनके लिए नाकाफी है.

गांवों में संक्रमण रोकने की तैयारी नाकाफीउधर, कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए प्रदेश के किसी भी गांव में अभी क्वारंटीन सेंटर नहीं बने हैं. जहां बाहर प्रदेशों से आने वालों को आइसोलेट किया जा सके. स्टेशन पर दिखावे के लिए थर्मल स्कैनिंग हो रही है लेकिन ऐसा कोई केस सामने नही आया है कि जिसे आइसोलेट किया गया हो. यह सभी लखनऊ उतर कर सार्वजनिक परिवहन से अपने अपने शहरों की यात्रा कर रहे हैं. निगरानी समिति को एक्टिव किया गया है. लेकिन अब भी गांव में कोई एक्शन दिख नही रहा है. केवल मुंबई की ट्रेनों से ही 1 अप्रैल से 15 अप्रैल के बीच ढाई से 3 लाख प्रवासी मजदूर लखनऊ के आसपास शहरों और गांव में पहुंच चुके हैं.

अगर सरकार की ओर से ही जारी किए दैनिक आंकड़ों को देखा जाए तो अब तक जहां पंचायत चुनावों के लिए मतदान हो चुका है वहां के जिलों में जौनपुर में 15 अप्रैल को 265, 16 अप्रैल को 530, 17 अप्रैल को 435 केस थे, जो 18 अप्रैल को बढ़ कर 511 हो गए हैं. इसी तरह महोबा में 15 अप्रैल को 6, 16 अप्रैल को 31, 17 अप्रैल को 95 तो 18 अप्रैल को 115 संक्रमित हो गए थे. रामपुर में 15 अप्रैल को 29 तो 18 अप्रैल को 210 केस, रायबरेली में 15 अप्रैल को 309 से बढ़कर 18 अप्रैल को 345 मरीज हो गए थे. झांसी में 15 अप्रैल को 466 तो 18 अप्रैल को बढ़कर 954 केस हो चुके थे.


हाईकोर्ट का निर्देश बेअसर
पंचायत चुनावों और सरकार व जनता की लापरवाही के चलते बढ़ रहे कोरोना के मामलों पर हाईकोर्ट ने लखनऊ, प्रयाग, गोरखपुर, कानपुर व वाराणसी में 26 अप्रैल तक लॉकडाउन लगाने के भी निर्देश दिए हैं. कोरोना मामलों को देखते हुए हाईकोर्ट ने लखनऊ और प्रयागराज जिला प्रशासन को इलाज के सभी बंदोबस्त करने के निर्देश दिए हैं. हाईकोर्ट ने कोरोना के इलाज की दवाएं ऑक्सीजन सिलेंडर सहित बाकी व्यवस्थाएं रखने के निर्देश दिए हैं. हालांकि इसके जवाब में सरकार के प्रवक्ता ने कहा है कि उच्च न्यायालय के आदेश के मुताबिक प्रदेश में कोरोना के मामले बढ़े हैं और सख्ती कोरोना के नियंत्रण के लिए आवश्यक है. सरकार ने कई कदम उठाए हैं, आगे भी सख्त कदम उठाए जा रहे हैं. साथ ही जीवन बचाने के साथ गरीबों की आजीविका भी बचानी है. अतः शहरों में संपूर्ण लॉकडाउन अभी नहीं लगेगा, लोग स्वतः स्फूर्ति से भाव से कई जगह बंदी कर रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में जो हालात हैं वो कमोबेश सरकार के नियंत्रण से बाहर हो चुके हैं. दरअसल सरकार की ओर से जो भी व्यवस्थाएं की जा रही हैं वो मरीजों की बढ़ती भीड़ के आगे नाकाफी हो चुकी हैं. मुख्यमंत्री से लेकर हालात को संभालने वाले ज्यादातर अधिकारी खुद ही कोरोना संक्रिमत होकर आइसोलेशन में है और जनता पहले से ही चिकित्सा सुविधाओं के मामले में आइसोलेशन में चल रही है. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
हेमंत तिवारी

हेमंत तिवारीपत्रकार

राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लंबा लेखन. कई पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं.

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First published: April 20, 2021, 4:07 PM IST
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