लखनऊ को लखनऊ में जीने वाले योगेश प्रवीन की बिना इलाज मौत, आहत मंत्री ने उठाए सवाल

Yogesh Praveen Passes Away: प्रख्‍यात इतिहासकार, लेखक और संगीतकार पद्मश्री डॉ योगेश प्रवीन (82) का सोमवार को न‍िधन हो गया. बुखार के चलते उनकी तबीयत बिगड़ी, उन्हें बलरामपुर अस्पताल ले जाया गया था.

Source: News18Hindi Last updated on: April 13, 2021, 6:41 PM IST
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लखनऊ को लखनऊ में जीने वाले योगेश प्रवीन की बिना इलाज मौत, आहत मंत्री ने उठाए सवाल
प्रख्‍यात इतिहासकार, लेखक और संगीतकार पद्मश्री डॉ योगेश प्रवीन (82) का सोमवार को न‍िधन हो गया.
हर सांस लखनऊ को जीते रहे पद्मश्री योगेश प्रवीन सोमवार को अपने महबूब शहर के साथ ही इस दुनिया को भी छोड़ गए. लखनऊ को लखनऊ में लखनऊ बन कर जीते रहे योगेश प्रवीन को आखिरी वक्त पर न इलाज मिला और न एंबुलेंस. जब इलाज के लिए उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया तो बहुत देर हो चुकी थी.

प्रख्‍यात इतिहासकार, लेखक और संगीतकार पद्मश्री डॉ योगेश प्रवीन (82) का सोमवार को न‍िधन हो गया. बुखार के चलते उनकी तबीयत बिगड़ी, उन्हें बलरामपुर अस्पताल ले जाया गया था. यहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. इनसाइक्लोपीडिया ऑफ लखनऊ कहे जाने योगेश प्रवीन का मंगलवार को राजधानी के भैंसाकुंड स्थित बैकुंठ धाम पर अंतिम संस्कार कर दिया गया. प्रवीण के परिजनों ने आरोप लगाया है कि उनकी तबीयत खराब होने के बाद वे लोग काफी देर से एंबुलेंस का इंतजार कर रहे थे. उन्‍हें तेज बुखार आया, सांस उखड़ी, जिसके बाद एंबुलेंस बुलाई गई, लेकिन काफी देर तक एंबुलेस नहीं आई. परिजनों ने निजी वाहन से उन्हें बलरामपुर अस्‍पताल पहुंचाया, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया.

प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री ब्रजेश पाठक ने स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों को लिखे पत्र में इतिहासकार की मौत का हवाला देते हुए कहा है कि उनके आग्रह के बावजूद भी एंबुलेंस उपलब्ध नहीं हो सकी है. प्रदेश के कानून मंत्री ब्रजेश पाठक ने अपर मुख्य सचिव स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा को पत्र लिखकर अस्पतालों, एंबुलेंस, जांचों की खस्ताहालत का जिक्र किया है.

ब्रजेश पाठक राजधानी लखनऊ की एक विधानसभा सीट से विधायक भी हैं. उन्होंने अपने पत्र में लिखा है कि लखनऊ के मुख्य चिकित्साअधिकारी का पहले तो फोन तक नहीं उठता था और अब जो उठने लगा तो सुनवाई नहीं होती है. पाठक ने लिखा है कि पर्याप्त चिकित्सा सुविधा न मिलने के चलते जाने माने इतिहासकार योगेश प्रवीन की मौत हो गयी.
पद्मश्री योगेश प्रवीण की ख्वाहिश थी कि चौक स्थित उनका घर पंचवटी संग्रहालय बनाया जाए. इसके लिए वह पिछले कई वर्षों से लगातार प्रयास भी कर रहे थे पर संस्कृति विभाग की उपेक्षा के चलते उनकी यह ख्वाहिश अधूरी ही रह गई. लखनऊ के इतिहास, लोककथाओं और रहन सहन पर दर्जनों किताबें लिख चुके योगेश प्रवीन मूलत इतिहास के विद्यार्थी नहीं रहे पर अपने शहर से मोहब्बत ने उन्हें इतिहासकार बना दिया. लखनऊ को नवाबों, अदबी दुनिया से अलग उस समय के समाज के बारे में भी उनका चित्रण लोगों को इस शहर के बारे में नए सिरे से परिचय कराता है.

इतिहास लेखन से इतर कहानी, गीत व शायरी में भी योगेश प्रवी ने खूब हाथ आजमाया और शोहरत हासिल की. अपनी पुस्तक लखनऊनामा के जरिये उन्होंने लाखों-करोड़ों लोगों को लखनऊ की रूमानियत, कला, संस्कृति से रूबरू कराया. लखनऊ नामा के लिए उन्हें नेशनल अवार्ड भी मिला. वह विद्यांत हिन्दू कॉलेज से रिटायर हुए थे. उन्हें यश भारती, यूपी रत्न अवॉर्ड, नेशनल टीचर अवार्ड सहित कई सम्मान भी मिले थे.

योगेश प्रवीण मशहूर अभिनेता शशि कपूर के पसंदीदा लेखकों में शामिल थे. उनकी फिल्म 'जुनून' के तमाम गाने योगेश प्रवीण ने ही लिखे थे. इतना ही नहीं जब फिल्म की शूटिंग लखनऊ में चल रही थी तब वह योगेश प्रवीण के साथ ही लखनऊ की धरोहरों का भ्रमण किया करते थे और लखनऊ से जुड़ी जानकारियां और किस्से सुनते थे. फिल्म उमराव जान में भी योगेश प्रवीण की अहम भूमिका रही. यह उनकी ही सोच रही कि उमराव जान एक कालजयी फिल्म बन सकी.योगेश प्रवीण की जिंदगी के विभिन्न पहलुओं पर आधारित डॉक्यूमेंट्री लाइफ ऑफ योगेश प्रवीण जल्द ही रिलीज होगी. हालांकि डॉक्यूमेंट्री तैयार होने के बाद योगेश प्रवीण को दिखाई जा चुकी थी पर लॉकडाउन की वजह से इसे रिलीज नहीं किया जा सका था.

बहारे अवध, लखनऊनामा, पराया चांद, अवध की बेगमें, पीली कोठी, सुमनहार और अपराजिता जैसी कई बेमिसाल किताबें लिखने वाले योगेश प्रवीन अपने हर किस्से का अंत खुद के लिए शेरों या कविता से करते थे. किसी लखनऊवा किस्से के आखिर में वो लिखते हैं.......

बुलबुलों गुल न करो, मेरे सनम सोते हैं,
तुम तो उड़ जाती हो, वो मुझपे खफा होते हैं।

तो अब हमेशा के लिए सो चले हैं योगेश प्रवीन और इस बार बिना किसी पर खफा हुए.
लखनवियत की पहचान के तौर पर स्थापित योगेश प्रवीण जी खुद बताते थे कि जब अंग्रेजों ने अवध पर कब्जा कर लिया और नवाब वाजिद अली शाह को देश निकाला दे दिया, तो उन्होने सर्वकालिक प्रसिद्ध ठुमरी 'बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय' गाते हुए अपनी रियासत से अलविदा कहा. उन्हें रुखसत करने के लिए लखनऊ की लाखों जनता पहले से खड़ी थी.

सबकी आंखें भीगी थीं. लोग चिल्लाकर-चिल्लाकर की रहे थे कि खुदा हमारे शाह को सलामत रखे. उस दिन जो बादशाह लखनऊ छोड़कर गए, तो फिर कभी वे दोबारा न आ सके. लेकिन योगेश जी के लिए तमाम कोशिशों के बावजूद एक एम्बुलेंस का इंतजाम नहीं हो सका और उन्होंने अपना नैहर हमेशा के लिए छोड़ दिया.

(यह लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
हेमंत तिवारी

हेमंत तिवारीपत्रकार

राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लंबा लेखन. कई पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं.

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First published: April 13, 2021, 6:03 PM IST
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