जेलों के खेल रोकने में सभी फेल! सरकारें बदलती रहीं, नहीं बदली तो यूपी के कारागारों की कलंक कथा

यूपी की जेलों में पिछले कुछ वर्षों में जो घटनाएं हुई हैं, वह न सिर्फ चौंकाने वाली हैं, बल्कि बेहद चिंताजनक भी हैं. दुर्दांत अपराधियों और भ्रष्ट अधिकारियों की दुरभिसंधि का लंबे काले अतीत को लेकर अक्सर चर्चा में रहने वाली उत्तर प्रदेश की जेलों के खेल आज एक बार जेरे बहस हैं.

Source: News18 Uttar Pradesh Last updated on: May 15, 2021, 10:12 AM IST
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जेलों के खेल रोकने में सभी फेल! सरकारें बदलती रहीं, नहीं बदली तो यूपी के कारागारों की कलंक कथा
(कॉन्सेप्ट इमेज)
दुर्दांत अपराधियों और भ्रष्ट अधिकारियों की दुरभिसंधि का लम्बे काले अतीत को लेकर अक्सर चर्चा में रहने वाली उत्तर प्रदेश की जेलों के खेल आज एक बार जेरे बहस हैं. करीब पौने तीन साल पहले जब बागपत की जेल में माफिया डॉन और विधायक मुख्तार अंसारी का दाहिना हाथ समझे जाने वाले खूंखार अपराधी मुन्ना बजरंगी को जेल के भीतर पश्चिमी यूपी के गैंगस्टर सुनील भाटी ने गोलियों से छलनी कर दिया तो राज्य सरकार ने आनन फानन में तमाम बदलाव की कवायद शुरू कर दी थी. यह आपराधिक षड्यंत्र का गंभीर मामला माना गया जिसकी जांच सीबीआई कर रही है. उसी तर्ज पर उससे ज्यादा सनसनीखेज कांड चित्रकूट की जेल में हो गया, जहां सुबह सबेरे ही एक अपराधी ने दो अपराधियों को गोलियों से छलनी कर दिया और थोड़ी देर बाद खुद पुलिस की गोली से मारा गया. मतलब जेल के भीतर तीन मौतें.

बागपत और चित्रकूट जेल की घटनाओं में प्रथम दृष्टया कुछ बातें एक जैसी देखी गई हैं. जैसे यह कि दोनों कांड में जेल के भीतर नाइन एमएम पिस्टल जैसे घातक हथियार का इस्तेमाल किया गया और अपराधी के हाथों मारे गए अपराधी माफिया सरगना मुख्तार अंसारी से नजदीकी जुड़े हुए हैं. लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाई और छात्र राजनीति करते करते अपराधी बना सीतापुर का अंशु दीक्षित हत्या, अपहरण और पुलिस पर जानलेवा हमले सहित दर्जनों जघन्य आपराधिक घटनाओं में शामिल बताया जाता है. उसने जेल में ही पिस्टल का इंतजाम किया. सबेरे करीब नौ बजे उसने मुकीम काला और मेराजुद्दीन उर्फ भाई मेराज पर ताबड़तोड़ फायरिंग की और दोनों मौके पर ही मारे गए. पुलिस के मुताबिक अंशु ने पांच अन्य बंदियों को अपने कब्जे में लेकर मारने की धमकी दी. थोड़ी देर बाद पुलिस जेल में घुसी और वह मारा गया. अंशु दीक्षित करीब दो साल से इसी जेल में बंद था जबकि मेराज इसी साल 20 मार्च को वाराणसी और मुकीम काला अभी हफ्ते भर पहले महराजगंज जेल से यहां ट्रांसफर किए गए थे.

योगी ने मंगाई रिपोर्ट
खबर लखनऊ पहुंची और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंडलायुक्त-आईजी पुलिस सहित छह अफसरों की तीन बनाकर छह घण्टे के भीतर रिपोर्ट तलब की है. खूंखार अपराधी ने दुर्दांत अपराधियों को जेल के भीतर मार डाला और खुद पुलिस की गोली से मारा गया, तीनों का लंबा चौड़ा खूनी इतिहास था, इसके आपराधिक पक्ष की विवेचना चाहे जब एवं जिस निष्कर्ष पर पहुंचे लेकिन इतना साफ है कि राज्य में जेलों के भीतर चलने वाले खेल जल्द खत्म होने वाले नहीं हैं.
उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं
एक वक्त था जब राज्य में जेलों की प्रशासनिक कमान भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के हाथ में होती थी. वर्षों पहले बड़े बदलाव के तहत इसके मुखिया भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी बनाए जाने लगे. उनके नीचे भी आईपीएस अधिकारियों की तैनाती की गईं, लेकिन उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं आ सके हैं. इसमें कोई शक नहीं कि कुछ साल पहले डीजीपी रहे सुलखान सिंह और मौजूदा महानिदेशक आनंद कुमार जैसे अच्छी ख्याति वाले वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों ने जेल महकमे के मुखिया के तौर पर भ्रष्टाचार से सड़े सिस्टम की मुश्कें खींचने की बड़ी कोशिशें कीं लेकिन परिणाम अपेक्षित नहीं आए.

चौंकाने वाली घटनाएंहाल के सालों की जेल के भीतर हुई दोनों बड़ी घटनाओं में साम्य भी चौंकाने वाले हैं. गौर करने वाली बात यह है कि बागपत जेल में अपने खास मुन्ना बजरंगी की हत्या के बाद से ही मुख्तार अंसारी ने पंजाब में बंदी के दौरान यूपी भेजने पर जेल के भीतर अपनी हत्या होने की आशंका पर ज्यादा जोर देना शुरू किया था.
दरअसल, जेलों के खेलों को लेकर जो सवाल आज उठ रहे हैं वही साल 2018 के जुलाई महीने में भी उठे थे. सात लाख के इनामी माफिया मुन्ना बजरंगी को ठीक उसी अंदाज में 9 गोलियां मारी गयी जिसकी आशंका उसकी पत्नी सीमा ने कुछ ही दिनों पहले एक प्रेस कांफ्रेंस में जताई थी. बागपत जेल में ही बंद कुख्यात सुनील राठी ने आटोमैटिक पिस्तौल से अंधाधुंध फायरिंग की थी जिनमें से अधिकतर गोलियां सिर में लगीं और मुन्ना बजरंगी की मौके पर ही मौत हो गई. बागपत जेल में हुई इस सनसनीखेज वारदात के बाद भी सवाल यही उठे थे कि आख़िरकार तन्हाई बैरक में बंद सुनील राठी के पास से पिस्तौल कहां से आई. बजरंगी की हत्या के बाद पिस्तौल भी बरामद नहीं हुई है. आला अफसरों का कहना है कि राठी ने वारदात के बाद असलहे को गटर में फेंक दिया था.

..तो वारदात क्यों?
मगर सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि राठी और मुन्ना बजरंगी की दुश्मनी का कोई इतिहास भी नहीं था तो आखिर उसने जेल में इस खौफनाक हत्याकांड को अंजाम क्यों दिया? इस पूरे मामले में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई थी कि जेल में जिस जगह हत्या हुई, वहां सीसीटीवी कैमरे भी नहीं लगे थे. ये सभी पहलू इस हत्याकांड में बड़ी साजिश और बड़े स्तर पर जेल अधिकारियों और कर्मचारियों में व्याप्त भ्रष्टाचार की ओर इशारा थे .

पहले मुन्ना बजरंगी और अब मुकीम काला के साथ मेराजुद्दीन की हत्या के बाद एक बार फिर उत्तर प्रदेश की जेलों में फैले भ्रष्टाचार का मुद्दा गरमाया है. अब तो यह मान सा लिया गया है कि सूबे में किसी भी दल की सरकार रही हो, जेलों में भ्रष्टाचार के जरायम की दुनिया ही राज करती रही है. वास्तव में इन घटनाओं से यूपी की जेलों में तमाम तरह के घातक हथियार, नशे का सामान और ऐयाशी की अन्य चीजें पहुंचने की चर्चाओं की तस्दीक हो जाती है.

अपराधियों का दरबार
तीन साल पहले फ़ैजाबाद जेल में बंद बदमाश खान मुबारक ने एक वीडियो जारी करके आरोप लगाया था की जेल में हर सुविधा के लिए बाकायदा एक मेन्यु कार्ड है और रेट तय हैं. यूपी की जेलें इसका साक्षात् उदाहरण हैं जहां अक्सर गोलियों के धमाके सुनाई देते हैं या फिर घातक हथियारों से कैदी एक दूसरे की जान ले लेते हैं. अक्सर अस्पताल में जांच के बहाने बाहर निकलने और सैर-सपाटे का मौका भी कैदियों को मिल जाता है. इसका प्रत्यक्ष प्रमाण रहा है पूर्वांचल के बाहुबली नेता अमरमणि त्रिपाठी और उनकी पत्नी मधुमणि त्रिपाठी का कारागार बन्दी इतिहास. दोनों कवयित्री मधुमिता शुक्ला की हत्या में उम्रकैद की सजा पाने के बाद भी जेल में न रहकर सूबे के अलग-अलग अस्पतालों में लम्बे समय तक रहते रहे, बल्कि अस्पताल में रहकर भी इनका दरबार लगता रहा और कारोबार चलता रहा. शिकायतें भी हुईं, लेकिन सरकारों ने कोई कार्रवाई नहीं की. आखिरकार कोर्ट के आदेश के बाद दोनों पति-पत्नी को जेल वापस जाना पड़ा था.

सबका रेट तय
अखिलेश यादव की सरकार में जेल मंत्री रहे बलवंत सिंह रामूवालिया ने जेलों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर बयान देकर अपने ही विभाग के क्रियाकलापों पर सवाल खड़े किए थे. उन्होंने सार्वजनिक बयान में कहा था कि जेल से पैरोल मिलने का कागज जब कैदी के घर वालों तक पहुंचता है, तो पुलिस का सिपाही घर वालों से कहता है कि 50 हज़ार रुपये दे दो तो यह लिख दिया जाएगा कि 'पैरोल मिलने पर महात्मा गांधी जी की तरह माहौल शांत रहेगा और अगर पैसा नहीं दिया तो लिखा जाएगा कि पैरोल पर आने से इलाके में महाभारत हो जाएगी.' रामूवालिया का यह बयान सीधे-सीधे जेलों में खूंखार अपराधियों को मिलने वाली सहूलियतों की पोल खोलने वाला था. इसके बाद भी न तो सरकार और न ही जेल प्रशासन ने इसे गंभीरता से लिया. रामूवालिया ने यहां तक कह डाला था कि जम्मू-कश्मीर में शांति आ सकती है, लेकिन उत्तर प्रदेश की जेलों में नहीं. उनके मुताबिक यहां की जेलों जैसा भ्रष्टाचार कहीं भी नहीं है. यहां के जेलर आज भी अंग्रेजी हुकूमत वाली मानसिकता से बाहर नहीं आए हैं.

वर्तमान सरकार में जेल मंत्री स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं. उनके साथ तैनात राज्यमंत्री जयकुमार जैकी भी स्वीकार चुके हैं कि जेलों में भ्रष्टाचार व्याप्त है. शिकायतें आती रहती हैं, लेकिन अब इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. उन्होंने इस मामले में शिकायत मिलने पर कड़े कदम उठाने की भी बात की थी. लेकिन एक बार फिर नतीजा वही ढाक के तीन पात. जेलों में भ्रष्टाचार का आलम यह है कि कैदियों से अवैध वसूली के साथ-साथ उन्हें खाने-पीने का सामान पैसे लेकर मुहैया कराया जाता है, जो जेल मैनुअल के पूरी तरह से विपरीत है. इतना ही नहीं जिले के जिम्मेदार अफसरों से लेकर सरकार के तमाम नुमाइंदे समय-समय पर जेलों का निरीक्षण भी करते हैं, लेकिन जेल के अंदर चल रहे भ्रष्टाचार के खेल पर किसी की नजर नहीं पड़ती.

पर्देदारी बरती जाती है
ऐसा नहीं है कि जेलों में सब कुछ खुलेआम हो रहा हो, यहां भी पर्देदारी बरती जाती है. जब कभी भी जिला प्रशासन के छापेमारी की योजना बनती है तो वह अक्सर लीक हो जाती है और सारा सामान छुपा लिया जाता है. जब भी कोई छापा पड़ने वाला होता है, जेल के गोदामों में सारा सामान शिफ्ट कर दिया जाता. हरदोई के गोपामऊ से भाजपा विधायक श्याम प्रकाश ने दो साल पहले जिला जेल में भ्रष्टाचार के संबंध में एक पत्र मुख्यमंत्री और कारागार मंत्री को भेजा जिसमे आरोप था कि जिला जेल में मुलाकातियों से जेल के सामने चाय वालों और अन्य जेल कर्मियों द्वारा 100 से 500 रुपए की रिश्वत लेकर मुलाकात कराई जाती है.

दावों से उलट हकीकत
सरकार भले ही जेल में सुधार के तमाम दावे करती है, लेकिन सच्चाई है कि वहां भ्रष्टाचार थोड़ा कम भले ही हुआ हो, पर यह जारी है. मिलाई से लेकर बैरक के अंदर तक फिक्स रेट हैं. अफसर जानते हैं, लेकिन सब कुछ जानकर आंख मूंदे रहने की परंपरा जारी है. अभी कुछ समय पूर्व बिजनौर जिला कारागार से जमानत पर आए एक बंदी महबूब ने मानवाधिकार आयोग से शिकायत की है कि जेल में काम नहीं करने के लिए 3000 रुपये तक वसूले जाते हैं. नाश्ते के नाम पर दस ग्राम चना, थोड़ा गुड़, पतली चाय व दलिया दिया जाता है. कैंटीन से दस रुपये की चाय, 70 रुपये लीटर दूध और 80 रुपये किलो चीनी बेची जाती हैं. बिस्कुट व अन्य सभी सामान महंगा बेचा जाता हैं.

मुरादाबाद जिला कारागार में तैनात रहे जेलर रिबन सिंह का अप्रैल 2020 में कोरोना महामारी को लेकर लापरवाही बरतने में निलंबन कर दिया गया. निलंबन को जेलर ने गलत बताते हुए तत्कालीन वरिष्ठ जेल अधीक्षक पर बैरक आवंटन से लेकर मिलाई और कर्मचारियों की तैनाती में वसूली के आरोप लगाए. शिकायती पत्र पर जब शासन स्तर से कोई कार्रवाई नहीं हुई तो जेलर ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दी. तथ्यों और सुबूतों को देखने के बाद हाईकोर्ट ने सरकार से आठ मार्च 2021 तक जवाब मांगा था. हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद बीते 17 फरवरी को शासन ने वरिष्ठ जेल अधीक्षक का स्थानांतरण सुल्तानपुर जेल में कर दिया. कारागार के अंदर वसूली होने का यह नया मामला नहीं हैं, इससे पहले भी कई अफसरों और कर्मचारियों पर इस तरह के गंभीर आरोप लगे हैं.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के प्रिजन स्टैटिस्टिक्स इंडिया, 2015 रिपोर्ट के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश की जेलों में उनकी क्षमता से 68.8 प्रतिशत अधिक कैदी रहे रहे हैं. एकतरफ आम कैदियों को जेल में मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल पा रहीं तो वहीँ रसूखदार कैदियों और माफिया डॉन पैसे के बल पर जेल में ही वह सुविधाएं पा जाते हैं, जो उन्हें जेल के बाहर मिलती हैं.

यूपी की जेलों के खूनी खेल!
जेलों में आए दिन होने वाली मारपीट भी इसी भ्रष्टाचार का नतीजा है पिछले कुछ सालों में जेलों में जो घटनाएं हुई हैं वह न सिर्फ चौंकाने वाली हैं बल्कि बेहद चिंताजनक भी हैं.

-जून, 2018- इटावा जेल में जेलर से परेशान, दो कैदियों ने डाई पीकर किया जान देने का प्रयास किया.
- मार्च, 2017-फतेहगढ़ जेल में भी कैदियों ने जमकर आगजनी की. इसके साथ ही दो बंदीरक्षकों को बंधक बना कर रखा. हालात ऐसे थे कि दूसरे गेट से भी कोई अधिकारी अंदर नहीं जा रहा था.
-मार्च, 2017- मैनपुरी जेल से होली के दिन जेल से तीन कैदी फरार हो गए. त्योहार का फायदा उठाकर उन्होंने इस घटना को अंजाम दिया. पलायन को लेकर कोई इनपुट पुलिस के पास नहीं था.
-अप्रैल, 2016- वाराणसी जेल पर कब्ज़ा कर कैदी खुद ही जेलर बन गए थे. कैदियों ने पहले जमकर मारपीट की और फिर जेलर को अपने कब्जे में लेकर जेल के अंदर ही बंधक बना लिया.
-जून, 2016- मुजफ्फरनगर जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे चंद्रहास की उसके साथी कैदियों ने पीट पीटकर हत्या कर दी थी.
-अप्रैल, 2016- आजमगढ़ की अति सुरक्षित मानी जाने वाली जेल से तीन कैदी फरार हो गए. दो साल पहले हुई पुजारी की हत्या में तीनों यहां बंद थे.
-मई 2015- हाई सिक्योरिटी मानी जाने वाली आजमगढ़ जेल से 58 मोबाइल बरामद हुए थे.
-जनवरी, 2015- मथुरा की जेल में पहले गैंगवार हुआ, इसके बाद परिजन बनकर आए बदमाशों ने ताबड़तोड़ गोलियां बरसाकर जेल से अस्पताल ले जाए जा रहे राजेश टोंटा को भून दिया.
-मार्च, 2010- उरई जिला जेल में कैदियों के दो गुटों में संघर्ष, देशी बम फेंके जाने से दो कैदियों की मौत, डिप्टी जेलर सहित 16 लोग घायल हो गए.
-जुलाई, 2010- मेरठ के अब्दुल्लापुर जेल से मंगलवार को 9 कैदी फरार हो गए.
-जून, 2010- मथुरा जेल से 11 कैदी फरार हुए.

नंगी हो गयी जेल व्यवस्था!
उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह का मानना है कि यह एक आपराधिक षड्यंत्र है. उनका कहना है कि जेल में खूंखार अपराधियों को हाई सिक्योरिटी बैरक में रखा जाता है जहां सीसीटीवी, वायरलेस से लेकर निगरानी के तमाम उपाय होते हैं. बिना मिलीभगत के कोरोना काल में जेल में पिस्टल जाना संभव नहीं हैं. इससे पहले बागपत जेल में जुलाई 2018 में मुन्ना बजरंगी की पश्चिम के बदमाश सुनील राठी ने हत्या कर दी गई थी. प्रदेश की जेल में यह दूसरा ऐसा मामला है. जिसमें सियासत और अपराधियों से अपराधियों का खात्मा किया गया है.

रिटायर्ड पुलिस आईजी बद्री प्रसाद सिंह का मानना है कि इस तरह की घटनाएं सुनियोजित होती हैं जिसमें जेल विभाग की संलिप्तता, लापरवाही व प्रमाद अवश्य है. ऐसी घटनाओं ने जेल व्यवस्था को कठघरे में नंगा कर दिया है. जेल में हजारों मुलजिम व मुजरिम रखे जाते हैं. इसमें बड़े छोटे अपराधी, जनसेवक, देशद्रोही सभी है. कुछ आपसी प्रतिद्वँदिता में निर्दोष भी रहते हैं. इस घटना से सभी की आंखों की नींद गायब हो जाएगी, उन्हें प्रतिपल भय बना रहेगा कि 'ना जाने किस भेष में हत्यारा मिल जाये'. इस प्रकरण की गहराई से जांच कर जेल की कमियों को दूर किया जाये व जेल की काली भेड़ों को ढूढ़ कर उनका सफाया किया जाय, अन्यथा ऐसी घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि होगी और सरकार की साख भी खराब होगी. (ये लेखक के निजी विचार हैं)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
हेमंत तिवारी

हेमंत तिवारीपत्रकार

राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लंबा लेखन. कई पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं.

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First published: May 15, 2021, 10:12 AM IST
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