CBSE Board Exams: अनिश्चय से उबरीं 2021 की बोर्ड परीक्षाएं

CBSE 10th Board Exams 2021: यह निर्णय लिया गया है कि कक्षा दस की सीबीएसई की परीक्षा इस वर्ष नहीं होगी, इसमें 21,60,761 बच्चे बैठने वाले थे.

Source: News18Hindi Last updated on: April 15, 2021, 1:01 PM IST
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CBSE Board Exams: अनिश्चय से उबरीं 2021 की बोर्ड परीक्षाएं
(सांकेतिक तस्वीर)

कोरोना संक्रमण की अप्रत्याशित तेजी ने समाज के हर वर्ग को अपने जाल में लपेट लिया है और देश में तनाव, अनिश्चितता तथा आशंकाओं की चिंताजनक स्थिति उत्पन्न कर दी है. इस समय प्रत्येक परिवार की पहली प्राथमिकता कोरोना संक्रमण से अपने बच्चों की सुरक्षा करना है. शिक्षा और परीक्षा के अंक इस समय उनके मन-मस्तिष्क पर हावी नहीं हैं. ऐसे में स्कूल बोर्ड की परीक्षाओं की घोषित तिथियाँ पिछले कुछ सप्ताह से एक अनावश्यक तनाव बढ़ा रही थीं. पिछले साल भर से देश के बच्चों को जिस बंधन की स्थिति में रहना पड़ा और ऑनलाइन पढ़ाई जारी रखनी पड़ी, वह उनके लिए अत्यंत कष्टकर स्थिति रही. परीक्षा की तिथियाँ और उससे जुड़ी अनिश्चितता उन्हें और भी बेचैन कर रही थी. ऐसे में 14 अप्रैल 2021 को देश के प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में भारत सरकार ने स्थिति के सभी पक्षों का विवेचन कर सीबीएसई की बोर्ड परीक्षाओं को लेकर जो संवेदनशील निर्णय लिया है, वही वर्तमान परिस्थिति में एकमात्र व्यवहारिक विकल्प था.


यह निर्णय लिया गया है कि कक्षा दस की सीबीएसई की परीक्षा इस वर्ष नहीं होगी, इसमें 21,60,761 बच्चे बैठने वाले थे. सीबीएसई को कक्षा बारह में 14,30,243 बच्चों की परीक्षा लेनी थी, जिसे स्थगित कर दिया गया है. चूँकि कक्षा बारह की परीक्षा के बाद बच्चे अनेक व्यावसायिक प्रतियोगिता परीक्षाओं में भाग लेते हैं, अतः उस पर निर्णय पहली जून के बाद लिया जाएगा. सीबीएसई के सन्दर्भ में लिए गए इस निर्णय से सारे देश में सम्बंधित लोगों और बच्चों न राहत की सांस ली है. राष्ट्रीय स्तर पर लिए गए निर्णय से राज्यों के स्कूल बोर्ड भी आसानी से अपने फैसले आसानी से कर सकेंगें. कई ने तो सीबीएसई जैसे निर्णय लेना प्रारम्भ भी कर दिया है. कुल मिलकर देश में परीक्षा और पढ़ाई तथा बच्चों के भविष्य को लेकर लगातार बढ़ रहे तनाव को संभव सीमा तक कम कर दिया गया है. कोरोना संक्रमण की स्थिति भयावह होती जा रही है और इस समय देश की प्राथमिकता उससे हर बच्चे और नागरिक को बचाने की ही होनी चाहिए. अन्य समस्याओं का समाधान तो स्थिति सुधरने पर मिल-बैठकर निकाल ही लिया जाएगा.


7 अप्रैल 2021 को भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने देश के बच्चों से परीक्षा पर लम्बी चर्चा की थी. उन्होंने अपने वक्तव्य में अनेक संभावित प्रश्नों और समस्याओं का उत्तर देने का प्रयास किया और बाद में कुछ सीधे पूछे गए प्रश्नों के उत्तर भी दिए. स्कूल बोर्ड और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश की प्रतियोगिता परीक्षाओं का तनाव प्रतिवर्ष लगभग सभी का ध्यान आकर्षित करता है. इस वर्ष स्थिति अत्यंत जटिल और चिंताजनक हो गई है. प्रधानमंत्री ने भी इसे याद रखा और बच्चों का मनोबल बढ़ाने के लिए यह चर्चा आयोजित की गई. सामान्य रूप से यह भागीदारी बच्चों के लिए एक अद्भुत अवसर थी; देश के प्रधान मंत्री उनकी परीक्षा सम्बन्धी समस्याओं पर समय लगाते हैं, उनका तनाव कम करने का प्रयास करते हैं, प्रधानमंत्री जी अपने उद्देश्य में सफल रहे, मगर यह साल मानव इतिहास में अपना कोई सानी नहीं रखता है. लगभग पूरे वर्ष बच्चे स्कूल नहीं जा सके, सारी शिक्षा व्यवस्था ऑनलाइन-ऑफलाइन के बीच झुलती रही. सारे देश में बोर्ड परीक्षाओं के होने या न होने को लेकर चर्चा पिछले अनेक सप्ताह से चिंताजनक एवं मुखर स्वर में होने लगी थी. अधिकांश परिवार अपने बच्चों को परीक्षा देने के लिए स्कूल भेजने को तैयार नहीं थे. उनकी सुरक्षा का प्रश्न था, संक्रमितों को संख्या जिस तेजी से बढ़ी उसमें अधिकांश परिवारों ने बच्चे के एक साल पीछे रह जाने को स्वीकार करना निश्चित किया, मगर वे –अपवाद छोड़कर - उसे परीक्षा देने के लिए स्कूल भेजने को किसी प्रकार तैयार नहीं थे.


इस समय कुछ अन्य तथ्य भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. कक्षा दस की परीक्षा निरस्त की गई है, मगर सभी बच्चों को सीबीएसई द्वारा निर्धारित ‘ऑब्जेक्टिव क्रैटेरिया’ के आधार पर आतंरिक मूल्यांकन को सामने रखकर विषयवार अंक मिलेंगे और प्रमाण पत्र भी दिया जाएगा. यही नहीं, यदि कोई बच्चा बोर्ड परीक्षा देना ही चाहें, तो उचित समय और परिस्थितियों में उसका भी प्रावधान किया जाएगा. पिछले वर्ष सीबीएसई ने एक से पंद्रह जुलाई के बीच होनेवाली परीक्षाएं रद्द कर दीं थीं तथा अनेक प्रकार के व्यवधानों का संज्ञान लेते हुए पाठ्यक्रम भी 30 प्रतिशत घटा दिया गया था. उस समय भी परीक्षा पद्धति को लेकर कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण चर्चाएं देश में हुई थीं. सबसे महत्वपूर्ण तो यही था कि परीक्षा प्रणाली में सुधार किये जाने की अनुशंसाएं तो 1968 की शिक्षा नीति के समय से ही देश के समक्ष आती रही हैं, लेकिन कोई प्रभावशाली परिवर्तन आज तक क्यों नहीं हो पाया?

शिक्षाविद और बच्चों के मनोविज्ञान और सीखने की क्षमताओं के अध्येता और शोधकर्मी यह स्वीकार करते हैं कि किसी भी बच्चे का सबसे अधिक सटीक मूल्यांकन उसका अध्यापक ही कर सकता है. वही लगातार उसके संपर्क में रहता है, बच्चे को और उसकी रुचियों तथा प्रतिभा विकास की संभावनाओं को समझता है. एक ऐसे स्कूल की कल्पना कीजिये जहां सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध हों, अध्यापक- छात्र अनुपात सही हो, सभी अध्यापक उचित प्रशिक्षण-प्राप्त तथा नियमित हों और वे लागातार बच्चे का मुल्यांकन करते रहे हों! ऐसी स्थिति में वार्षिक बोर्ड परीक्षा तो एक औपचारिकता मात्र ही रह जायेगी, वह यह भी स्थापित कर देगी कि अध्यापक द्वारा किया गया सतत मूल्यांकन कितना वस्तुनिष्ठ और सही था. इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण – लेकिन अदृश्य – तत्व है पारस्परिक विश्वास! स्कूलों की साख, अध्यापकों पर विश्वास, और स्कूल तथा व्यवस्था की सजग पारस्परिकता सतत आतंरिक मूल्यांकन को विश्वसनीय बना सकते हैं. यदि ऐसा संभव हो सके तो बड़े स्तर पर परीक्षा प्रणाली में सुधार किये जा सकते हैं और धीरे-धीरे बोर्ड परीक्षाओं पर निर्भरता को नगण्य बनाया जा सकता है. मेरे विचार से सबसे बड़ी उपलब्धि तो अनावश्यक तनाव को कम करने की होगी.


2002-03 में देश में एक बड़ा प्रयोग ‘नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ ओपन स्कूलिंग’ – एनआईओएस – के तत्कालीन अध्यक्ष प्रोफेसर नवल किशोर अम्बष्ट ने सफलतापूर्वक किया था. ऑन डिमांड एग्जामिनेशन - जब चाहे तब परीक्षा – की संरचना जो कि अब तकनीकी सहायता से संभव है. इस पर गहराई से चर्चा पुनः प्रारम्भ होनी चाहिए. यदि इसे आगे बढ़ाया गया होता, तो आज एक सशक्त विकल्प हमारे समक्ष उपस्थित होता. अभी त्वरित समाधान मिला है, मगर दीर्घ कालीन समाधान तो ढूंढने ही होंगे.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)

ब्लॉगर के बारे में
जे एस राजपूत

जे एस राजपूत

जगमोहन सिंह राजपूत देश के जाने माने शिक्षाविद और लेखक हैं. श्री राजपूत एनसीइआरटी के निदेशक भी रहे हैं.

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First published: April 15, 2021, 1:01 PM IST
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