डिजिटल क्लास: 2020 ने बढ़ाई ऑनलाइन शिक्षा में संभावनाएं

कोरोना के पहले भी भारत की शिक्षा व्यवस्था संचार तकनीकी और दूरस्थ शिक्षा में अपनी पकड़ बना चुकी थी. कोरोना नें उसे गति प्रदान कर दी है और इस समय यह एक संतोषप्रद स्थिति मानी चाहिए कि हर तरफ और हर स्तर पर अध्यापक वर्ग ने तेजी से इस नई विधा को सीखा है. इसका उपयोग प्रारम्भ कर दिया है, अनेक संभावनाएं उभरी हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: September 5, 2020, 5:48 AM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
डिजिटल क्लास: 2020 ने बढ़ाई ऑनलाइन शिक्षा में संभावनाएं
इस महामारी के दौर में शिक्षकों को भी ‘कोरोना योद्धा’ माना जा रहा है.
कोरोना नें सारे विश्व को अपने बरक्स एक तरफ खड़ा कर दिया है, जीवन के हर पक्ष को प्रभावित किया है, शिथिल कर दिया है. बच्चे मार्च 2020 से स्कूलों से बाहर है, उनकी शिक्षा रुकी है, वे घर पर नहीं रहना चाहते हैं, मगर मां-बाप उन्हें स्कूल भेजने को तैयार नहीं हैं. उच्च शिक्षा संस्थान भी असमंजस में ही हैं. संख्या का अनुमान अलग हो सकता है मगर स्कूलों कुल नामांकित बच्चों में से 15% स्कूल नहीं जा पा रहें हैं. यूनेस्को के एक अनुमान के अनुसार 186 देशों में 1.3 बिलियन यानि भारत की जनसंख्या के आसपास बच्चे मार्च 2020 के बाद स्कूल नहीं गए हैं. उनकी मानसिक, मनोवैज्ञानिक और संवेदनात्मक स्थिति तथा इस स्थिति से उपजे भौतिक और मानसिक तनाव का आकलन हर तरफ हो रहा है. बच्चों को शिक्षा और सीखने से दूर न रखने के वैश्विक प्रयासों में सबसे अधिक कारगर और व्यवहारिक विधा ऑनलाइन शिक्षा के स्वरुप में उभरी है. भारत में भी प्रारम्भिक स्कूलों से लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों तक ऑनलाइन व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त कर यथासंभव उपयोग में लाने का प्रयास किया जा रहा है.

कोरोना के पहले भी भारत की शिक्षा व्यवस्था संचार तकनीकी और दूरस्थ शिक्षा में अपनी पकड़ बना चुकी थी, कोरोना नें उसे गति प्रदान कर दी है और इस समय यह एक संतोषप्रद स्थिति मानी चाहिए कि हर तरफ और हर स्तर पर अध्यापक वर्ग ने तेजी से इस नई विधा को सीखा है, इसका उपयोग प्रारम्भ कर दिया है, अनेक संभावनाएं उभरी हैं,  और अनेक कठिनाइयां तथा कमियां भी सामने आ रही हैं, उनके समाधान निकलना भी प्रारम्भ कर दिया गया है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 स्थिति का आकलन यों करती है: “संक्रामक रोगों और वैश्विक महामारियों में हाल ही में हुई को देखते हुए यह जरूरी हो गया है कि जब भी और जहां भी  पारंपरिक और विशेष साधन संभव न हों वहां हम गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के वैकल्पिक साधनों के साथ तैयार हों.” नीति में यह भी स्पष्ट किया गया है कि “ऑनलाइन/डिजिटल शिक्षा की हानियों को कम करते हुए हम कैसे इस से लाभ उठा सकते हैं, सावधानीपूर्वक और उपयुक्त रूप से तैयार किया गया अध्ययन करना होगा. साथ ही, सभी को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा प्रदान करने से सम्बंधित  वर्तमान और भावी चुनौतियों का सामना करनें के लिए मौजूदा डिजिटल प्लेटफार्म और क्रियान्वित आईसीटी-आधारित पहलों को अनुकूल और विस्तृत करना होगा.” नीति के दस्तावेज में डिजिटल अभियान की सफलता के परिपेक्ष्य में किफायती कम्पुटिंग के उपकरणों की उपलब्धता की आवश्यकता को डिजिटल अंतर समाप्त करने के लिए आवश्यक माना गया है. ‘यह जरुरी है कि ऑलाइन और डिजिटल शिक्षा के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग समानता के सरोकारों को पर्याप्त रूप से संबोधित करे.’ सबसे बड़ी आशंकाए इसी के चौगिर्द घूमती हैं. ई-कंटेंट तैयार किया जा रहा है मगर इसके लिए आवश्यक प्रशिक्षण की व्यवस्था बड़े स्तर पर करनी होगी. यह मान लेना सही नहीं होगा कि एक सफल पाठ्यपुस्तक का लेखक या कक्षा में सफल अध्यापक नई विधा में भी सफल हो जायेंगे. उन्हें भी तैयार करना होगा, और यह बड़ा उत्तरदायित्व होगा. अकादमिक स्तर यह  ऑनलाइन की सीमाएं ज्ञात हैं; अनुभव और गतिविधि आधारित क्रिया-कलापों में सीखने को आमने-सामने  की प्रचलित पद्धति के समकक्ष लाने का प्रयास नए दृष्टि कोण के आधार पर ही सफल हो सकेगा, शायद पूरी तरह समकक्ष न ही बन पाए. आगे की चिंता और चुनौती यह भी है कि गतिविधिओं और अनुभवात्मक संपर्क की अनुपस्थिति में ऑनलाइन शिक्षा का सामाजिक, भावनात्मक और मनो-प्रेरणा पक्ष कमजोर न रह जाएं.

कोरोना के पहले यह माना जाता था कि ऑनलाइन शिक्षा विधा का हर स्तर पर सीमित तथा सहयोगात्मक उपयोग ही होगा, क्योंकि डिजिटल कक्ष और भौतिक कक्षा कभी भी समकक्ष नहीं हो सकते हैं. खेल कंप्यूटर पर भी खेले जाते हैं मगर  स्क्रीन कभी भी खेल के मैदान का विकल्प नहीं बन सकती है. खेल के मैदान पर जो सम्बन्ध बनते हैं और जो मानवीय मूल्य सीखे और अन्तर्निहित किये जाते हैं, वह मैदान की विशिष्ठता है, उसका विकल्प अन्यत्र नहीं है. अध्यापकक और विद्यार्थी का आमने-सामने का संपर्क जिस मानवीय सम्बन्ध को निर्मित करता है वह आभाषी व्यवस्था में संभव नहीं होगा. समस्याएं तो अनगिनत हैं. ऑनलाइन पढ़ाई-सिखाई की मूलभूत आवश्यकताएं हैं: 24X7 बिजली, इन्टरनेट, स्मार्ट फोन, टेबलेट या कंप्यूटर की विद्यार्थी को व्यक्तिगत स्तर उपलब्धता! भारत के अधिकांश घरों में साधारण टीवी सेट ही उपलब्ध होता है जिस पर केबल टीवी चैनल देखे जा सकें और सस्ता सेल फोन होता है जिस से सिर्फ बातचीत ही हो सकती है.

यह भी पढ़ें: Teachers Day: डिजिटल क्लास ने खत्म की ‘गुरु और गोविंंद वाली दुविधा
एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 22% लोगों के पास स्मार्ट फोन हैं. यह दर्शाता है कि स्थिति कितनी विकट है. अनेक स्थानों पर अध्यापकों नें  बच्चों को ऐसे स्थानों पर इकठ्ठा करना प्रारम्भ किया जहां सिग्नल मिल सके, वे टीवी या स्मार्ट फोन का प्रबंध कर सकें. मगर यह बृहद स्तर पर समस्या का समाधान नहीं है. भारत में इंटरनेट उपयोग करनेवालों की अनुमानित संख्या लगभग 640 मिलियन मानी जा सकती है. इनमें मोटे तौर पर 40% शहरों में तथा 14% गाँव में हैं. महाराष्ट्र की शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् के एक सर्वेक्षण के अनुसार महाराष्ट्र में दो-तिहाई परिवारों के पास स्मार्ट फोन नहीं हैं, केवल एक प्रतिशत के पास लैपटॉप या डेस्कटॉप कंप्यूटर है. जब महाराष्ट्र की यह स्थिति है तो बिहार, ओडिशा, झारखंड या उत्तर प्रदेश में स्थिति इसे तो बदतर ही होगी.

teachers day 2020, Teachers Day, टीचर्स डे, शिक्षक दिवस
शिक्षक दिवस पर सभी शिक्षकों को ढेर सारी शुभकामनाएं...


शिक्षा में हर पक्ष में बहुत कुछ बदल रहा है. शैक्षिक मूल्यांकन को लेकर नई सोच स्वीकार हो रही है जिसमें विद्यार्थी नें जो सीखा है उसका उपयोग वह विभिन्न स्थितियों और समस्याओं के समाधान में कैसे करेगा इस पर बल दिया जाएगा, विद्यार्थियों की विश्लेष्णात्मक क्षमताओं को बढ़ाया जाना है. ऑनलाइन और आमने-सामने की पद्धतियों में इसके ढंग अलग होंगे और तदनुसार अध्यापकों को तैयार करना होगा. आशा की किरण यही है कि नई शिक्षा नीति डिजिटल  इन्फ्रास्ट्रकचर, सामग्री निर्माण, डिजिटल रिपोजिटरी और प्रसार,  तथा डिजिटल अंतर कम करने के लिए कटिबद्धता से परिपूर्ण है. “इस तथ्य को देखते हुए कि अभी भी जनसंख्या का एक बड़ा भाग ऐसा है जिसकी डिजिटल पहुंच अत्यधिक सीमित है, मौजूदा संचार माध्यम जैसे टेलीविजन, रेडियो और सामुदायिक रेडियो का उपयोग टेलीकास्ट और प्रसारण के लिए बड़े पैमाने पर किया जाएगा. इस तरह के शैक्षिक कार्यक्रमों को छात्रों की बदलती आवश्यकतायों को पूरा करने के लिए विभिन्न भाषाओं में 24X7 उपलब्ध कराया जाएगा. सभी भारतीय भाषाओं में सामग्री पर विशेष ध्यान दिया जाएगा और इस पर विशेष बल दिया जाएगा कि जहां तक संभव हो, शिक्षकों और छात्रों तक डिजिटल सामग्री उनकी सीखने की भाषा में पहुंचे.” नीतिगत स्तरपर इसमें वह सभी कुछ आ जाता है जो ऑनलाइन शिक्षा के प्रति आशंकाओं का निवारण करता है. यह भी सही है कि ऑनलाइन व्यवस्था कक्षा और स्कूल तथा वहां के जीवंत संपर्क का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकते हैं. बनने भी नहीं चाहिए, मनुष्य को सामाजिकता पूर्ण-रूपेण वापस चाहिए. यह भी सुनिश्चित है कि मानव कोरोना पर विजय शीघ्र ही प्राप्त कर लेगा, स्कूल बच्चों की खिलखिलाहट से भर जायेंगे और उच्य शिक्षा संस्थान उत्सापूर्ण गतिविधियों में संलग्न होकर  ऑनलाइन विधा का स्वीकार्य उपयोग  करनें के नए तरीके निर्मित कर रहे होंगे. आन लाइन शिक्षा आवश्यक है लेकिन केवल वही पर्याप्त नहीं है. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
जे एस राजपूत

जे एस राजपूत

जगमोहन सिंह राजपूत देश के जाने माने शिक्षाविद और लेखक हैं. श्री राजपूत एनसीइआरटी के निदेशक भी रहे हैं.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: September 4, 2020, 11:24 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर