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सुभाष चंद्र बोस जयंती विशेष: 2021 सहयोग की सफलता और असहयोग के संशय

क्या यह दुर्भाग्य नहीं है कि केंद्र और पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार अलग अलग कार्यक्रम कर रही हैं? क्या देश प्रेम दिवस और पराक्रम दिवस अलग अलग मानकर भारत की युवा पीढ़ी को उचित पाठ पढ़ाया जा रहा है?

Source: News18Hindi Last updated on: January 23, 2021, 6:33 PM IST
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सुभाष चंद्र बोस जयंती विशेष: 2021 सहयोग की सफलता और असहयोग के संशय
सुभाष चंद्र बोस (फ़ाइल फोटो)
नई दिल्ली. 19 जनवरी 2021 को भारतीय क्रिकेट टीम की ऑस्ट्रेलिया पर अद्भुत विजय से सारे देश में उत्साह का वातावरण बना. इस मैच के प्रारम्भ में भारत के जिन गेंदबाजों को टीम में शामिल किया गया था उनके पास में कुल मिलकर केवल 13 टेस्ट विकेट लेने का अनुभव था. भारत के सभी अनुभवी गेंदबाज चोटिल हो चुके थे; और नए खिलाडियों को केवल इसी कारण अंतिम एकादश में स्थान मिला था. जो गेंदबाज ऑस्ट्रेलिया की टीम में शामिल थे उनमें से लगभग सभी अनुभवी तथा विश्व-प्रसिद्द थे. वे आपस में कुल मिलकर 1013 टेस्ट विकेट ले चुके थे. यह अंतर किसी को भी चौंका सकता था. अगले दिन जब मैं समाचार पत्रों में क्रिकेट के इस टेस्ट मैच को लेकर समाचार, लेख, और बधाइयां पढता हूं, तो मेरे मन-मष्तिष्क में देश की नई पीढ़ी को इस विजय से मिला उत्साह स्कूलों, महाविद्यालयों और विश्व्वद्यालयों के प्रांगण में स्पष्ट दिखाई देता है.

निश्चित मानिये अगले दस वर्षों में जो युवा भारत का प्रतिनिधित्व खेलों में अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर करने आगे आयेंगे, उनमें से अधिकांश के प्रेरणा स्रोत शुभमन गिल, ऋषभ पन्त, वाशिंगटन सुन्दर, शार्दुल ठाकुर अवश्य होंगें. यह भी सही है कि वे आश्विन, पुजारा, राहाणे से भी बहुत कुछ सीखेंगे. मुझे स्वयं अपने अन्दर नई उर्जा का अनुभव हो रहा है, मेरा विश्वास बढ़ रह है, और मैं अनुभव कर रहा हूँ कि हर आयु के हर भारतवासी को यह युवा नया आत्मविश्वास देनें में कितने सफल रहे हैं. मैं बार बार देश के नेताओं द्वारा दी गई बधाइयों को पढता हूँ, और पाता हूँ कि वे भी जो एक दूसरे के विरुद्ध विष-वमन करने को ही राजनीति मान लेते हैं, देश के हित के लिए भी साथ-साथ आने में हिचकते हैं, इस समय - संभवतः बिना जाने-समझे – एकसाथ एक मंच पर, एक अवसर पर , एक दुसरे का साथ दे रहे हैं.
मैं इसको अजिंक्य राहाणे की युवा टीम की ऑस्ट्रेलिया विजय की देन क्यों न मानू? जिस आपसी सहयोग, टीम भावना, राष्ट्र के लिए समर्पण तथा लक्ष्य प्राप्ति के लिए सब कुछ सहने की भावना का प्रदर्शन भारत के युवाओं नें ऑस्ट्रेलिया में किया, वह भारत के वर्तमान पीढ़ी के राष्ट्रनिर्माताओं और नीति निर्धारकों को एकसाथ एक भावना में बाँध कर उन्हें नई राह भी दिखा गया है, वे इसे माने या न माने, एक साथ एक मंच पर तो उन्हें बैठा ही गए यह रन बाँकुरे! भारत की इस युवा क्रिकेट टीम को इस उपलब्धि के लिए भी बधाई मिलनी चाहिए.




मेरा यह उर्जादायक सोच मुझे थोड़ी दुविधा में भी डाल देता है. क्या वास्तव में भारत के राजनेता और उनके दल सहयोग के इस अवसर के महत्व को समझ पायेंगे? मेरी चिंता का कारण वही है जो इस समय हर उस व्यक्ति का है जो किसी राजनीतिक विचारधारा से बंधा नहीं है, और देश हित में स्थितिओं और घटनाओं का विवेचन और विश्लेषण कर सकता है, जो गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन और सविनय-अवज्ञा आन्दोलनों के सार तत्व को समझाने का प्रयास कर सकता है. सत्याग्रह और आन्दोलन का मार्ग तो भारत को गाँधी नें सिखाया था, उनके उत्तराधिकारियों का कर्तव्य है कि वे गाँधी द्वारा सिखाये गए रास्ते पर ही चलें. लेकिन शाहीन बाग़ के धरनें और किसान आन्दोलन के कारण सड़कें बंद हुईं, अनेक लोगों की आजीविका प्रभावित हुई, शाहीन बाग़ के बाद हिंसा हुई, 50 से अधिक लोगों की जाने गईं.
देश के किसान 50 से अधिक दिनों तक हर प्रकार का कष्ट सहते हुए धरना दें, यह उस समाज की उपज कैसे हो सकती है जो सदा ही संवाद को महत्व देता रहा है. समाज के सजग और सतर्क बौद्धिक वर्ग को अपना उत्तरदायित्व निभाने के लिए आगे आना चाहिए.
प्रश्न यह नहीं है कि कौन सही है और कौन गलत, मगर हर उस समस्य का समाधान तो त्वरित गति से निकला जाना ही चाहिए जिस से देशवासियों को नहीं, सारे देश को हानि हो रही हो, अविश्वास बढ़ रहा हो, और असामाजिक तत्व अपने उद्देश्य में सफल हो रहे हों! यह दुर्भाग्य है कि देश का गैर-राजनीतिक प्रबुद्ध वर्ग इसे चुपचाप देख रहा है.
यह भी स्पष्ट किया जान चाहिए कि राजनीतिक दलों को भी आपसी संवाद को पुनर्जीवित कर, पक्ष-विपक्ष को भुलाकर, देश हित के मुद्दों पर एक राय बनानी चाहिए. क्या वे ऐसा कोई प्रयास कर रहे हैं?


उत्तर तो है: नहीं! नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की125 वीं जन्म-जयन्ती के समारोह 23 जनवरी 2021 से प्रारम्भ हो रहे हैं. यह ऐसा नाम है जिसका जिक्र आने पर हर व्यक्ति –विशेषकर हर युवा – के चहरे पर चमक आ जाती है, और वह और अधिक जानने के लिए इच्छा व्यक्त करता है. आज जब भारत की क्रिकेट टीम नें सारे देश को ‘फील गुड’ के आनद में सराबोर कर दिया है, उस समय की और उस नायक की याद आना वैसे भी स्वाभाविक है जिसनें अपने साहस, देशप्रेम और संगठन क्षमता से सारे देश को आंदोलित कर दिया था, देश के स्वाभिमान और आत्मविश्वास को जागृत कर दिया था. वे नेता जी ही थे जिन्होंने दक्षिण एशिया के सारे भारत वंशियों के राष्ट्र प्रेम को जागृत कर न केवल संसाधन जुटाए, उनसे इंडियन नेशनल आर्मी – आई एन ए – का गठन कर एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया.
आई एन ए के 26000 सैनिको नें अपने जीवन का बलिदान युद्धभूमि में दिया. यह बलिदान इतना प्रभावशाली था कि अंग्रेजों को नौ सेना विद्रोह के बाद यह दिखाई देने लगा था कि भारत के सशत्र बल कभी भी विदेशी शासकों के विरुद्ध हथियार उठा सकते हैं. अब अनेक दस्तावेजों के आधार पर यह खुल कर सामने आने लगा है कि अंग्रेजों के भारत छोडनें के निर्णय के पीछे मुख्य कारण आई एन ए का गठन, प्रदर्शन और बलिदान तथा उसका देश के हर वर्ग पर पड़ा प्रभाव ही मुख्य कारण था.


अपेक्षा तो यही थी कि नेताजी की जन्म-जयंती से सम्बन्धी कार्यक्रमोंमें इस विषय पर शोध तथा अध्ययन किये जायेंगे, और देश के सामने स्वतंत्रता इतिहास का तथ्य-परक और वास्तविक वर्णन देश के समक्ष प्रस्तुत हो सकेगा. क्या यह दुर्भाग्य नहीं है कि केंद्र और पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार अलग अलग कार्यक्रम कर रही हैं? क्या देश प्रेम दिवस और पराक्रम दिवस अलग अलग मानकर भारत की युवा पीढ़ी को उचित पाठ पढ़ाया जा रहा है? भारत के क्रिकेट खिलाडी जहां सहयोग का पाठ पढ़ा रहे हैं, राजनीति असहयोग के दल दलसे निकल नहीं पा रही है. लगता है भारत के युवायों को ही देश हित में यह जिम्मेवारी भी निभानी पड़ेगी.लेख के व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.
ब्लॉगर के बारे में
जे एस राजपूत

जे एस राजपूत

जगमोहन सिंह राजपूत देश के जाने माने शिक्षाविद और लेखक हैं. श्री राजपूत एनसीइआरटी के निदेशक भी रहे हैं.

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First published: January 23, 2021, 10:15 AM IST
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