बावरा मन: नीड़ का निर्माण फिर

क्राइम एंड पनिशमेंट की इस बेचैनी और गलती के अहसास के दोहरे छुपे मनोविज्ञान को डायरेक्टर ने परदे पर कुछ इस तरह से उकेरा कि एक क्लासिक नोवेल को एक क्लासिक हिंदी रूपांतरण मिल गया.

Source: News18Hindi Last updated on: May 1, 2021, 1:03 PM IST
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बावरा मन: नीड़ का निर्माण फिर
आज के इस अंधकारमय दौर में जहां धैर्य और सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखने की जरूरत है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Shutterstock)
हवा में अकेला वायरस ही नहीं, आजकल सकारात्मकता के सुर/स्वर/गीत भी खूब हवा में तैर रहे हैं. रूसी साहित्यकार दोस्तोस्की के नोवेल 'क्राइम एंड पनिशमेंट' पर आधारित फिल्म 'फिर सुबह होगी' का गीत, जिसके रचनाकार साहिर थे, आजकल फिर सोशल मीडिया पर हौसला देने के लिए घूम रहा है. शिलोंग चैंबर क्वायर द्वारा गाए इस गीत का वर्ज़न सबको बहुत अच्छा लग रहा है. सब इसे खूब शेयर कर रहे हैं, वायरल कर रहे हैं. इस क्वायर ग्रुप की मैं भी बहुत बड़ी फैन हूं. पर ये लेख शिलोंग चैंबर क्वायर पर नहीं है. ये लेख तो बस इस गीत को, उसकी आत्मा को समर्पित है.

फिर सुबह होगी
अच्छा संगीत और अच्छे बोल, इंसान को बहुत कुछ कर जाने की ताक़त देते हैं. और ये सही बात है. आज के समय की यही ज़रूरत भी है. लेकिन कभी कभी हम गाने को सुनते तो हैं, पर उसकी भावना की पृष्ठभूमि पर उतना ध्यान नहीं देते, जितना देना चाहिए. हम ऑप्टिक्स, पिक्चराइजेशन, पैकेजिंग में ही खो जाते हैं. जैसा इस गीत को सुन के, आजकल हम कर रहे हैं. इस गीत की आत्मा, दरअसल इसकी फिल्म की कहानी में बसती है. जिस आत्मा से, रू ब रू होना, आज इस दौर में बहुत जरूरी है. और आज के इसी दौर में जरूरी है क्योंकि तभी तो हम सब मिलकर फिर से एक अच्छी, प्यारी, शालीन, सच्ची सुबह का आगाज़ कर पाएंगे.

इसलिए…
बहुत ज़रूरी है, इस गीत को अपनाने से पहले हम इस फिल्म की आत्मा को अपनाएं. इस फिल्म/ इस कहानी की आत्मा, उसके सार को समझा जाए. पर उसके लिए इस फिल्म के नायक 'राम' द्वारा किए हुए गुनाह के बाद वाली छटपटाहट महसूस करनी पड़ेगी. उसके अन्तरद्वंद को जीना होगा. उसकी गलती के अहसास को भोगना होगा. तब कहीं जा कर, इस साहिराना गीत का सार हमारी समझ में आएगा. और जब ये सार समझ में आ जाएगा तब इसे आत्मसात करना होगा. वरना ये सुबह, जिसका हम ज़िक्र कर रहे हैं, फिर हाथ नहीं आएगी. चाहे हम कितना भी इस गीत को शेयर कर लें, गा लें, सुन लें.

फिल्म की कहानी / राम के रूप में राजकपूर
नायक 'राम' अपनी आंखों के सामने तमाम दुखों से गुजरता हुआ अंजाने में एक दिन एक गुनाह कर बैठता है. उसके हाथों कत्ल हो जाता है. अंजाने में हुए इस गुनाह से वो बच भी जाता है. पर अपनी अंतरात्मा से नहीं बच पाता. जब पुलिस उसकी जगह किसी और को दोषी समझ पकड़ लेती है, राम के पास ये ऑप्शन होता है कि वो चुपचाप इसे होने दे. राम के खिलाफ़ कत्ल का वैसे भी कोई सबूत पुलिस के हाथ नहीं है. पर राम, वो खुद तो अपना सच जानता है ना. उसका अपराधबोध उसे परेशान करने लगता है. राम को गलती का अहसास भी है, बेचैनी भी है. इसी कशमकश में वो आत्मसमर्पण कर देता है.क्राइम एंड पनिशमेंट की इस बेचैनी और गलती के अहसास के दोहरे छुपे मनोविज्ञान को डायरेक्टर ने परदे पर कुछ इस तरह से उकेरा कि एक क्लासिक नोवेल को एक क्लासिक हिंदी रूपांतरण मिल गया. राम के रूप में राजकपूर, उस व्यथा, उस पीड़ा को परदे पर यूं उतारते हैं जैसे उसे जी रहे हों. ये फिल्म, कोई आम क्राइम थ्रिलर/मर्डर मिस्ट्री नहीं है. ये फिल्म एक क्लासिक है. ऐसी फिल्में, जो दशकों में विरली ही बनती हैं. राजकपूर की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक.

साहिर और खय्याम
फिल्म के प्रोड्यूसर डायरेक्टर रमेश सहगल ने जब साहिर को इस फिल्म के गीत लिखने को मनाया तो साहिर ने उन से छूटते ही पूछा कि फिल्म के म्यूजिक डायरेक्टर कौन होंगे? रमेश सहगल ने जवाब दिया कि चूंकि राज कपूर फिल्म के हीरो हैं, तो शंकर जयकिशन ही फिल्म का म्यूजिक देंगे. साहिर ने रमेश सहगल से कहा कि ये कहानी कोई आम कहानी नहीं, बल्कि ये एक क्लासिक है. इस फिल्म का संगीत उसे ही कंपोज करना चाहिए जिस ने डोस्तोस्की की क्राइम एंड पनिशमेंट खुद पढ़ी हो और जो उसकी रूह से भली भांति परिचित हो.

साहिर ने कहा कि इस फिल्म का संगीत सिर्फ़ खय्याम ही दे सकते हैं क्योंकि खय्याम ही वो म्यूजिक डायरेक्टर थे जिन्होंने इस क्लासिक को पढ़ रखा था. रमेश सहगल पशोपेश में पड़ गए. फिर राज कपूर को मनाने की बारी आई. तय हुआ कि खय्याम जो भी धुन बनाएंगे, उसे राजकपूर पास करेंगे. राज कपूर अपनी फिल्मों के संगीत को लेकर बहुत संजीदा रहते थे. लेकिन खय्याम की बनाई एक गाने की पांच धुने उन्हें इतनी पसंद आईं कि उन्होंने बाकी गानों की धुनें, बिना सुने ही पास कर दीं.

सार और सीख
दरअसल इस कहानी का सार है:
पहला, सत्य की राह पर चलना और दूसरा, अपने गुनाह को क़ुबूल करना. दोनों ही काम आसान नहीं हैं. ये काम विशाल व्यक्तित्व वाले इंसान ही करते हैं. या फिर ऐसा करने वाले, खुद विशाल हो जाते हैं, जैसे महात्मा गांधी का व्यक्तित्व. ये नैतिकता एक सुसंस्कृत समाज की निशानी है.

आज के इस अंधकारमय दौर में जहां धैर्य और सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखने की जरूरत है, वहीं गलतियों से सीख लें, हमारे पास एक नई शुरुआत करने का, ऑप्शन भी है. हम भी एक नए सुसंस्कृत समाज बनाने की नींव अपनी गलतियों को सुधार कर और हर हालत में 'सत्य' का साथ दे के कर सकते हैं. इस गीत की गहराई शिलांग चेंबर क्वायर के गीत को शेयर कर के नहीं, ओरिजिनल फिल्म को देख कर, साहिर को समझ कर और दोस्तोसकी की क्राइम और पनिशमेंट को पढ़ कर, कर सकते हैं.

चलिए मिल के झूठ, पैकेजिंग, ऑप्टिक्स को त्यागने की हिम्मत रखें, सत्य को अपनाएं. सत्य में बड़ा बल होता है. सच्चाई से, गलतियों का आंकलन करने से, समस्याओं के निवारण के रास्ते भी दिखाई देते हैं. …और सच पर पर्दा डालने से, झूठ दर झूठ बोलने की मजबूरी हो जाती है.

तो आज नीड़ का निर्माण फिर एक नए तरीके से करने का वक्त आ गया है. इस नीड़ को बनाने की, फिर एक और सच्ची ईमानदार कोशिश करते हैं. वो ईमानदार कोशिश जो कभी हमारे बुजुर्गों ने की थी. मुझे विश्वास है अगर हम साहिर से, दोस्तोस्की से, क्राइम एंड पनिशमेंट से, अपने देश के संस्थापक विचारकों से और सबसे ऊपर गांधी से सबक लेंगे, तो 'वो सुबह ज़रूर आएगी'.

पूरा गीत, साहिर की कलम से
वो सुबह कभी तो आएगी

इन काली सदियों के सर से जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर झलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा जब धरती नगमे गाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

जिस सुबह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर मर के जीते हैं
जिस सुबह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं
इन भूखी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फ़रमाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इन्सानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब झूठे सिक्कों में न तोली जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को ना बेचा जाएगा
चाहत को ना कुचला जाएगा, इज्जत को न बेचा जाएगा
अपनी काली करतूतों पर जब ये दुनिया शर्माएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूख के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारादारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

मजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल न फांकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीख न मांगेगा
हक़ मांगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

फ़आक़ों की चिताओ पर जिस दिन इन्सां न जलाए जाएंगे
सीने के दहकते दोज़ख में अरमां न जलाए जाएंगे
ये नरक से भी गंदी दुनिया, जब स्वर्ग बनाई जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

जिस सुबह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर मर के जीते हैं
जिस सुबह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं
वो सुबह न आए आज मगर, वो सुबह कभी तो आएगी

वो सुबह कभी तो आएगी

(ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: May 1, 2021, 1:03 PM IST
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