बावरा मन : हंगर से लंगर तक

मन तो करता है पूछूं, कि भाई, आप कौन सी चक्की का आटा खाते हो? कहां से लाते हो इतनी दिलेरी? बाढ़ हो, साइक्लोन हो, जंगल की आग हो, दंगे हों, विस्थापन हो, प्रदर्शन हो, अमृतसर हो, बर्मिंघम हो… कहां से लेते हो इतनी ताकत, इतनी हिम्मत!!..... कहते तो सारे हैं भूखे को खाना खिलाना, दुनिया में सबसे ज़्यादा सबाब का काम है. पर करने की बारी आती है न, तो ये सबाब इन्हीं के हिस्से जाता है. इस सबाब को खूब कमाया है इस एक समुदाय के लोगों ने. ये कौम, इंसान होने का धर्म निभाती है, बिना दूसरे का रंग, धर्म, राष्ट्रीयता देखे. बावरा मन आज छकेगा लंगर और करेगा 'सिखी' को सलाम.

Source: News18Hindi Last updated on: July 18, 2020, 9:01 AM IST
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बावरा मन : हंगर से लंगर तक
दो दशक के बाद पता चला अब मेरा बेटा अपने दोस्तों के साथ 'तंग जेब विद्यार्थी जीवन' का मज़ा, कभी कभी बंगला साहब के भरोसे लेता रहता है.
बात उस समय की है जब दिल्ली में मेट्रो नहीं हुआ करती थी, बस से ही ट्रैवलिंग होती थी. स्टूडेंट डेज़ में पॉकेट मनी और शौक के लिए हम कुछ साथी ऑल इंडिया रेडियो पर प्रोग्राम किया करते थे. प्रोग्राम के बाद अक्सर वापसी की बस पकड़ने से पहले पेट पूजा की जाती. बंगला साहब गुरुद्वारे जा के मत्था टेकते, कड़ा प्रशाद खाते, लंगर छकते, फिर अशोक रोड से 100 नंबर बस पकड़, वापसी का सफर तय करते. इतनी तृप्ति होती कि क्या बताऊं. 100 नंबर की खुली खिड़की से आती गर्म हवा, AC का मज़ा देती, बड़ी प्यारी नींद की झपकी आती.

दो दशक के बाद पता चला अब मेरा बेटा अपने दोस्तों के साथ 'तंग जेब विद्यार्थी जीवन' का मज़ा, कभी कभी बंगला साहब के भरोसे लेता रहता है. एक बार अचानक किसी काम से दिल्ली जाना हुआ. बेटे को फ़ोन किया कि मैं आई हूं, मिलना है. बेटा बोला, मां हम बंगला साहब गुरुद्वारे आए हुए हैं, आप यहीं आ जाओ मिलने. मिलने पहुंची तो बेटा और उसके दोस्त, मेरे और ड्राइवर साब के लिए कड़ा प्रशाद लिए बाहर खड़े थे. 20 साल बाद बंगला साहब के दर्शन कर मन खुश हो गया और तसल्ली हुई कि स्विगी और सब-वे सैंडविच वाली ये जेनरेशन, गुरु के बंदों के हाथ का बना सात्विक खाना खा निहाल हो रही है. इनको निहाल होते देख मुझे खुशी होती है कि कम से कम इसी बहाने ये गुरु दर्शन तो करते हैं. सेवा भाव से रूबरू तो होते हैं. खैर, इन गुरु के सेवकों में इतना सेवा भाव आता कहां से है….जानेंगे, लेकिन उस से पहले अपने बचपन का एक अनुभव शेयर करना चाहूंगी.

नानी का बचपन रावलपिंडी के गुरुद्वारे की छांव में बीता.
नानी का बचपन रावलपिंडी के गुरुद्वारे की छांव में बीता.


बचपन
नानी का बचपन रावलपिंडी के गुरुद्वारे की छांव में बीता. मां का जालंधर कैंट के गुरुद्वारे की छांव में. मेरे डैडी की ट्रांसफरेबल जॉब थी इसलिए, मेरा बचपन कई शहरों में बीता. इन नए-नए शहरों में भी मां गुरुद्वारा तलाश ही लेती थीं. गुरपरब पर पूरी रात अन्य महिलाओं संग, गुरद्वारे में सेवा करतीं. हम छोटे-छोटे बच्चे गुरुद्वारे के प्रांगण में खेलते रहते. मां और अन्य महिलाएं पूरी रात लंगर की तैयारी करवातीं. ये वो ज़माना था जब गुरुद्वारों में मॉडर्न किचन नहीं होते थे. आज हैं. ज़मीन में गहरा खड्डा खोद के उसमें लकड़ियां 'बाली' (जलाई) जाती थीं. ऊपर लोहे की मोटी शीट का डेढ़-दो मीटर लंबा तवा होता था. जिसके दोनों तरफ लाइन से बैठ के महिलाएं रोटियां सेंका करती थीं. अगले दिन लंगर में रोटियों की सप्लाई चैन टूटे नहीं, इसलिए देर रात से ही रोटियों का स्टॉक बनना शुरू हो जाता था. ये क्रम लंगर के साथ साथ भी चलता रहता. अगले दिन गुरपरब का लंगर छकने की आस, सबको अरदास के बाद रहती. क्या है न, हमारे पक्के सनातनी परिवार की पक्की श्रद्धा 'नानक' में भी थी.

सच्चा सौदा
सिख धर्म की एक प्रमुख सिखावन ही है "वंड छको" यानी जो है, जितना है, उसे मिल बांट के खाओ.सेवा, संगत, पंगत और लंगर… ये सब इंसान से इंसान की दूरी कम करते हैं. अमीर-गरीब, जाति-धर्म, औरत-आदमी, रंग-रूप का भेद मिटाते हैं. जिस दिन बाबा नानक ने, पिता कालूराम से मिली रकम का 'सच्चा सौदा', भूखों को खाना खिला के किया….उसी दिन से समझ लीजिए 'कांसेप्ट ऑफ लंगर' की नींव पड़ गई. इस सच्चे सौदे ने 'मैं और मेरा' खत्म किया, इंसानियत को बढ़ाया. बाबा नानक के सच्चे सौदे को, उनके बाद भी, हर सिख गुरु ने, गुरुमंत्र माना और लंगर की परंपरा को पूरी तरह से जीवन सार और धर्म का अभिन्न अंग बना लिया.

कहते हैं, गुरु गोबिंद सिंह जी जिस समय प्राण त्याग रहे थे, उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा था, कि लंगर हमेशा चलता रहे. "देग तेग जग में दोऊ चलाई", लंगर (देग) यानी सेवा और तलवार (तेग) यानी न्याय की लड़ाई….. चलती रहे. सिख राज में जो पहला सिक्का बना उस पे गुरु के यही स्वर्ण शब्द अंकित थे, "देग तेग फतेह". यानी सेवा और न्याय की जीत हो.

यही नहीं, गुरु गोबिंद सिंह जी कहते थे, द्वार पे आया कोई व्यक्ति भूखा न जाए क्योंकि, "गरीब का मुंह गुरु की गोलक है".

दसवंद
सिख धर्म का एक महत्वपूर्ण अंग है 'दसवंद'. यानी इस धर्म के अनुयायी अपने सामर्थ्य अनुसार, आय का एक हिस्सा, सामाजिक कार्यों के लिए अलग करते हैं. यही पैसा सेवा और लंगर में काम आता है. हर गुरु के बंदे को इस तरह इंसानियत की सेवा में अपना योगदान करने का मौका मिलता है. महाराजा रणजीत सिंह जी ने अपने राज्य में, लंगर चलते रहें इसलिए, गुरुद्वारों को बड़ी-बड़ी जागीरें दीं. और इसी तरह की जागीरें बाकी सिख गुरुओं ने भी गुरुद्वारों की दीं.

लंगर और समाज सुधार….
लंगर का सीधा नाता समाज और लोगों से है. इन 'लोगों' में शामिल हैं औरतें, हाशिये पर बैठे मज़लूम और जाति में बंधे इंसान. लंगर और पंगत ने सब बंधन तोड़ दिए. औरतों को पर्दे से निजात मिली, संगत पंगत और लंगर में भाग लेने की आज़ादी मिली. सारे सिख गुरुओं का इस 'समवेशीय संस्कृति' पर ज़ोर था. सारे गुरुओं ने इसी 'दर्शन' को खुद भी जिया और लोगों को भी सिखाया. इसीलिए विभिन्न जातियों के लोगों ने ही सिख गुरुओं से दीक्षा ग्रहणकर ख़ालसा पन्थ को सजाया. इसी कड़ी में, गुरु अमरदास जी ने 'गुरु का लंगर' की प्रथा को स्थापित किया और हर श्रद्धालु के लिए 'पहले पंगत फिर संगत' को अनिवार्य बनाया. छुआछूत को समाप्त करने के लिए गुरु अमरदास जी ने 'सांझी बावली' का निर्माण भी कराया था जहां किसी भी धर्म या जाति के लोग जाकर इसके जल को प्रयोग कर सकते थे.

लंगर नियम

लंगर….

1. 'मुंह 'परना' पा के', यानि मास्क के साथ बनाया जाता है...हाइजीन, साफ सफाई का ध्यान रखते हुए.

2. सात्विक और शाकाहारी होता है, ताकि कोई भी बिना अपने धर्म की मान्यताओं को तोड़े, यहां खा सके.

3. बनाते वक्त मन में पाठ करते रहते हैं ताकि बातें न हों और श्रद्धा से बनाया जाए.

4. चखना नहीं होता, अरदास कर बाद में खाना होता है.

ट्रीविया
कुल मिला के लंगर एक ऐसी प्यारी और अनोखी प्रथा है जिसे जब कोई पहली बार देखता है, भोगता है, तो हैरान हो जाता है. बनाने वाले भी हर वर्ग के और खाने वाले भी हर वर्ग के. ऐसा नज़ारा सबके दिल को छू जाता है. सुनते हैं एक बार मिस्र के राष्ट्रपति कर्नल नासिर, अपने भारत दौरे के दौरान, स्वर्ण मंदिर दर्शन करने गए. वहां उन्होंने अपनी आंखों से कश्मीरी मुसलमान, हिन्दू, सिख सबको एक साथ, एक सफ़ में भोजन करते देखा तो बहुत प्रभावित हुए. गद गद मन से, उस समय उनके ग्रुप में जितने लोग थे, उन सबके पास जितने पैसे थे, वो सब वहां अपनी तरफ़ से सेवा में चढ़ा आए थे.

हिंदुस्तान के शहंशाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर, गुरु अमर दास जी को बहुत मानते थे. गुरु अमरदास जी साहिब ने ही बादशाह अकबर से कहकर सिखों और हिंदुओं पर लगने वाले इस्लामिक जज़िया कर से निजात दिलवाई थी. एक बार जब अकबर, गुरु साहिब को मिलने आए तो उन्हें भी मोटे अनाज से बना लंगर छक कर ही फिर गुरु साहिब का साक्षात्कार करने का मौका मिला. कहा जाता है कि अकबर इस सेवा सोच से बहुत प्रभावित हुए.

गुरुमंत्र/नानीमंत्र
नानी कहती थीं कि जो इंसान हाथ से काम करता है (dignity of labour), वही इंसान जग में कामयाब होता है. आज सिख कौम न सिर्फ़ भारत में, बल्कि पूरे विश्व में अपने कर्म, धर्म (duty) और सेवा भाव से पहचानी जाती है. संगत, पंगत और लंगर….और इन तीनों को निभाने के लिए, कर्म यानी श्रम, यही है 'सिखी' का सार और इसी 'सिखी' को बावरा मन आज करता है सलाम और कहता है….बस "लोह लंगर तपदे रेन".
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: July 18, 2020, 9:01 AM IST
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