बावरा मन: मिसेज बेदी के पराठे

सीनियर पुलिस अधिकारी बेदी साब के डंडे का डर चाहे जितना रहा हो, खुद वो बेहद मिलनसार थे. हर कोई मिलते ही उनका मुरीद हो जाता. हंसमुख थे, हाज़िर जवाब थे, दोस्ताना व्यवहार था. चुंबकीय व्यक्तित्व के मालिक थे. उनकी सफलता के पीछे बहुत बड़ा हाथ उनकी शरीके हयात, यानी उनकी धर्मपत्नी, मिसेज बेदी का था. अथाह प्रेम और अपनेपन की मालकिन मिसेज बेदी, अपने आप में एक 'कंप्लीट वुमन' थीं. साथी अफसरों की बीवियों और बच्चों में वो सुपर हिट थीं. ज़बान पे शीरी, स्वभाव में सादगी और हाथ में पंजाबी पराठे बनाने का ज़बरदस्त फ़न. अगर 'बेदी का डंडा' सेर था तो मिसेज बेदी का 'आलू का पराठा', सवा सेर.

Source: News18Hindi Last updated on: August 1, 2020, 12:31 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
बावरा मन: मिसेज बेदी के पराठे
'बेदी का डंडा' सेर था तो मिसेज बेदी का 'आलू का पराठा', सवा सेर (फाइल फोटो)
बात उस ज़माने की है जब बेदी साब अलीगढ़ के पुलिस कप्तान हुआ करते थे. अलीगढ़ के बारे में मशहूर है कि जो भी अफ़सर यहां आते हैं, या तो सस्पेंड हो के जाते हैं या फिर यहां का लंबा कार्यकाल भोगते हैं. मुश्किल जिला है न. मुश्किल ज़िला होने के कारण पहले तो शहर की फ़िज़ा समझिए, वहां की अवाम का दिल पढ़िए, फिर अच्छे डॉक्टर की तरह, यूनिवर्सिटी के छात्रों और उसकी यूनियन की नब्ज़ पकड़िए. सबको ज़बान से मरहम लगाइए और तब कहीं जा के इन सबसे बुद्धि और विवेक से निपटिए. यानी, कुल मिला के जब ज़िले पे अच्छी पकड़ बन जाए, तो फिर कोई न हिला पाए. बेदी साब इन सभी कलाओं में माहिर अफसर थे. इसीलिए बाकी ज़िलों के अपने कार्यकाल की तरह यहां भी, सफल थे.

लेकिन बात एक दिन मिसेज बेदी के पाले आ पड़ी. वो ऐसे कि बेदी साब उस दिन आउट ऑफ स्टेशन थे. पीछे से यूनवर्सिटी में कुछ मसला हो गया. छात्रों की तो वैसे भी आदत होती है तीन का पांच करने की. ऊपर से मामला छात्र नेताओं तक अगर पहुंच जाए तो मसला बढ़िया 'प्रोफाइल' ले लेता है. उस दिन भी ऐसा ही हुआ. दे दना दन हर 'हॉल' (एएमयू में हॉस्टल्स को हॉल कहा जाता है, यहां छात्रों की पहचान उनके हॉल से होती है) से छात्रों का हुजूम निकल बाहर आने लगा. मारामारी ऐसी, कि बस कोई पीछे न छूट जाए. आधे से ज्यादा छात्रों को तो ये भी न मालमू था कि वो हाय-हाय और मुर्दाबाद-मुर्दाबाद, किसके लिए और किसके खिलाफ़ कर रहे हैं. जिधर को जुलूस रुख करता, मुंह उठा उसी ओर वो निकल लेते. यही सब करते, देखते-देखते सारा मजमा एसएसपी बंगले के गेट तक पहुंच गया.

एक तो छात्रों का इतना बड़ा हुजूम. ऊपर से उनका पारा हाई. यानी करेला, वो भी नीम चढ़ा. इतने शोरगुल में एसएसपी बंगले की गार्ड भी चोकन्ना हो गए. सब ने आकर के मेन गेट पर मोर्चा संभाल लिया. सिचुएशन किसी भी वक्त इधर से उधर हो सकती थी. गेट पर कुछ पत्थर चलने की आवाज़ भी आने लगीं. अंदर मिसेज बेदी ने भी इस हो-हल्ले को सुना.

जब लगा आवाज़ें नज़दीक आ गई हैं, तो बाहर निकल आईं, देखने कि आखिर माजरा क्या है. बाहर देखा तो सामने गार्ड के सिपाहियों ने मोर्चा लगा रखा था. उन्होंने पल भर में समझ लिया कि मामला गर्म है. तुरंत आगे जा के सिपाहियों से बोलीं, "चलो, जाओ, यहां क्या कर रहे हो, ज़रूरत होगी तो मैं खुद बुला लूंगी." और फिर ये कह के सबको वहां से रवाना कर के ही मानी. आखिर में जो एक दरबान रह गया था उस से बोलीं, "बेटा, ज़रा गेट खोल दो."
दरबान एकदम भौंचक्का रह गया. 'यस सर, यस सर' की घुट्टी पी थी, इसलिए मना नहीं कर पाया. डरते डरते गेट खोल दिया और फिर उसी डर से मिसेज बेदी के पीछे जा खड़ा हो गया. मिसेज बेदी को सामने देख अब भौंचक्का होने की बारी उन छात्रों की थी. उन को सामने देख छात्र ज़रा ठिठक गए. भोंचक्के सिपाही और भोंचक्के छात्रों के बीच निडर खड़ी थीं मिसेज बेदी. मोर्चा अपने हाथ आया देख बड़े प्यार से छात्रों से बोलीं, "बेटा आप इनसे मिलने आए हो न, पर ये तो बाहर गए हैं. कल तक आ जाएंगे, आप कल उनसे मिलने यहां 'कैंप ऑफिस' आ जाइयेगा." मिसेज बेदी की प्यार भरी बात सुन सारे छात्र बड़े ही आराम से 'about turn' कर गए.

अगले दिन यूनियन के छात्र नेता अपना समूह ले एसएसपी के कैंप ऑफिस पहुंचे. बेदी साब ने उनकी मांग और समस्याओं को सुना. सब पक्षों को समझा बुझा दिया, मामला हल कर दिया. फिर बड़े प्यार से, सम्मानपूर्वक उन बच्चों को घर के अंदर ले गए कि मिसेज बेदी ने बुलाया है. मिसेज बेदी ने सब बच्चों से न सिर्फ प्रेम पूर्वक बात की बल्कि उन्हें खूब प्यार से अपने हाथ से बना कर आलू के पराठे भी खिलवाए. सबको आगे के लिए भी निमंत्रण दे दिया कि जब भी मन करे, बेझिझक उनके घर पराठे खाने आएं. इस तरह कुछ ही पलों में वो 'युवा छात्र', मिसेज बेदी के लिए 'बच्चे' हो गए.

.
खैर, इस बात को भी अब दशकों बीत गए. हाल ही में, कुछ दिन पहले बेदी साब की बेटी की उन छात्र नेता से एक समारोह में मुलाकात हो गई. बातचीत में अलीगढ़ का ज़िक्र आया तो ज़िक्र बेदी साब का भी आया. बिटिया ने जब बताया कि वो बेदी साब की ही बेटी हैं, तो वो इतने खुश हुए कि क्या बताएं. बेदी साब की बिटिया को ये पराठे वाला पूरा किस्सा उन्होंने भी सुनाया. मम्मी पापा का हाल चाल उनसे ऐसे पूछा जैसे कोई बचपन का खोया खिलौना फिर हाथ आ गया हो. उन्हें मिसेज बेदी के न रहने का बहुत दुख हुआ और फिर बच्चों सी ही ज़िद कर बैठे, कि बेदी साब से मिलना है.

इस तरह करीब 45 साल बाद, सेवानिवृत IPS बेदी साब से उनके घर, केरल के महामहिम गवर्नर साहब श्री आरिफ़ मोहम्मद खान, मिलने पहुंचे. इस बहुत ही प्यारी मुलाक़ात में अगर कमी रही तो मिसेज बेदी की और उनके हाथ के बने पंजाबी स्टाइल वाले आलू के पराठों की.

मिसेज बेदी, जितनी गरिमामयी, जीवन में थीं, उतनी ही अपने अंतिम समय में रहीं. अपने सभी बाल बच्चों के लिए, परिवार के बाकी सभी सदस्यों के लिए, स्टाफ मेंबर्स के लिए, उन्होंने गिफ्ट हैंपर बनाए थे. सबके लिए चिट्ठियां लिखीं थीं. सबको अपने हाथ से देकर गई थीं.

उनकी शख्सियत सिखाती है कि जीवन में मिसाल बनने के लिए इंसान किसी ओहदे का मोहताज नहीं होता. प्यार और व्यवहार, दोनों, हर ओहदे से ऊपर का एक अटूट संबंध बनाते हैं. मिसेज बेदी को बावरा मन आज करता है दिल से प्रणाम.
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: August 1, 2020, 5:40 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
corona virus btn
corona virus btn
Loading