बावरा मन: भारतीय सिनेमा की पहली फेमिनिस्ट हीरोइन, देविका रानी और उनका घर एक मंदिर!

देविका रानी (Devika Rani) एक्टिंग, स्टाइल और गरिमा का वो मील का पत्थर थीं, जिसे छूने की ललक नलिनी जयवंत, नरगिस, नूतन, मीना कुमारी और आगे चलकर वहीदा रहमान को रही.

Source: News18Hindi Last updated on: September 19, 2020, 11:07 AM IST
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बावरा मन: भारतीय सिनेमा की पहली फेमिनिस्ट हीरोइन, देविका रानी और उनका घर एक मंदिर!
भारतीय सिनेमा की पहली 'फेमिनिस्ट हीरोइन' देविका रानी आपार सुन्दरता की मालकिन थी.
पूरे लॉकडाउन में एक घर बड़ी चर्चा में रहा. ये घर था मशहूर अभिनेत्री कंगना रनौत का हिमाचल प्रदेश वाला आलीशान महलनुमा निवास. वैसे तो कलाकार की पहचान उसके काम से होती है, लेकिन कलाकार के घर से उसकी पहचान ज़रूर झलकती है. लॉकडाउन में मैं भी घर में बैठी क्या करती, कंगना के घर से किए हुए इन विडियोज़ को देखने लगी और उनकी सोशल मीडिया पोस्ट्स खूब फॉलो करने लगी. मुझे मज़ा आने लगा था. फिर आया कंगना का फेमिनिज़्म वाला ट्वीट. उसके बाद कई बॉलीवुड अभिनेत्रियों में एक दूसरे को बड़ा फेमिनिस्ट साबित करने की होड़ शुरू हो गई. मुझे भी लगा बॉलीवुड की फेमिनिज़्म की कतार है तो लंबी और हर एक अभिनेत्री ने फेमिनिज़्म की अपनी-अपनी परिभाषा गढ़ी है. ऐसे में ये जानना ज़रूरी है कि ये कतार आखिर शुरू किसने की.

मेरी खोज मुझे 1930 के दशक में ले गई, जहां मुझे अभिनेत्रियों की कतार का प्रथम चेहरा नज़र आया. बॉलीवुड की कामयाब पहली सुपरस्टार अभिनेत्री, जिनका खुद एक ज़बरदस्त हिमाचल कनेक्शन है... देविका रानी. देविका रानी, एक्टिंग, स्टाइल और गरिमा का वो मील का पत्थर थीं, जिसे छूने की ललक नलिनी जयवंत, नरगिस, नूतन, मीना कुमारी और आगे चलकर वहीदा रहमान को रही.

भारतीय सिनेमा की फर्स्ट लेडी- देविका रानी
हिमाचल में जहां कंगना का घर है, वहीं कुछ और आगे वादियों में गुज़रे ज़माने की मशहूर स्टार अभिनेत्री देविका रानी का नागर वाला घर भी है. जी मैं बात कर रही हूं रबीन्द्रनाथ ठाकुर के परिवार से ताल्लुक रखने वाली 'अछूत कन्या' देविका रानी की जिन के लिए बचपन में रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था कि वो 'A bud in the sunshine' हैं. बाद में वही देविका रानी भारतीय सिनेमा की 'फर्स्ट लेडी' कहलायीं. हिमाचल प्रदेश के नागर में ये घर उनके पेंटर आर्टिस्ट ससुर 'निकोलॉय रॉरिक' की कर्मभूमि/घर एक मंदिर था. आज दुनिया भर के पेंटर आर्टिस्ट्स के लिए ये घर एक तीर्थस्थल की तरह ही है. देविका रानी ने फिल्मों से संन्यास लेने के बाद इस घर में बड़ा वक़्त बिताया था. दरअसल, फर्स्ट लेडी ऑफ़ इंडियन सिनेमा रह चुकीं देविका रानी के सेकंड हसबैंड स्वेतोस्लाव रॉरिक, निकोलॉय रॉरिक के ही पुत्र थे. स्वेतोस्लाव रॉरिक खुद भी पेंटर थे.
देविका रानी, भारतीय सिनेमा की पहली फेमिनिस्ट!
जिस जमाने में भारत की महिलायें घर की चारदीवारी के भीतर भी घूंघट में मुँह छुपाये रहती थीं, जिस ज़माने में औरतों का फिल्म लाइन में जाना अच्छा नहीं समझा जाता था, देविका रानी ने सारे नियम तोड़ कर अपने मन का कहा माना. देविका रानी जहां खड़ी हुईं, बस वहीं से अभिनेत्रियों के फेमिनिज़्म की कतार शुरू हुई. देविका रानी ने उस वक्त सिनेमा में काम करके अदम्य साहस का प्रदर्शन किया था. भारतीय सिनेमा की पहली 'फेमिनिस्ट हीरोइन' देविका रानी आपार सुन्दरता की तो मालकिन थी हीं, सिनेमा में कदम रखने से पहले उन्होंने विलायत से 'आर्किटेक्चर', 'टेक्सटाइल' और 'डेकोर डिजाइन' जैसी विधाओं का भी अध्ययन किया था. लंदन में ही देविका रानी की मुलाकात हिमांशु राय से हुई. हिमांशु राय देविका रानी की सुंदरता को देखकर मुग्ध हो गए. दोनों को प्रेम हो गया और बाद में दोनों ने शादी कर ली. शादी तो हो गई, पर काम भी चलता रहा.

देविका रानी को हिन्दुस्तानी सिनेमा की 'ग्रेटा गार्बो' भी कहा जाता था.
हिमांशु राय और बॉम्बे टाकीज़
शुरुआती दौर में देविका रानी, हिमांशु राय की फिल्मों में कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग और आर्ट डायरेक्शन का काम करती थीं. वो पूरी तरह से सिनेमा के हर पक्ष के लिए वेल ट्रेन्ड थीं. सेट डिजाइनिंग से लेकर कलाकारों के मेकअप, कैमरा ऐंगल्स आदि विधाओं की उन्होंने यूरोप के बेस्ट संस्थाओं से ट्रेनिंग प्राप्त की थी.

1933 में हिमांशु राय ने फिल्म बनाई- कर्म. कर्म में हिमांशु राय खुद मुख्य भूमिका में थे और अभिनेत्री के रूप में देविका रानी को चुना गया था. कर्म वो पहली टॉकीज़ थी, जो हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों में बनी थी. ये फिल्म देविका रानी की बतौर अभिनेत्री पहली फिल्म और हिमांशु राय की बतौर हीरो, आखरी फिल्म थी. इस फिल्म का प्रीमियर लंदन के 'मार्बल आर्च पैविलियन' में हुआ था. प्रीमियर के मुख्य अतिथि लॉर्ड इरविन थे और इस प्रीमियर में उस समय के तमाम गणमान्य लोग और कलाकार शामिल हुए थे. इस फिल्म ने जहां एक ओर अपार सफलता प्राप्त की, वहीं एक लंबे तक किस सीन की वजह से सुर्खियां भी हासिल की.

फिल्म कर्म का बहुचर्चित किसिंग सीन, जो भारतीय सिनेमा का ऐसा पहला सीन था.


बाद में पति-पत्नी दोनों ने साथ मिलकर बांबे टाकीज़ स्टुडिओ की स्थापना की. इस प्रोडक्शन हाउस के लिए हिमांशु राय और देविका रानी, दुनिया के सबसे बेहतरीन साज़ोसामान, मशीनरी और टेक्नीशियंस लाए. जर्मनी की फिल्म इंडस्ट्री में काम कर चुकने के कारण देविका रानी और हिमांशु राय को अंतरराष्ट्रीय स्तर की क्वालिटी ही भाती थी. देविका रानी उनकी इस फिल्मी यात्रा में, उनके बिज़नेस में, बराबर की हिस्सेदार थीं.

बॉम्बे टाकीज़, उस वक्त भारत के प्रथम फिल्म स्टुडिओं में से एक था. इसके आस्तित्व में आते ही देविका रानी, बॉम्बे टाकीज़ की प्रमुख नायिका बन गईं. अशोक कुमार, दिलीप कुमार, मधुबाला जैसे महान कलाकारों ने बॉम्बे टाकीज़ के लिए काम किया. दिलीप कुमार की पहली फिल्म ज्वारभाटा,  बॉम्बे टाकीज़ की ही फिल्म थी. यूसुफ़ ख़ान का नाम दिलीप कुमार, देविका रानी ने ही रखा था. अछूत कन्या, किस्मत, शहीद, मेला जैसी आइकॉनिक लोकप्रिय फिल्मों का निर्माण इस बैनर तले हुआ. अछूत कन्या अपने वक़्त से आगे की थीम पर आधारित फिल्म थी. सामाजिक जनजागृति पैदा करती ये फिल्म एक अछूत कन्या और एक ब्राह्मण युवा के प्रेम प्रसंग पर आधारित फिल्म थी. 

हिन्दुस्तानी गार्बो/ ड्रैगन लेडी/ ड्रीम गर्ल और फेमिनिस्ट
हिंदी फ़िल्मों की पहली स्वप्न सुंदरी और ड्रैगन लेडी जैसे विशेषणों से अलंकृत देविका को उनकी ख़ूबसूरती, शालीनता, धाराप्रवाह अंग्रेज़ी और अभिनय कौशल के लिए अंतराष्ट्रीय स्तर पर जितनी लोकप्रियता और सराहना मिली उतनी कम ही अभिनेत्रियों को नसीब हो पाती है.

देविका रानी अपने वक़्त से आगे की सोच रखने के लिए जानी जाती थीं. उनके ऑनस्क्रीन कपड़े और पर्सनल लाइफ में पहने गए कपड़े, दोनों लोगों में चर्चा का विषय बने रहते थे. निजी ज़िंदगी में भी वो आज़ाद ख्याल परन्तु गरिमापूर्ण शख्सियत की मालकिन थीं.

पाश्चत्य संस्कृति और पाश्चत्य सिनेमा ने उनके जीवन में बड़ा रोल निभाया. एक समय था जब उन्हें हिन्दुस्तानी सिनेमा की 'ग्रेटा गार्बो' भी कहा जाता था. वो बात और है कि बाद में चल कर ये उपाधि सुचित्रा सेन को भी मिली थी.

देविका रानी का हिमाचल से रूहानी प्रेम
देविका रानी का हिमाचल प्रेम उनके दूसरे प्रेम के साथ शुरू हुआ. 1940 में हिमांशु राय का देहान्त हो गया. कुछ समय देविका रानी ने बॉम्बे टॉकीज चलाने की कोशिश की, पर फिर कुछ ही समय बाद उन्हें फिल्मों से अपना नाता तोड़ना पड़ा. उन्होंने रूसी चित्रकार स्वेतोस्लाव रॉरिक के साथ सन् 1945 में विवाह कर लिया और बंगलौर में जाकर बस गईं. स्वेतोस्लाव रॉरिक, विश्व प्रसिद्ध चित्रकार निकोलॉय रियोरिक के पुत्र थे.

देविका रानी ने फिल्में तो छोड़ दीं पर सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यों में, वो ताउम्र लगी रहीं.


देविका रानी को भी अपने ससुर और पति की तरह ही हिमाचल की वादियों से गहरा प्रेम हो गया. उन्होंने अपने जीवन के महत्पूर्ण पल नागर के इस खूबसूरत घर में बिताए. वो दुनिया में कहीं भी घूमने जातीं, कुल्लू की शॉल ओढ़ के जातीं. जब कुल्लू की शॉल को भारत में भी कम लोग जानते थे, देविका रानी विदेश में दुनिया के विशिष्ट लोगों के साथ हिमाचल की ये खूबसूरत शॉल बड़ी शान से पहनतीं थीं. एक तरह से वो हिमाचल की संस्कृति की, देश विदेश दोनों में, अनऑफिशियल राजदूत बन गईं थीं.

देविका रानी के ही प्रयासों से नागर वाले घर में रॉरिक पिता पुत्र की पेंटिंग्स का म्यूज़ियम तैयार हुआ. देविका रानी इस म्यूज़ियम में कुल्लू निवासियों की सांस्कृतिक और एंथ्रोपोलॉजिकल धरोहर का एक विभाग भी बनाना चाहती थीं. साथ ही वो इस म्यूज़ियम का एक भाग, यहां की वनस्पति, फूल पत्तियों को समर्पित करना चाहती थीं.

देविका रानी कहती थीं,
" Kullu was home of his (Svetoslav Nikolaievich Roerich) people, his mother and father. Madam Roerich, Prof Roerich, George Roerich, his brother. And the most beautiful scenery… Himalayas...snow on the mountains and spring flowers… It became our home. I was treated here as a daughter." 


देविका रानी का जब 1994 में देहान्त हुआ, उनकी इच्छा अनुसार उनकी राख का कुछ हिस्सा ब्यास नदी में बहाया गया, कुछ हिस्सा, नागर वाले घर के प्रांगण में लगे उनके प्रिय नींबू के पेड़ के नीचे दबाया गया. आज भी इस घर में लगा देविका रानी के नाम का पत्थर, इन वादियों में उन की मौजूदगी दर्ज करवाता है.

सम्मान
देविका रानी को सिनेमा में उनके योगदान के लिए भारत के राष्ट्रपति ने सन् 1958 में पद्मश्री सम्मान प्रदान किया. उन्हें सन् 1970 में प्रथम दादा साहेब फाल्के पुरस्कार प्राप्त करने का गौरव भी प्राप्त हुआ. उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरुस्कार से भी सम्मानित किया गया था.

PS- 

निकोलॉय रॉरिक- रूसी चित्रकार, लेखक, पुरातत्त्वविद, थियोसोफिस्ट, दार्शनिक,

निकोलॉय रॉरिक, नौ अक्टूबर, 1874 को सेंट पीटर्सबर्ग (रूस) में पैदा हुए, किंतु वह लंबे समय तक भारत में रहे. इन्होंने रूस, यूरोप, मध्य एशिया, मंगोलिया, तिब्बत, चीन, जापान और भारत की यात्राएं कीं. लेकिन 1928 से वह हिमालय की गोद में आए. हिमालय की अनुपम छटा से वह इतने प्रभावित हुए कि इन्होंने अपने जीवन के बीस वर्ष कुल्लू घाटी में व्यतीत किए. यूं तो 73 वर्ष के अपने जीवन काल में इन्होंने विज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में अपार ज्ञान प्राप्त किया, लेकिन प्रमुख रूप से वो आज भी अमर चित्रकार के रूप में प्रसिद्ध हुए.

2020 में सीनियर रॉरिक की रियल पिक्चर / फेक न्यूज़

हाल ही में निकोलॉय रॉरिक की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वाइरल हुई. इस फोटो में निकोलॉय रॉरिक को जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और युनूस खान के खड़े दिखाया गया है.

सोशल मीडिया पर वायरल फोटो


तस्वीर के साथ एक फेक न्यूज़ चलती है कि निकोलॉय रॉरिक, इंदिरा गांधी के ससुर और युनूस खान, इंदिरा गांधी के पति हैं, जबकि, निकोलॉय रॉरिक मशहूर अभिनेत्री देविका रानी के ससुर थे और युनूस खान भारतीय राजनयिक और दिल्ली के प्रगति मैदान के जनक थे.

ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: September 19, 2020, 11:07 AM IST
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