बावरा मन: अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर

कहानी उस नन्हे बालक की, जिस की जेल में नेहरू और शास्त्री जी जैसे नेताओं ने देखभाल की…! इस मुल्क को बनाने में उस समय के हर भारतवासी का उतना ही योगदान है जितना इतिहास की किताबों में दर्ज नामों का.

Source: News18Hindi Last updated on: August 8, 2020, 9:48 AM IST
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बावरा मन: अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर
गांधी जी ने 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का अब तक का सबसे बड़ा आंदोलन शुरू किया.
बात उस समय की है जब द्वितीय विश्व युद्ध अपने चरम पे था. भारत में क्रिप्स मिशन अपने मिशन में नाकामयाब हो चुका था. भारतवासी अब सिर्फ़ आज़ादी चाहते थे, किसी भी कीमत पर. ऐसे में गांधी जी ने 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का अब तक का सबसे बड़ा आंदोलन शुरू किया. इधर उन्होंने बॉम्बे के गोवालिया टैंक मैदान, जोकि अब अगस्त क्रांति मैदान कहलाता है, से 'करो या मरो' का नारा दिया, उधर पूरे भारत में स्वतंत्रता सेनानियों की धर पकड़ शुरू हो गई.

ब्रिटिश सरकार ने रात को 12 बजे ऑपरेशन ज़ीरो ऑवर के साथ बड़ी क्रूरता से बिना ट्रायल के ही कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया. उन्हें देश के अलग-अलग जेलों में डाल दिया. गांधीजी को नज़रबंद कर दिया गया. कांग्रेस को अवैध संस्था घोषित कर इस पर बैन भी लगा दिया गया. अपने प्रिय नेताओं को कैद होते देख, देश में जगह-जगह विरोध प्रदर्शन होने लगे।

विरोध प्रदर्शनों को कुचलने के लिए अंग्रेज़ और ज़्यादा ज़ोर ज़ुल्म पर उतर आए. सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस जन आंदोलन में लगभग लगभग 940 लोग मारे गए, 1630 घायल हुए, जबकि 60229 लोगों ने गिरफ्तारी दी थी. बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद जनता ने आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में ले ली.साथ ही राम मनोहर लोहिया, सुचेता कृपलानी, अरुणा आसिफ़ अली जैसे नई पीढ़ी के नेता उभर के सामने आए. 1942 के भारत में ऐसा माहौल बन गया कि भारत छोड़ो आंदोलन अब तक का सबसे विशाल आंदोलन साबित हुआ और उस के असर से अंग्रेजों को समझ में आने लगा कि अब उनका सूरज अस्त होने वाला है.

Jawaharlal Nehru, Lal Bahadur Shastri, Mahatma Gandhi, independence, freedom movement
महात्मा गांधी 06 अगस्त 1947 को लाहौर में थे. वहां से वो भारत लौट रहे थे
जेलर साब और स्वतंत्रता सेनानी
खैर, इस सब के बीच कुछ बड़े नेता, जैसे जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, हफ़ीज़ मोहम्मद इब्राहिम और रफ़ी अहमद किदवई कानपुर जेल पहुंचे. उस वक़्त इस कानपुर जेल के जेलर साब थे, जनाब SM हफ़ीज़. जेल के नियम इन स्वतंत्रता सेनानियों के लिए जितने तगड़े थे, जेल के जेलर साहब, जनाब SM हफ़ीज़ उनके लिए उतने ही नरम थे. अंग्रेज़ों की दी हुई वर्दी के अंदर आखिर एक हिंदुस्तानी का दिल जो धड़कता था. हफ़ीज़ साब, जेलर तो पक्के थे लेकिन हिंदुस्तानी उससे भी ज़रा ज़्यादा पक्के थे।

हफ़ीज़ साब को कुछ ही दिनों में मालूम चला कि जवाहर लाल नेहरू को क्लौस्ट्रफ़ोबिया है. एक दिन उन्होंने चुपचाप नेहरू जी को सेल की चाबी पकड़ा दी. कहा, जब भी आपको घुटन महसूस हो तो आप बाहर निकल हवा खा लिया करें." उन्होंने इस राज़ की किसी को कानो कान ख़बर भी न होने दी. बस जेल के एक हेड कांस्टेबल हुआ करते थे, बांके लाल दीक्षित वो इस राज़ के राज़दार थे.Jawaharlal Nehru, Lal Bahadur Shastri, Mahatma Gandhi, independence, freedom movement

जेल में अखबार
खैर, जेलर साब कुछ ही समय पहले अपनी एक पर्सनल ट्रेजेडी से गुज़रे थे. उनकी बेगम साहिबा का कुछ समय पहले इन्तेकाल हो गया था. नन्हा बच्चा था जो 1940 में ही पैदा हुआ था. सवाल ये था कि जेलर साब घर पर बच्चा किसके हवाले छोड़ते. इस दुविधा का हल भी उन्होंने निकाल लिया था. जेलर साब अपने नन्हे बेटे, ज़हीर को अपने साथ ही जेल ले आने लगे थे. अब छोटा बच्चा और उसका समान, इन स्वतंत्रता सेनानियों के लिए बाहर की दुनिया से एकमात्र संपर्क का ज़रिया हो गया. इस तरह जेल में इन कैदियों के लिए अख़बार smuggle करने का ज़रिया बना, नन्हें ज़हीर का सामान. चुपके से सुबह, अखबार अंदर इस सामान में जाता, शाम को बच्चे के साथ बाहर निकल आता. अखबार से ये कैदी, देश के राजनैतिक माहौल और द्वितीय विश्व युद्ध की जानकारी लिया करते थे.

MN Roy की रजाई
एक बार कम्युनिस्ट पार्टी के कद्दावर नेता MN Roy भी कानपुर जेल में बंद थे. जितना बड़ा उनका पोलिटिकल कद्द था, उतना ही बड़ा उनका फ़िज़िकल कद्द भी था. लंबे इतने थे कि जेल की रज़ाई में समा ही नहीं पाते थे. देशभक्त जेलर साब से इस देशभक्त लीडर की तकलीफ़ देखी न गयी. एक दिन अपनी जेब से 5 रूपए खर्च करके MN Roy साब के लिए सात फुट लंबी रज़ाई बनवा के ले आये. हर रात चुपके से वो रज़ाई सेल के अंदर जाती और हर सुबह चुपके से निकाल, जेलर साहब के ऑफिस में तह कर रख दी जाती.

सरफरोशी की तम्मन्ना और हफ़ीज़ साब
ये दौर वो था जब SM हफ़ीज़ साब का देशभक्त लीडरों और क्रांतिकारियों से अक्सर वास्ता पड़ता रहता था. दरअसल, वतन के लिए कुछ भी कर जाने का जज़्बा रखने वाले आज़ादी के दीवानों का दूसरा घर, जेल ही हुआ करता था और हफ़ीज़ साब उनके ख़ैरख्वाह हुआ करते थे.अंग्रेज़ों के ज़माने के ये जेलर साब, उन सब का दिल से ध्यान रखते थे. जब काकोरी कांड में रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्लाह खां जेल में बंद थे तो बिस्मिल ने खुद जेलर साब को मशहूर नज़्म सरफरोशी की तम्मन्ना सुनाई जिसे सुन देर तक दोनों साथ साथ भावुक हो बैठे और रोये भी!!

नन्हा बच्चा, ज़हीर!
1940 में जन्मे 'नन्हे बालक', जिनकी नेहरू जी और शास्त्रीजी जैसे लीडरों ने जेल में देखभाल की थी, हाल ही में, 25 जुलाई को उनका 80 साल की उम्र में लखनऊ में इंतकाल हुआ. SM ज़हीर साब लखनऊ शहर के लिए एक जानामाना नाम थे. लखनऊ के ला मार्टिनियर स्कूल से उन्होंने पढ़ाई की. उसके बाद KGMC से उन्होंने डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी की. कुछ साल पहले उन्होंने एक अंग्रेज़ी अख़बार में दी इंटरव्यू में ये, अपने प्यारे अब्बाजान से जुड़ी सारी तारीख़ी बातें कहीं थीं. आज जब वो नहीं हैं, उनका जाना सिखा रहा है कि कैसे हमें गुज़रे वक़्त से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ियां, धीमें धीमें अब कम होती जा रहीं हैं. हमें इन कड़ियों का बहुत खयाल रखना है, उनके साथ ढेर सारा वक़्त बिताना है. बुजुर्गों की सोहबत से हम बहुत कुछ सीखते हैं. याद रहे, इस मुल्क को बनाने में उस समय के हर भारतवासी का उतना ही योगदान है जितना इतिहास की किताबों में दर्ज नामों का. अगस्त क्रांति के वक़्त के अपने सारे बुज़ुर्गों को आज मेरा बावरा मन करता है आदर से, जय हिंद!!!
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: August 8, 2020, 9:46 AM IST
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