बावरा मन: जंगल जंगल की बात चली है!

दूर दूर तक फैली हरी घास के बीचोंबीच खड़ी, लाल पकी ईंटों से बनी FRI देहरादून की पूरी इमारत, एक खूबसूरत दृश्य पैदा करती है. एक वक्त था कि इस इमारत का नाम गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दुनिया की सबसे बड़ी रेड ब्रिक बिल्डिंग के रूप में शामिल था.

Source: News18Hindi Last updated on: February 27, 2021, 10:25 AM IST
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बावरा मन: जंगल जंगल की बात चली है!
एक वक्त था कि इस इमारत का नाम Guinness Book of World Records में दुनिया की सबसे बड़ी रेड ब्रिक बिल्डिंग के रूप में शामिल था.

दिल्ली में जार्ज पंचम के 12 दिसंबर 1911 को होने वाले दिल्ली दरबार के बाद जब वायसराय लॉर्ड हार्डिंग की दिल्ली में सवारी निकाली जा रही थी तो उसकी शोभायात्रा पर, यानी कि वायसराय लार्ड हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बनाने में क्रांतिकारी रासबिहारी बोस की प्रमुख भूमिका रही थी. बसन्त कुमार विश्वास नाम के एक युवा क्रांतिकारी ने उन पर बम फेंका था, लेकिन निशाना चूक गया था. इसके बाद ब्रिटिश पुलिस रासबिहारी बोस के पीछे लग गई और वह बचने के लिए रातों-रात रेलगाड़ी से देहरादून खिसक लिये और अपने आफिस में इस तरह काम करने लगे मानो कुछ हुआ ही नहीं हो. अगले दिन उन्होंने देहरादून के नागरिकों की एक सभा बुलायी. उन्होंने इस सभा में, वायसराय पर हुए हमले की निन्दा की. इस प्रकार उन पर इस षडयन्त्र और काण्ड का प्रमुख सरगना होने का ज़रा भी सन्देह किसी को न हुआ. और धीरे धीरे रासबिहारी बोस दोगुने उत्साह के साथ, फिर से क्रान्तिकारी गतिविधियों के संचालन में जुट गये.


जी, ये जानकारी कि रासबिहारी बोस देहरादून के FRI यानी फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट में हेड क्लर्क थे. हमें देहरादून के FRI में जाकर ही हासिल हुई. रास बिहारी बोस, वेष बदलने के माहिर थे. देहरादून के अपने 8 साल के प्रवास में उन्होंने एक तरफ़ सरकार की नौकरी की और दूसरी तरफ़ ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ़ लोगों को संगठित करने का काम किया.


जैसा कि एक कहावत है प्यार और जंग में सब जायज़ है. और ये कथन जितना सही भारतीय क्रांतिकारियों के लिए था उतना ही साम्राज्यवादी शक्तियों के लिए भी था. क्रांतिकारी, लड़ाई लड़ रहे थे अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने की और अंग्रेज लड़ाई लड़ रहे थे पैर जमाने की. और दोनों ही, अपना-अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए कुछ भी कर सकते थे.


अंग्रेज़ों का जंगलप्रेम और उसका ताजमहल

खैर, अंग्रेजों का जंगल प्रेम, किपलिंग की जंगल बुक से प्रदर्शित होता है. मशहूर लेखक आरके नारायण ने कभी कहा था कि रुडयार्ड किपलिंग की हिंदुस्तान के आदमियों और बाज़ारों से ज़्यादा समझ जंगलों और जानवरों की है. मशहूर व्यंगकार जॉर्ज ऑरवेल ने उनके बारे में कहा था कि किपलिंग, ब्रिटिश उपनिवेशवाद के सबसे बड़े पैरोकारों में से एक हैं.



अंग्रेज़ी हुकूमत के वक्त 1878 में ब्रिटिश इंपीरियल फॉरेस्ट स्कूल की स्थापना हुई थी.



दरअसल किपलिंग तो क्या, अंग्रेजी सम्राज्य की उपनिवेशवाद की मंशा को सार्थक रूप देने में जंगल पर राज करना उनके लिए ज़रूरी था. जंगल पर राज करने के लिए इस जंगल को जानना उनके लिए और भी जरूरी था. इसलिए धीरे धीरे पूरे भारत वर्ष के जंगलों को नापने झोखने, एक्सप्लोर करने में अंग्रेजों की मानवीय रुचि ने एक वैज्ञानिक रूप धारण कर लिया. और अंग्रेजों के इस जंगल प्रेम का भव्य “ताजमहल” आज भी फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के रूप में दून की वादी में शान से खड़ा है. लगभग 90 साल पुरानी ये भव्य इमारत, डेढ़ सौ साल पुराना जंगलात का महकमा, पूरे भारत में छितरे सैंकड़ों फॉरेस्ट गेस्ट हाउस दर्शाते हैं कि अंग्रेजों के लिए जंगल कितने महत्वपूर्ण थे.


ब्रिटिश इंपीरियल फॉरेस्ट स्कूल

अंग्रेज़ी हुकूमत के वक्त 1878 में ब्रिटिश इंपीरियल फॉरेस्ट स्कूल की स्थापना हुई थी. इसकी पहली कमान मशहूर जर्मन फॉरेस्टर, डायट्रिच ब्रांडिस ने संभाली थी. सर डायट्रिच ब्रांडिस एक जर्मन-ब्रिटिश वनस्पतिशास्त्री और वानिकी अकादमिक और प्रशासक थे. जिन्होंने लगभग 30 वर्षों तक औपनिवेशिक भारत में ब्रिटिश इंपीरियल फॉरेस्ट्री सर्विस के साथ काम किया था. इस संस्था को खड़ा करने में सर डायट्रिच का बड़ा योगदान रहा है. ये संस्था, खास ब्रिटिश सिविल सेवा के फॉरेस्ट ऑफिसर्स को प्रशिक्षण देने के लिए बनाई गई थी. और फिर ये ऑफिसर्स पूरे भारत भर में महत्वपूर्ण पदों पर तैनाती पाया करते थे.


महकमा पहले बना, रिसर्च और ट्रेनिंग भी शुरू हो गई पर संस्थान की अपनी इमारत और कैंपस, दोनो 1929 में बन कर तैयार हुए. और जब इमारत तैयार हुई तो ऐसी, कि भव्यता के मामले में बेमिसाल निकली. उस समय के वायसरॉय, लॉर्ड वॉलिंगडन ने इसका उदघाटन किया था.


दूर दूर तक एकड़ों में फैली हरी घास के बीचों बीच खड़ी, लाल पकी ईंटों से बनी FRI देहरादून की पूरी इमारत, एक खूबसूरत दृश्य पैदा करती है. एक वक्त था कि इस इमारत का नाम गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दुनिया की सबसे बड़ी रेड ब्रिक बिल्डिंग के रूप में शामिल था. आज ये इमारत हमारे देश की एक महत्वपूर्ण नेशनल हेरिटेज साइट है.


डायट्रिच ब्रांडिस

FRI और भारत के जंगलों का जिक्र इस महान फॉरेस्टर के बगैर अधूरा है. ब्रांडिस ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण 30 साल भारतीय जंगलों को दिए. 1864 में ब्रांडिस, को भारत का इंस्पेक्टर जनरल ऑफ फॉरेस्ट्स बनाया गया था. बॉटनी और वानिकी में उनकी महारथ थी. उन्होंने भारतीय टीक पर बेहतरीन काम किया था. टीक की क्वालिटी, वॉल्यूम, रेट ऑफ़ ग्रोथ पर उन्होंने शोध किया. टिंबर की खरीद फ्रोख्त की नियमावली बनाई. टीक के संरक्षण हेतु कन्वर्जेनसीज़ बनवाईं. अपने इन तमाम अनुभवों के कारण ही ब्रांडिस, 1865 के भारतीय वन अधिनियम (Indian Forest Act) को ड्रॉफ्ट करने में सफल हुए. राजपूताना से लेकर मैसूर तक, कुर्ग से लेकर गारो खासिया की पहाड़ियों तक ब्रांडिस ने भारतीय जंगलों को माप लिया था, वहां की फ्लोरा फौना, वनस्पति, पेड़ों, वन्यप्राणियों को पढ़ लिया था. आज हमें इक्कीसवीं सदी के हिसाब से ये सुनकर सब बड़ा आसान लग सकता है पर 150 साल पहले के भारत में ये ज़रूर एक जोख़िम भरा रोमांचक कार्य रहा होगा. वनप्रेमी ब्रांडिस काफ़ी समय तक बालाघाट स्थित फॉरेस्टर ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट के प्रिंसिपल भी रहे. रिटायरमेंट के बाद भी, वन, ब्रांडिस के जीवन से जुड़े रहे. उन्होंने इंडियन ट्रीज़ नाम की एक मुक्कमल किताब लिखी. इस किताब में उन्होंने पेड़ों की 4400 किस्म की प्रजातियों का ज़िक्र किया है. ये किताब पहली बार 1906 में प्रिंट हुई थी और 1971 में आखरी बार.



ये संस्था, खास ब्रिटिश सिविल सेवा के फॉरेस्ट ऑफिसर्स को प्रशिक्षण देने के लिए बनाई गई थी.



आज़ाद भारत में आज हम कह सकते हैं कि अंग्रेजों का पर्यावरण प्रेम, शायद अंग्रेज़ी उपनिवेशवाद का ही दूसरा रूप था. अंग्रेज़ी उपनिवेशवाद की अर्थव्यवस्था और एजेंडा को लैंड रेवेन्यू, खनन और जंगल तीनों की ही ज़रूरत थी. इस ज़रूरत को पूरा करने के लिए उन्होंने साम, दाम, दण्ड, भेद और जंगल का खूब प्रयोग किया. इस ज़रूरत को नियम, जंगल प्रेम और संरक्षण का चोगा पहनाया. जहां तक भारत में उनका साम्राज्य फैला, उसके इस फैलाव में, पुलिस और प्रशासन के साथ साथ जंगलात का महकमा भी फैलता गया. भारत के हर कोने में जैसे पुलिस चौकियां और पुलिस स्टेशन बनाए गए, उसी तरह फॉरेस्ट की अपनी रेंज और रेस्ट हाउसेस भी बनाए गए. आज भी कई पुरानी भारतीय फिल्मों में दिखाई जाने वाली प्रेम कहानियां इन फॉरेस्ट डाक बंगलों में सांस लेती दिख जाएंगी. इन फॉरेस्ट रेस्ट हाउसेस के “चौकीदार” इन कहानियों के अहम किरदार हुआ करते थे.


ट्रैवल अनलॉक्ड





लॉकडाउन के बाद जो पहला मौका मिला, हमने वनों का रुख किया. दुधवा, राजाजी नेशनल पार्क और देहरादून स्थित FRI यानी फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट की सैर कर आए हैं. इन वनों ने जैसे अंग्रेज़ हकीमों को अपने सम्मोहन में बांधा था, कुछ वैसा ही हमें भी बांध लिया है. जंगल जंगल की बात चली है तो अगली बार, फिर एक बहुत ही रोमांचक किस्सा सुनाऊंगी. एक जानने लायक, खास शख़्स से मिलवाऊंगी. तब तक के लिए बावरे और जंगली हुए मन को इजाज़त दीजिए…


(नोट- लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी है.)


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: February 27, 2021, 9:18 AM IST
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