बावरा मन : शाहदौले के चूहे!!

नानी की याददाश्त कमज़ोर होती जा रही थी. किस्से सुनाने की उनकी क्षमता क्षीण. उधर उनका सुनाना कम हुआ, इधर मेरा भूलना शुरू हुआ. लेकिन कभी-कभी होता है ना, कोई बात, कोई शब्द, कोई घटना….हमें उन किस्सों की याद दिला जाती है. एक दिन मेरे साथ भी यही हुआ. उधर कहीं 'करण-अर्जुन' का डायलॉग गूंजा, 'मेरे करण अर्जुन आएंगे, जरूर आएंगे'. इधर मुझे किस्सा याद आया, ‘प्रीतू आएगा, चीं चीं करता आएगा.'

Source: News18Hindi Last updated on: July 12, 2020, 12:35 PM IST
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बावरा मन : शाहदौले के चूहे!!
मान्यता ये भी है कि पहला बच्चा 'चूहे' सा होता है. छोटे सिर वाला, बेडौल शरीर वाला
क्या है ना, नानी के गांव के एक रिश्ते में जीजा थे. 'भाई प्रीतम दास' उर्फ 'पाईया प्रीतम.' लाहौर में अच्छी सरकारी नौकरी थी. घर में किसी चीज़ की कमी न थी. अच्छा घर, एक अदद बीवी और अल्लाह के फ़ज़ल से पांच बेटे भी थे. हां, लेकिन थे सब एक से बढ़कर एक शैतान और खुराफ़ाती. पढ़ने लिखने से कोई मतलब ही नहीं था. जीजा जी बेचारे सीधे थे, परेशान रहते थे. पता नहीं बीवी बच्चों की इस परेशानी से, या फिर नौकरी के बोझ से तंग आकर, एक दिन इस्तीफ़ा दे आए. दफ़्तर वालों ने समझाया, रिश्तेदारों ने समझाया. अड़े रहे कि नहीं, अब 'आज़ाद हिंद फौज' ज्वाइन करूंगा. 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी', का नारा शायद उन्हें अपनी निजी आज़ादी का भी रास्ता दिखा रहा था. सो एक दिन वह आज़ाद हो ही गए. गायब हो गए. सचमुच INA ज्वाइन कर ली थी.

रोती पीटती बीवी, पांच बेटों को लेकर मायके के गांव आ गई. मायके वाले उन्हें अपने घर पनाह नहीं देना चाहते थे. कहीं अपने ही घर के बाल बच्चे, उनकी सोहबत में बिगड़ न जाएं, इसलिए अपने घर से जरा दूर, एक घर किराए पर दिलवा दिया. पूरे गांव में पांचों बेटों का सामुदायिक नाम पड़ गया 'पंज-प्यारे'. इस 'प्यारे' नाम के पीछे गांव वालों का तंज भी छुपा था, क्योंकि पांचों बेटों में कुछ भी प्यारा नहीं था.

बड़े शहर से आए पांच बेटों को गांव की जिंदगी थोड़ी-थोड़ी रास आने लगी थी. तीतर बटेर का कभी शिकार करते. कभी मुर्गियां कबूतर पालते. फालतू के सारे कामों में व्यस्त रहते. गली-गली आवारा फिरते, ख़ाक उड़ाते. ऐसे में एक दिन गांव में 'शाहदौले' का एक 'चूहा' आया. एक मदारी टाइप आदमी के हाथों रस्सी से बंधा, एक 'चूहे' जैसा दिखने वाला 'बेडौल' इंसान. अजीब शक्ल, अजीब आवाज, अजीब कपड़े और अजीब ही हरकतें.

मदारी कहता, इस अजीब 'चूहे' से इंसान में भी बड़ा हुनर है. जो कहता है, सो हो जाता है. पांचों बेटों ने भी अपना भाग्य आज़माया. पूछा पिता कब तक लौटेंगे? मदारी ने पिता का नाम पूछा. नाम बताया 'प्रीतम दास'. अब सारे मजमे की निगाहें टिकी थी उस करामाती 'चूहे' पर. 'चूहे' की वाणी में 'प्रीतम दास' का भविष्य छुपा था. 'चूहे' को भी समझ कुछ ज्यादा आ नहीं रहा था. पर उसे कुछ तो कहना है, ये समझ आ रहा था. मदारी को भी धुकधुकी हो रही थी कि कमाई का अवसर न निकल जाए. उसके जान में जान आई, जब 'चूहा' कुछ बोला. धीरे से बोला. और ऐसा बोला कि सिर्फ़ मदारी को ही समझ आया.
'प्रीतू आएगा, चीं चीं करदा आएगा'...
पूरे गांव को, उस दिन का ब्रह्म वाक्य मिल गया था. हर एक के मुंह चढ़ गया था.
'प्रीतू आएगा, चीं चीं करदा आएगा.'लेजेंड
दरअसल, पाकिस्तान के गुजरात में 'दौलेशाह' की दरगाह है. कहते हैं, यहां मन्नत मांगी जाए तो बेऔलादों के यहां भी बच्चा हो जाता है. फिर पहला बच्चा दरगाह पर चढ़ा दिया जाता है. घर पर नहीं रखा जाता. मान्यता ये भी है कि पहला बच्चा 'चूहे' सा होता है. छोटे सिर वाला, बेडौल शरीर वाला…..अब ये विषय पेचीदा है. अंग्रेजों के ज़माने से लेके अबतक इन 'चूहे' जैसे बच्चों पर कई रिसर्च हुईं हैं.

इंसानी 'चूहों' पे रिसर्च

1866 में जोहन्सटन, जो कि लुधियाना के सिविल असिस्टेंट सर्जन थे, उन्होंने इन 'चूहों' पर अध्ययन किया और इस कुरूपता (deformity) को 'Trigonocephalous' का नाम दिया. 1879 में जनरल एलेक्जैंडर कनिंघम शाह दौले की दरगाह पर गए और वहां उन्होंने 14 'चूहे' पाए, बाकी के 'चूहे' अपने फकीरों के साथ उस समय भिक्षा टूर पर थे.

हैरी रिवेट-कार्नैक (Harry Rivett-Carnac) ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि कुछ बच्चे जन्म से इस तरह पैदा होते हैं और कुछ को बना दिया जाता है. उनको 'चूहे' की शक्ल देने के लिए, सर बांध दिए जाते थे जिस से वो बेडौल हो जाएं. 1884 में लाहौर ल्यूनैटिक एसाइलम (Lahore Lunatic Asylum) के सुपरिंटेंडेंट ग्रे और बाद में विलियम सेंटर ने माना कि ये बच्चे बिल्कुल लंदन के 'पागलखाने' में पाए जाने वाले उन बच्चों की तरह हैं जो माइक्रोसिफली (Microcephaly) के शिकार हैं.

लेकिन, इन 'चूहों' पे अगर सबसे ज़्यादा किसी ने काम किया तो वो थे कैप्टन एवेंस और कर्नल ब्राउन. एवेंस, लाहौर के पागलखाने के सुपरिंटेंडेंट थे और ब्राउन, पंजाब के सिविल अस्पतालों के ऑफिशिएटिंग इंस्पेक्टर जनरल. मई 1902 में ये दोनों शाहदौले की दरगाह पे गए और वहां मौजूद 12 'चूहों' से मुलाक़ात की और पाया कि 'चूहे' पागल नहीं, डिफरेंटली ऐबलड हैं. कुछ का भाषा ज्ञान अच्छा था,
कुछ समझदारी से अपनी साफ़ सफ़ाई का पूरा ध्यान भी रखते थे. एवेंस की स्टडी में जो सबसे महत्वपूर्ण बात निकल कर आई वो थी, कि ये प्रथा उस ज़माने में शुरू हुई थी जब कोई संरक्षण गृह नहीं हुआ करते थे.

इस तरह के बच्चों को चूंकि परिवार वाले संभालने में अक्षम हुआ करते थे.
इस तरह के बच्चों को चूंकि परिवार वाले संभालने में अक्षम हुआ करते थे.


इस तरह के बच्चों को चूंकि परिवार वाले संभालने में अक्षम हुआ करते थे, गरीबी भी थी, इसलिए समाज से अलग कर दिया जाता था. दौले शाह इन समाज से निष्कासित हुए बच्चों को सहारा देते थे. एवेंस के अनुसार इन 'चूहों' के लिए समाज और पागलखाने से कहीं ज़्यादा सुरक्षित, दरगाह का माहौल था. यहां वो लोगों की नजरों में भी थे. एवेंस के अनुसार आर्थिक तंगी के चलते कई बार इन 'चूहों' को फ़कीर के साथ भिक्षा टूर पे जाना पड़ता था.

कुल मिला कर, फिज़िशियन्स, एंथ्रोपोलॉजिस्ट्स, एथनोग्राफर्स, सामाजिक संस्थाओं ने इन 'चूहों' पे बहुत काम किया है. चाइल्ड एब्यूज़ और ह्यूमन राइट्स की बातें और जांचे भी हुईं. सरकारी कोशिशें हुईं. पर जनाब, आस्था तो आस्था है. आज भी लोग दूर-दूर से बड़ी आस्था से इन इक्कादुक्का 'चूहों' से आशीर्वाद लेने और इस दरगाह पर सजदा करने आते हैं…..खैर, बचपन में नानी की 'चूहे' वाली कहानी, जो मुझे बिल्कुल फिक्शन लगती थी, रिसर्च करने पर सच साबित हुई. सर्च करने से ये भी पता चला कि 'मंटो' की एक प्रसिद्ध कहानी भी है इन चूहों पर.

बहरहाल प्रीतमदास...
सन् 1947 से कुछ पहले, एक दिन सिर पर किट-बैग रखे, 'पाइया प्रीतमदास' बेहाल, बदहवास, हालत में गांव में नज़र आया. अपनी 'शारदा' को ढूंढता (बीवी का नाम). गली मोहल्ले में फिर एक बार गूंज उठा, 'प्रीतू आया, चीं चीं करता आया'.

….और 'पंज प्यारे'??

पार्टिशन के वक़्त पांचों बेटों में से एक, सबसे बड़ा, रहा होगा कोई 17-18 बरस का, 'कुमार', 1947 में अपने कुछ दोस्तों के साथ, उधर से एक लड़की, सलमा को भगा करके हिंदुस्तान ले आया था. फ़िरोज़पुर, दिल्ली और फिर आगरा. रिश्ते के एक मौसा जी जो पुलिस में थे और लड़कियों की बरामदगी के लिए रिकवरी ऑफिसर लगे हुए थे, उन्होंने बहुत समझाया इस लड़की को वापस भेज दो. 'कुमार' कहे, शादी करूंगा. खैर, प्यार के दुश्मन, रिकवरी ऑफिसर, मौसा जी ने सलमा को रिकवर कर आखिर पाकिस्तान भिजवा ही दिया. इस तरह कुमार की '1947- अ लव स्टोरी' का अंत हुआ.

क्या है न….आज मेरा बावरा मन इन 'सदियों' में आगे पीछे करता जान गया है कि, इतिहास बनता है, इतिहास बनाने वालों से. किस्से बनते हैं, आम इंसानों से. फिर चाहे वो आम इंसान 'सीधा सरल प्रीतमदास' हो, प्यार में पागल 'कुमार' हो या फिर बेडौल 'चूहों' सा नादान हो.

विशेष - चूंकि ये बिल्कुल सच्चा किस्सा है, निजता का ख्याल रखते हुए किरदारों के नाम बदल दिए गए हैं.
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: July 11, 2020, 8:04 AM IST
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