बावरा मन : पुलिस और घोड़ा, एक अटूट दोस्ती!

यूपी पुलिस में तकरीबन बाइस साल बाद घुड़सवार पुलिस कर्मियों की भर्ती हुई है. सालों से चली आ रही "फेस आऊट" करने की योजना के विपरीत, घुड़सवार पुलिस को पुनः एक नई ऊर्जा से भरने की ये एक नई कोशिश है. ये कोशिश कामयाब हो. घुड़सवार पुलिस अपना पुराना जलवा फिर कायम कर सके. पुलिस और घोड़ों की दोस्ती बनी रहे.

Source: News18Hindi Last updated on: December 4, 2021, 11:55 PM IST
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बावरा मन : पुलिस और घोड़ा, एक अटूट दोस्ती!

दौड़ा दौड़ा दौड़ा घोड़ा, दुम उठा के दौड़ा!


और कल वो मुझसे बोला…


“मेरा नाम ऊदल है और मैं एक घोड़ा हूं. वो भी एक पुलिस वाला घोड़ा. घुड़सवार पुलिस कर्मी जब मुझ पे बैठ के शहर में गश्त करने निकलते हैं, वर्दी की छवि ही बदल जाती है. जहां बाइक पर सवार पुलिस कर्मी को देख लोग कन्नी काट जाते हैं, वहीं मेरे ऊपर बैठे पुलिस कर्मी को देख लोग मुस्कुराते हैं. मेरे साथ फोटो, सेल्फी लेना चाहते हैं. ख़ास तौर पर बच्चे. बच्चे तो मुझे देख मस्त हो जाते हैं.


मुझे तो लगता है कि मेरी मोजूदगी से पुलिस विभाग की छवि और बेहतर होती है. अब आप सोचेंगे, “अच्छा बच्चू, अपने पर इतना दंभ?” पर ये सच है. कसम से!! यकीन न आए तो इस बार के पुलिस वीक में देख लीजिएगा, पुलिस वीक की बड़ी परेड में इतने लोग सीएम और डीजीपी😉 को देखने नहीं आते जितने पुलिस वीक के हॉर्स एंड डॉग शो में हमारे करतब देखने आते हैं.”🐴


बावरा मन, टकबक टकबक

बस क्या है ना,  बावरा मन ऊदल पर अटक गया. इस पुलिसिया घोड़े पे दिल आ गया. दरअसल, हमारे शहर में कल एक राइडिंग क्लब खुला है. ये राइडिंग क्लब अनूठा है क्योंकि ये राइडिंग क्लब पुलिस विभाग ने अपने एमपी ग्राउंड में खोला है. एमपी यानि माउंटेड पुलिस. ये राइडिंग क्लब एक कोशिश है आम जनता और पुलिस के दरम्यान के फासले को कम करने की. दोस्ती कायम करवाने की. इस कोशिश में बड़ा रोल होगा, पुलिस के घोड़ों का.


पुलिसिया घोड़े

पुलिस में माउंटेड पुलिस यानि घुड़सवार पुलिस का अपना एक इतिहास है. एक ज़माना था जब शहर कोतवाल अपने घोड़े पे सवार हो निकलते थे तो शहर भर में पुलिस का इक़बाल कायम होता था. यूं तो पुलिस के इक़बाल का सवारी से नहीं व्यवहार से वास्ता है पर ये भी इत्तेफ़ाक है कि इधर, पुलिस विभाग में सवारियां बदली तो उधर लोगों का पुलिस के प्रति नज़रिया भी बदला.


श्री बीएन लाहिरी, आईपी, आज़ाद भारत में उत्तर प्रदेश के पहले आईजी, अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि जब वो एक युवा कप्तान थे तो उन्होंने अपने लिए एक कार खरीदी थी. एक दिन उसी कार में बैठ वो अपने डीआईजी साहेब को “कॉल ऑन” करने गए. मुलाकात खत्म होने पर जब उनके डीआईजी साहेब उन्हें छोड़ने बाहर तक आए तो उन्होंने कार देखी. ओल्ड स्कूलडीआईजी देखते ही बोले, “तो तुमने भी घोड़ा छोड़ इस कमबख्त मशीन को अपना लिया है?”.


लेकिन समय के साथ, धीरे धीरे घुड़सवार पुलिस का नाता “एक्टिव पुलिसिंग” से कम होता गया, “सेरेमोनियल” ज़्यादा होता गया. लेकिन आज भी जब घुड़सवार पुलिस शहर की सड़कों पर निकलती है तो उसका जलवा अलग होता है.


आज भी पुलिस महकमे में कहा जाता है कि लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति में, जुलूसों और मेलों की ड्यूटी में, पुलिस की मौजूदगी दर्ज कराने में, एक घुड़सवार पुलिस कर्मी, दस पैदल पुलिसकर्मियों के बराबर की पहुंच रखता है. घोड़ा, पुलिसकर्मी को न सिर्फ़ ज़्यादा “मोबाइल” बनाता है बल्कि वो उसे एक गरिमामयी छवि प्रदान करने का काम भी करता है. आज भी लोगों को घोड़ा पुलिस देख एक कोतूहल होता है, सेल्फी खिंचवाने का मौका मिलता है. और इस प्रकार, “डर” के लिए जाने जानी वाली पुलिस, दोस्त पुलिस बनती नज़र आती है.


अंग्रेजों के ज़माने की माउंटेड पुलिस

अंग्रेजों के वक्त घुड़सवार पुलिस ट्रूप मुख्यालय पर रहती थी. घुड़सवार पुलिस गश्त के अलावा अधिकारियों, विशेषकर कमिश्नर, जिला अधिकारी, व पुलिस अधीक्षक को जरूरी डाक पहुंचाने का काम भी करती थी..


रिटायर्ड कर्नल फसीह अहमद साब बताते हैं कि अंग्रेजों के ज़माने में पुलिस अफसरों को उनकी मिलिट्री अटैचमेंट में घुड़सवारी के सारे गुर सिखाए जाते थे. कर्नल फसीह के पिता श्री सिराजुद्दीन अहमद, स्वयं “अंग्रेज़ के ज़माने वाले पुलिस कप्तान” थे और उन्होंने 16 कैवलरी रेजिमेंट से अपनी घुड़सवारी के सारे पाठ पढ़े थे. जब श्री सिराजुद्दीन अहमद उन्नाव, झांसी, बस्ती के पुलिस कप्तान हुआ करते थे, तो वो घोड़े पर ही चलते थे. वो गज़ब के घुड़सवार थे और एक दिन अपने घोड़े पर ही सवार हो उन्होंनेशोले स्टाइलमें हामिद डाकू का उन्नाव से लेकर बंथरा तक पीछा किया और उसे मार गिराया था. बरसों तक उनके इसएनकाउंटरकी चर्चा पूरे इलाके में होती रही.


श्री सिराजुद्दीन अहमद ने, अपने अलंकरण समारोह की परेड में, घोड़े पे बैठ कर ही शिरकत की थी. इस समारोह में उस समय की राज्यपाल सरोजिनी नायडू ने श्री अहमद को आईपी मेडल से नवाज़ा था.


फसीह साब के अनुसार, बीस और तीस के दशक तक यूनाइटेड प्रोविंसेज के सभी छोटे जिलों के कप्तान और कलेक्टर, घोड़ों पर ही चलते थे. सिर्फ़ बड़े जिलों जैसे लखनऊ, के ही अफसरों के पास गाड़ी हुआ करती थी.


बकौल रिटायर्ड डीजीपी उत्तरप्रदेश विक्रम सिंह साहेब





“हमारे समय में कोई भी बंदोबस्त, मेला ड्यूटी, रात्रि गश्त घुड़सावर पुलिस के बगैर पूरी नहीं होती थी. पुलिस में उत्कृष्ट अफ़सर भी वही निकलते थे जो अच्छे घुड़सवार हुआ करते थे. जैसे स्वर्गीय घमंडी सिंह आर्या, श्री के पी श्रीवास्तव, श्री बीपी सिंघल, श्री त्रिनाथ मिश्रा, श्री प्रकाश सिंह आदि.”


अकादमी के अपने घुड़सवारी के इंस्ट्रक्टर्स, नवल सिंह और हनुमान सिंह को याद करते विक्रम सिंह साब कहते हैं कि, “वो असली के पुलिस वाले थे, बेहद रोबीले.” युवा अफसरों की प्रशंसा और डांट के उनके तरीके भी नायब थे.


प्रशंसा करनी हो तो कहते थे, “घोड़े पे बैठ कर क्या खूबसूरत, जवान लग रहे हैं. साहेब ऐसे ही फोटो खिंचवा लो और शादी के प्रपोजल में भेज दो, कोई मना नहीं कर पाएगा.”


और अगर डांट लगानी हो तो कहते थे…”साहेब इतनी कृपा करना, घोड़े पे बैठ कर फोटो न खिंचवाना, मेमसाब तलाक दे देंगी आपको. घोड़े पे ऐसे भौंडे तरीके से बैठे हैं जैसे कोई बुढ़िया बैठी हो घोड़े पे.”


ये वो इंस्ट्रक्टर्स थे जिन्होंने न सिर्फ़ इन पुराने पुलिस अफसरों को घोड़े की लगाम पकड़नी सिखाई बल्कि साफा, सोलह टोपी, पित्थ हैट का फर्क समझाया. जिन्होंने इन्हें घोड़े की सारी चालें सिखाईं. एड़ लगाने के साथ साथ जंप्स के गुर सिखाए. वो बात और है कि शौकीन अफ़सर आगे चल कर नेज़ाबाज़ी भी कर लिया करते थे.


पुलिस की घुड़सवारी की सबसेबुलंदतस्वीर

एक थे पंडित घूरेलाल शर्मा. वो आगरा के थाना फतेहपुर सीकरी के स्टेशन इन चार्ज हुआ करते थे. एक शाम वो गश्त पर बुलंद दरवाज़े की तरफ़ गए थे. वहां कुछ लोग बैठे बीड़ी पी रहे थे. थानेदार साब के बावरे मन में जाने क्या आया उनसे पूछ बैठे, “क्या कभी किसी ने घोड़े पे इन सीढ़ियों को पार किया है?”


बीड़ी पीते लोग चौंक कर बोले नहीं…


पंडित घूरेलाल शर्मा ने तुरंत घोड़े को एड़ लगाई और धीरे धीरे करते बुलंद दरवाज़े की 42 सीढियां चढ़ गए. ये किस्सा आग की तरह पूरे ज़िले में फैल गया. अगले दिन ज़िले के आला अफसरों के सामने ये करतब दोहराया गया. इस बार और सलीके से थानेदार साब ने ये सीढियां चढ़ीं. फिर तो वो एक्सपर्ट हो गए. पूरे ज़िले के हीरो बन गए.


उसके बाद तो आगरा के फतहपुर सीकरी में जो भी सम्मानित महानुभव घूमने आते, उनके सामने पंडित घूरेलाल शर्मा का घुड़सवारी प्रदर्शन निश्चित होता. इस तरह पंडित घूरेलाल शर्मा को प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपति श्री राजेंद्र प्रसाद जी के सामने बुलंद दरवाज़े को जाती उन 42 सीढियां चढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.


ख़ैर, उत्तरप्रदेश पुलिस का सबसे शानदार गौरवपूर्णघोड़ा पल” 1952 में आया था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने एक भव्य समारोह में यूपी पुलिस को पुलिस कलर्स प्रदान किए थे. पंडित नेहरू खुद बहुत अच्छे घुड़सवार थे और इस परेड में वो स्वयं घोड़े पे चढ़ कर शामिल हुए थे.


चलते चलते एक अच्छी खबर

यूपी पुलिस में तकरीबन बाइस साल बाद घुड़सवार पुलिस कर्मियों की भर्ती हुई है. सालों से चली आ रही “फेस आऊट” करने की योजना के विपरीत, घुड़सवार पुलिस को पुनः एक नई ऊर्जा से भरने की ये एक नई कोशिश है. ये कोशिश कामयाब हो. घुड़सवार पुलिस अपना पुराना जलवा फिर कायम कर सके. पुलिस और घोड़ों की दोस्ती बनी रहे.


घुड़सवार पुलिस को बावरे मन की ढेर सारी शुभकामनाएं… धन्यवाद.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: December 4, 2021, 11:55 PM IST
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