बावरा मन: लखनऊ में ब्रास बैंड घराना और महिलाओं की बैतबाजी

जश्ने शहर: अपनी तहजीब और फिजा के कारण ख्‍यात लखनऊ में एक शाम रवायतों के जश्‍न से गुलजार हुई. एक मेले में ब्रास बैंड मुकाबला और महिलाओं की बैतबाजी ऐसे आयोजन थे जिसने श्रोताओं को अपनी परंपरा से जोड़ दिया. आधुनिक होती दुनिया में यह देख कर खुशी ही होगी कि ऐसे आयोजनों के जरिए शहर लखनऊ, आज भी अपनी रवायतों और अपनी महिलाओं का एक कामयाब जश्न मना रहा है.

Source: News18Hindi Last updated on: February 7, 2023, 1:11 pm IST
शेयर करें: Share this page on FacebookShare this page on TwitterShare this page on LinkedIn
बावरा मन: लखनऊ में ब्रास बैंड घराना और महिलाओं की बैतबाजी
लखनऊ के तीनों बड़े ब्रास बैंड संचालक एक ही पुरखे के वंशज हैं.

हर शहर की अपनी एक खास फिजा होती है. हमारे शहर लखनऊ की भी है. और आज अपने इस खास शहर के एक खास मेले में दो बड़ी ही खास चीजें देखने को मिलीं. एक थी ब्रास बैंड काम्‍पीटीशन और दूसरा थी बैतबाजी.


बैंड बाजा बारात

हिंदुस्तानी शादी बिना घोड़ी और बिना बैंड के पूरी नहीं होती. जब-जब सैयां घोड़ी पे सवार होते हैं, उनकी शान में चार चांद लगाते हैं बैंड वाले. शादियों के अवसर पर बैंड बाजा बजते किसने नहीं देखा है पर एक सांस्कृतिक मेले में स्टेज पर बैंड बाजावालों को लाइव परफॉर्म करते देखना, हमारे लिए एक अलग ही अनुभव था. हममें से शायद ही किसी ने ब्रास बैंडवालों से कभी बातचीत की होगी. जब भी शादियों में उन्हें बुक किया होगा, पैसे के मोल भाव पर ही बात हुई होगी उस से आगे की नहीं. लेकिन इस मेले में इन ब्रास बैंडवालों को बाराती के तौर पर नहीं, एक अच्छे ऑडियंस के तौर पर सुनने का शानदार मौका मिला. शहर की तीन ब्रास बैंड टीमों ने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया. इन तीनों ने पांच-पांच मिनिट को परफॉर्म किया और फिर खूब वाहवाही के साथ पूरी महफिल ही लूट ली. इस मौके पर दर्शकों ने पहली बार अपने शहर के ब्रास बैंडवालों का इतिहास जाना.


ब्रास बैंड वालों का इतिहास

यूं तो पूरे हिंदुस्तान में शादियों में बारात का, जुलूस की तरह, बाजे गाजे के साथ निकलना एक आम बात थी पर अंग्रेजों के मिलिट्री बैंड और पुलिस बैंड ने इन बाजे गाजे वालों को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया. अंग्रेजों की बैंड प्रथा उनकी पूरी कॉस्ट्यूम और इंस्ट्रूमेंट्स के साथ, इन देशज बाजे गाजे वालों ने अपना ली. ना सिर्फ इन बाजे गाजे वालों ने लाल कुर्ती वालों की लाल वर्दी अपनाई बल्कि दूसरी तरफ इस नए नवेले बाराती ब्रास बैंड में झांझ, शहनाई के साथ ड्रम, सैक्सोफोन और मराका भी बजने लगा. इस तरह भारत की शादियों में एक अनोखा इंडो वेस्टर्न फ्यूजन नजर आने लगा.


ये बात हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के गुरुओं को रास नहीं आती थी. उन्होंने ब्रास बैंडवालों के फन को पूरी तरह से नकार दिया. एक तरफ़ वो इन बैंडवालों पर पारंपरिक संगीत से छेड़छाड़ का इल्जाम लगाते तो दूसरी ओर आम लोग भी इन पर अंग्रेजी फौजी बैंड की नकल भर होने की हंसी उड़ाते. लेकिन किसी भी आलोचना, हंसी की परवाह किए बगैर ये ब्रास बैंडवाले अपने काम को अंजाम देते रहे. लोगों की खुशियों में चार चांद लगाते रहे.


ये इत्तेफाक ही है कि जहां मुंबई का भेंडी बाज़ार, भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक महत्वपूर्ण घराने के लिए जाना जाता है वहीं इसी भेंडी बाजार के ब्रास बैंडवाले भी मशहूर हैं. शादी के मौसम में यहां के बैंड वाले जहां ओवर बुक्ड रहते हैं, वहीं शादी का मौसम खत्म होने पर ये नानखटाई बनाने का काम करते हैं. इसलिए मुंबई में पुराने लोग इन बैंड वालों को “नान खटाईवाले” भी कह कर पुकारते हैं. जाहिर है रोजगार सबके लिए हर वक्त जरूरी होता है. शादियों वाली मौसमी कमाई कहां साल भर एक घर परिवार चला पाती है? यहां ये भी बता दें कि जहां एक तरफ ये ब्रास बैंड का काम परिवारिक/ पुश्तैनी होने की हैसियत रखता है वहीं बैंड के कुछ सदस्य, अपनी आवश्यकता के अनुसार आते-जाते भी रहते हैं. यही कारण है कि बैंडवाले अक्सर बाकी साल में मेहनत मजदूरी, किसानी भी करते नजर आ जाते हैं.



मास्टर बब्बन के बैंड से आजाद हो कर शागिर्द मास्‍टर इतवारी लाल ने बनाया था ‘आजाद बैंड’.



लखनऊ का ब्रास बैंड घराना

तो जनाब मुस्कुराइए कि अब आते हैं लखनऊ के ब्रास बैंड वालों पर. लखनऊ के ब्रास बैंड समूहों को हम एक्चुअली एक ‘घराने’ का नाम दे सकते हैं. वो इसलिए क्योंकि यहां के तीनों बड़े बैंड या तो एक ही वर्ग विशेष (धानुक समूह) से ताल्लुक रखते हैं और एक ही पुरखे के वंशज हैं, या फिर इनमें से अधिकतर, एक दूसरे से सीख कर ही गुरु शिष्य परंपरा से जुड़े हैं. लखनऊ के ब्रास बैंड वालों की कहानी शुरू होती है मास्टर बब्बन से. कहते हैं मास्टर बब्बन ने ही लखनऊ शहर के पहले ब्रास बैंड की नींव रखी थी. नींव क्या रखी उन्होंने तो अपने बैंड को एक महत्वकांक्षी नाम ही दे दिया था- ‘इंटरनेशनल बैंड’.


मास्टर बब्बन सही मायने में एक संगीतज्ञ थे. उन्होंने अपने समय में लखनऊ के प्रसिद्ध भातखंडे संगीत विद्यालय से संगीत की शिक्षा प्राप्त की थी. मास्टर बब्बन के ‘इंटरनेशनल बैंड’ से आजाद हो उनके ही एक योग्य शिष्य मास्टर इतवारी लाल ने लखनऊ शहर को एक दूसरा ब्रास बैंड शुरू कर एक दूसरा विकल्प दिया. इस बैंड का नाम पड़ा, ‘आजाद बैंड’.


कहते हैं एक बार आजाद बैंडवाले इतवारी लाल जी का एक्सीडेंट हो गया था. इस एक्सीडेंट की वजह से उनकी दोनों टांगों में रॉड पड़ गईं थीं. अब इतवारी लाल जी को अपने बैंड में शामिल होने में कठिनाई होने लगी थी. लेकिन जो उनके चाहने वाले थे, वो तो बस उन्हीं को बैंड में सुनना चाहते थे. इसलिए अक्सर इतवारी लाल जी कभी व्हीलचेयर, कभी घोड़े पे तो कभी रिक्शे पे सवार हो, शादियों में अपने बैंड की अगुवाई करते नजर आते थे. उनकी घोड़े और रिक्शेवाली तस्वीरें लखनऊ वालों की शादी की एल्बमों में आज भी देखी जा सकती हैं. आज इन्हीं इतवारी लाल जी से सीख कर उन के दामाद प्रमेश कुमार भी अपना एक अलग ब्रास बैंड संचालित करते हैं. इनके बैंड का नाम है- ‘लक्ष्मी बैंड’.


बैतबाजी


बड़ी लंबी चली है, रातों से बैत-बाजी,

अब उजालों मे फिर, खामोश बैठे है.


उस शाम लखनऊ में फिर बैतबाजी ने अपनी खामोशी तोड़ी और गजब का समां बांधा. बैतबाजी क्या?

क्या आपको मुगल ऐ आजम की याद है? दरअसल, मुगल ऐ आजम में जवाबी शायरी का एक मुकाबला था जो बेहद हिट हुआ था, ‘तेरी महफिल में किस्मत आजमा के हम भी देखेंगे’. इस जवाबी शायरी यानी बैतबाजी को शमशाद बेगम और लता मंगेशकर ने आवाज दी थी.



लखनऊ में बैतबाजी ने अपनी खामोशी तोड़ी और गजब का समां बांधा.



एक समय था जब भरे पूरे संयुक्त परिवार होते थे. अंताक्षरी और पत्ते से घर परिवार के खाली और काम के क्षण बीता करते थे. ऐसे में उर्दू से राबता रखने वाले परिवारों में शेरो-शायरी का और शेरो-शायरी की अंताक्षरी खेलने का चलन था. खासकर महिलाओं में. जल्दी ही बैतबाजी ने घरों की दहलीज लांघ ली, औरतों का दामन छोड़ दिया. स्कूल कॉलेज और स्टेज पर सभी बैतबाजी में भाग लेने लगे. क्या बच्चे, क्या नौजवान और क्या बुजुर्ग. लखनऊ के इस मेले में, कुछ खूबसूरत महिलाओं ने बड़े अदब और बड़ी अदा से इस बैतबाजी की प्रतियोगिता में भाग लिया. मेले की सबसे खूबसूरत शाम इन महिलाओं की जवाबी शायरी और उनकी नफासत के नाम रही. खुशी होती है देख कर कि इस मेले के जरिए हमारा शहर लखनऊ, आज भी अपनी रवायतों और अपनी महिलाओं का एक कामयाब जश्न मना रहा है.


बावरे मन का इन महिलाओं के जज्‍बे को अदबी सलाम. धन्यवाद.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

और भी पढ़ें
First published: February 7, 2023, 1:11 pm IST

टॉप स्टोरीज
अधिक पढ़ें