बावरा मन : 'हरिया रावड़ा'

कुछ आंचलिक किंवदंतियां ऐसी होती हैं, जो बरसों आपके साथ रहती हैं. पीढ़ियों तक आपके साथ चलती हैं. ऐसी ही एक किंवदंती 200 साल से हमारे परिवार के साथ रही. इन 200 सालों में, परिवार कई बार विस्थापित हुआ. कई माइग्रेशन्स देखीं. कई नई आंचलिक भाषाएं अपनाईं. समय का बदलाव देखा. पर यह एक किंवदंती रूपी किरदार, एक कोड वर्ड की तरह, 200 साल, इस सब का भागीदार रहा.

Source: News18Hindi Last updated on: June 27, 2020, 8:13 AM IST
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बावरा मन : 'हरिया रावड़ा'
200 साल से हमारे परिवार में मांओं ने बच्चों को पिता से डराने के लिए इस कोड वर्ड का इस्तेमाल किया था.
छोटे में मां को जब मुझे डराना होता, कहतीं, "एsss, हरिया रावड़ा". 200 साल से हमारे परिवार में मांओं ने बच्चों को पिता से डराने के लिए इस कोड वर्ड का इस्तेमाल किया था. पिता का कोड वर्ड होता था, 'हरिया रावड़ा'. वो भी, ताकि जब पिता घर आएं तो बच्चे शोर शराबा, धमाचौकड़ी न करें इस लिए. (यहां याद रखा जाए कि, एक जमाना था जब पिता, पिता होते थे, आज की तरह दोस्त नहीं…...)

जब मैंने होश संभाला, तो मां ने हरिया रावड़ा की कहानी सुनाई. तब जा के पता लगा कि 'हरिया रावड़ा' तो दरअसल बड़े वीर बहादुर हैं! डराने के नहीं, आदर के पात्र हैं. इसीलिए पिताओं के लिए कोड वर्ड की तरह भी थे. खैर मेरे लिए, 'हरिया रावड़ा' की कहानी तो एक ज़बरदस्त लोक किंवदंती की तरह निकली. वो लोक किंवदंती जिसका एक ऐतिहासिक पहलू भी था. वो पहलू जिसे मनोज कुमार ने 'रंग हरा, हरि सिंह नलवे से' कह के दुनिया के सामने रखा था.

दरअसल, नाना के पूर्वज पेशावर के 'पावकां' गांव के निवासी थे. फ्रंटियर के लंबे गोरे, खूबसूरत नैन नक्श वाले लोग. व्यापार था, कारोबार था, ज़मीनदारी थी, दुकानदारी थी. और हां, घोड़ों पर डाक चलाने की ठेकेदारी भी थी. जी, पहले एक समय था जब घोड़ों पर डाक चला करती थी. घोड़ों पर लादकर यह डाक एक जगह से दूसरी जगह भेजी जाती थी. शेरशाह सूरी के समय से ग्रैंड ट्रंक रोड का, व्यापार और डाक से बड़ा संबंध रहा है. जिसके कारण इस सड़क का बड़ा महत्व है, इस सड़क के बड़े किस्से हैं, बहुत कहानियां हैं. पेशावर से लेकर कलकत्ते तक की बनी इस रोड पर एक बड़े इतिहास का निर्माण हुआ है. इस सड़क को हमारे परिवार वाले 'बादशाही सड़क' कहा करते थे. हमारे परिवार का सदियों से इस सड़क के साथ नाता था. इसी से जीवन, विस्थापन, सब हुआ.

लेकिन ये कहानी उस वक़्त के पंजाब की है, जब महाराजा रंजीत सिंह का उस पर राज हुआ करता था. उनके बहादुर सेनापति हरि सिंह नलवा, रोज़ बहादुरी के नए कारनामे दिखाया करते थे. अफ़ग़ानिस्तान पर उनकी नज़रें थीं. पठानों में उनका खौफ़ बढ़ता जा रहा था. पठानियां अपने बच्चों को डराने के लिए हरी सिंह नलवा के लिए कहतीं, "शssss बेटा, हरिया आया." यानी 'हरिया रावड़ा'. चूंकि हमारे पूर्वज भी उसी धरती के थे, देखा देखी 'हरिया रावड़ा' को उन्होंने भी अपना लिया. और ऐसा अपनाया की आज तकरीबन 200 साल बाद भी, मैं उन्हें याद कर रही हूं.
सरहदी इलाकों में रहने के अपने साइड इफेक्ट्स होते हैं. यहां, कभी न खत्म होने वाले युद्ध चला करते हैं. और फिर अनडिवाइडेड हिंदुस्तान का ये वो इलाका था जो सदियों-सदियों से आक्रमण झेलता आ रहा था. भारतवर्ष में जितने भी विदेशी शासक आए, इन्हीं इलाकों के ज़रिए आए. आज भी देखें तो ये इलाके अस्थिर हैं. इसी अस्थिरता और उथल पुथल से प्रभावित हो, आखिर हमारा पूरा खानदान, अपने पुजारी के परिवार समेत 1830s में माइग्रेट कर गया...



खुद तो विस्थापित हुए ही, साथ ही विस्थापित हुई 'हरिया रावड़ा' की कहानी भी. जो नया स्थान ढूंढा रहने के लिए, वह था पंजाब के रावलपिंडी में 'गुजरखान'. अनडिवाइडेड पंजाब की सबसे बड़ी तहसील हुआ करती थी, गुजरखान. व्यापार का सेंटर था, ग्रैंड ट्रंक रोड पर स्थित था, अमृतसर और पेशावर के बीच की लोकेशन थी. बाद में 'फ्रंटियर मेल' यहीं से होकर दौड़ी. यानी परिवार ने अब पंजाब के इस 'पठोवारी' इलाके में अपनी जड़ें छोड़ दी थींं. हां, डाक का काम यहां भी चालू था.1830s की विस्थापना के बाद, परिवार ने एक और विस्थापना देखी, 1947 में. 'हरिया रावड़ा' अब 'फ्रंटियर मेल' पर चढ़ के, परिवार के साथ गुजरखान से दिल्ली आ गया. मेरा बचपन यूपी में गुज़रा, तो हरिया रावड़ा यूपी तक आया. पर अब, मैंने, हरिया रावड़ा को मुक्ति दे दी है. यानी अपने बच्चों पर उसका इस्तेमाल कभी नहीं किया. न ही ग्लोबल हो चुकी, दुनिया के बाकी कोनों में बैठी हमारी अगली पीढ़ी ही इन्हें जानती है. दरअसल, आज के पिताओं के लिए किसी कोड वर्ड की अब ज़रूरत ही नहीं रही है.
लेकिन एक बात काबिले गौर है. ओरल हिस्ट्री की अपनी अहमियत होती है. मुझे खुशी है कि मेरी मां ने, मेरे बुजुर्गों ने ये किस्से, मुझसे साझा किए और मैं अपनी आने वाली पीढ़ी को आज उनसे जोड़ने की एक कड़ी बन रही हूं. बावरे मन को न पासपोर्ट की ज़रूरत पड़ती है ना वीज़ा की. शायद इसी लिए आज ये मन 'हरिया रावड़ा' के साथ 'उस तरफ' की 'बादशाही सड़क' पर बावरा घूम फ्रंटियर छू आया है. वो 'बादशाही सड़क' जो चार मुल्कों और चार समुदायों के बीच की एक साझी विरासत है.

मुझे खुशी है कि इसी साझी विरासत को संजो के रखने का काम इस समय खैबर पख़्तूनख्वा की सरकार कर रही है. हरिपुर में सिख ख़ालसा लीडर, हरी सिंह नलवा द्वारा बनाए गए किले को अब एक म्यूजियम में तब्दील करने की कवायद चल रही है.
'Disclaimer for prounciation : 'हरिया रावड़ा' (चूंकिये 200 साल से मौखिक चली आ रही कहानी हैउच्चारणज़रा बदला हुआ भी हो सकता है)
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: June 27, 2020, 8:10 AM IST
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