बावरा मन: कुछ पुराने किस्से, कुछ बातें बुजुर्गों की

Bawra Mann: आज उन किस्सों को याद कर एक और बात याद आती है. हमने अपने बुजुर्गों को अपने पुराने गांव, पुराने इलाकों का, बाकी लोगों का ज़िक्र करते तो देखा था पर तल्खियां पालते और तल्खियां बांटते कभी नहीं देखा था. उनकी पुरानी यादों में प्रेम, भाईचारा, खेलकूद, मस्ती की बातें होती थीं. विभाजन की तमाम कड़वी यादों के बीच भी उन्होंने अपनी सोच को उदार और प्रगतिशील ही रखा.

Source: News18Hindi Last updated on: October 16, 2022, 4:49 pm IST
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बावरा मन: कुछ पुराने किस्से, कुछ बातें बुजुर्गों की

परिवार में वो उस समय के सबसे बड़े और सम्मानित सदस्य/ बुजुर्ग थे जिस समय हम नन्हें बच्चों की टोली में हुआ करते थे. उन्हें अपने पर इस बात का फख्र था कि उम्र और कर्तव्यों के निर्वहन के मामले में वो परिवार में सबसे आगे थे. वो कहते थे…


हमसे न पूछ रास्ते घर के

हम मुसाफिर हैं  जिंदगी भर के


और उन्हीं के मुंह से बचपन में सुना था…


चीचोचीच गनेरियां

दो तेरियां, दो मेरियां


चीचो चीच गनेरियां


अविभाजित पंजाब के वक्त उनके रावलपिंडी वाले गांव में जब फेरी वाले गन्ने की कटी गनेरियां बेचने आते थे तो यही पुकार लगाया करते थे,


चीचो चीच गनेरियां, दो तेरियां दो मेरियां.


ये सुनते ही हम बच्चों के मुंह में पानी आ जाता था. गनेरियों का जिक्र करते वो ये भी कहते थे कि “गनेरियां खादियां नहीं जांदिया, ओ चुपियां जांदियां ने” यानी गनेरियां खाई नहीं जातीं, चूसी जाती हैं. खालिस उर्दू शायरी हो, खालिस पंजाबी कहावत हो, उन्हें उर्दू का भी सलीका था और पंजाबियत से भी राबता था. अंग्रेज के ज़माने में अंग्रेजी सीखी थी इसलिए अंग्रेज़ी में भी उनका हाथ मज़बूत था.


दरअसल, पुराने लोग इल्म के बड़े पक्के होते थे. भाषा ज्ञान और विचारों के मामले में भी संजीदा होते थे. उन बुजुर्गों को न जाने कैसे सदियों की बातें याद रहा करती थीं. उनकी बातें, उनके किस्से सुन हम बच्चों को लगता था कि सदियों की बातें करते ये पुराने बुजुर्ग, आगे भी, सदियों हमारे साथ ही रहेंगे. पर ऐसा हुआ नहीं. ना हम बच्चे ही रहे ना ही वो बुज़ुर्ग दुनिया में रहे.


खलती हुई बात तो ये है कि उनकी कोई रिकॉर्डिंग भी नहीं है. एंड्रॉयड फोन जब तक हाथ में आया, उससे पहले ही वो दुनिया से रुखसत हो लिए थे. पर आज के युग में कहीं भी कुछ होता है तो उन बुजुर्गों की कही गई टाइमलेस बातें ज़हन में ज़रूर उभर उभर कर सामने आती हैं. जैसे परिवार के वो सबसे बड़े बुजुर्ग, बक्शी द्वारकानाथ और उनके द्वारा सुनाया हुआ उनके स्कूल के ज़माने का किस्सा… अविभाजित पंजाब का किस्सा.



बेहद असरदार किस्सागो थे बक्शी द्वारकानाथ



घड़ा

गुजरखान रावलपिंडी के रहने वाले बक्शी द्वारकानाथ, बचपन से ही अपनी मर्जी के मालिक थे. ये उनकी अपनी ही मर्जी थी जिसके कारण उन्होंने अपने इलाके के खालसा स्कूल या आर्य समाज स्कूल की बजाए बेहतर शैक्षिक छवि वाले इस्लामिया स्कूल में दाखिला लेना पसंद किया था. उन्हीं के अपने खानदान से, रिश्ते में बड़े भाई, भाई रोशन इसी इस्लामिया स्कूल से पहले पढ़ कर कॉलेज जा चुके थे. इस्लामिया स्कूल की बेहतरीन छवि थी इसलिए ठेठ सनातनी ब्राह्मण परिवार ने भी उन्हें दाखिला लेने की मंज़ूरी दे दी थी. पूरे इस्लामिया स्कूल में जैसे पहले भाई रोशन इकलौते हिंदू छात्र थे, अब इकलौते हिंदू छात्र होने का सौभाग्य बक्शी द्वारकानाथ के नाम हो गया.


इस्लामिया स्कूल के प्रबंधकों ने भी अपनी तरफ़ से इस चार सौ में एक हिंदू छात्र का पूरा ध्यान रखा. उनके लिए अलग से एक नेपाली हिंदू लड़के की और एक अलग घड़े की व्यवस्था की. बहादुर नाम का ये नेपाली लड़का, बक्शी द्वारकानाथ के लिए उस अलग घड़े में पानी भर कर रखता और उन्हें पानी पिलाने का काम करता था.


आज 2022 की सामाजिक दृष्टि से हम कह सकते हैं कि आखिर ज़रूरत ही क्या थी इस घड़े को हिंदू घड़ा और मुस्लिम घड़ा करने की? लेकिन इसी घड़े की कहानी को हम अगर आज से लगभग अस्सी-नब्बे साल पहले के हिसाब से देखें तो लगेगा कि एक बहुसंख्यक संस्थान ने एक अल्पसंख्यक समुदाय के इकलौते नुमाइंदे की धार्मिक सामाजिक मान्यताओं का उस ज़माने में भी कितना ख्याल रखा था.


बक्शी द्वारकानाथ हमारे परिवार के वो बुज़ुर्ग थे जो हम बच्चों को अपने बचपन की इस घड़ेवाली कहानी को सुनाते समय ये कभी भी बताना नहीं भूलते थे कि मुस्लिम बहुसंख्या वालेउस इस्लामिया स्कूल के बच्चों ने उन्हें अकेला हिंदू छात्र जान कभी न तंग किया, कभी न शरारत से उस घड़े में कुछ कंकर पत्थर डाल कर उसे अपवित्र किया. बल्कि दूसरी ओर, वो अपनेअंग्रेज़ी भाषा में लिखे संस्मरणों में कहते हैं:


“I don’t know why I preferred to join the Islamia High School being the only non muslim, but with all this there was no discrimination between hindus and muslims and I had a very glorious time in the company of Muslim staff and students.”


वो आगे जानकारी देते हुए लिखते हैं कि इस स्कूल के प्रिंसिपल कानाम मोहम्मद अब्दुल्लाह था. इस स्कूल का संचालन अंजुमन हिमायते इस्लाम लाहौर करता था.स्कूल में पैंतालिस मिनट का एक पीरियड धार्मिक शिक्षा का होता था और इस पीरियड के लिए भी बक्शी द्वारकानाथ अपने संस्मरण में लिखते हैं:


“I used to attend religious period “Dinayat” with rapt interest and learnt much about the Islam religion. The maulvi of the “Dinayat” was from Bengal, Hayatul Haq who wore a white kurta with a coloured tehmat”


और वो पान खाया करते थे


रावलपिंडी के इस ठेठ पोठवारी पंजाबी इलाके में पान खाने/ चबाने का रिवाज़ बिलकुल भी नहीं था. ऐसे में स्कूल में इन बंगाली पान कद्रदान को देखना, बक्शी द्वारकानाथ और बाकी के बच्चों के लिए एक अनोखा अनुभव रहा होगा क्योंकि वो हम बच्चों को समझाते कहते थे, “रिवायतें धार्मिक कि बजाए भौगोलिक ज्‍यादा होती हैं.”


गुजरखान के स्कूल


गुजरखान अविभाजित पंजाब सूबे की सबसे बड़ी तहसील थी. गुजरखान जीटी रोड पर बसा एक महत्वपूर्ण कारोबारी शहर था. बक्शी द्वारकानाथ यहीं के इस्लामिया स्कूल में पढ़े जबकि उनके छोटे भाई बक्शी कंवलनैन ने वहीं के खालसा स्कूल से अपनी पढ़ाई की. खालसा स्कूल के टीचिंग स्टॉफ का ज़िक्र करते बक्शी द्वारकानाथ अपने संस्मरण में कहते हैं: “गुजरखान के खालसा स्कूल में उस वक्त बेहतरीन उच्च कोटि का टीचिंग स्टाफ था और वहां के हेड मास्टरसाहब सिंह थे.”


तीसरे सब से छोटे भाई श्रीराम बक्शी का “सनातन धर्म स्कूल”में दाखिला करवाया गया जबकि सबसे छोटी बहन कृष्णा का दाखिला “आर्य समाज स्कूल” में हुआ. बाद में द्वारकानाथ बक्शी ने इस्लामिया स्कूल गुजरखान से पढ़ाई पूरी करने के बाद रावलपिंडी के डीएवी इंटर कॉलेज से एफए और रावलपिंडी के ही गॉर्डन कॉलेज से बीए की पढ़ाई पूरी की. बाकी के भाई बहनों ने अपनी स्कूली और कॉलेज की पढ़ाई विस्थापना के बाद इधर के पंजाब आ कर पूरी की. पर ये वो स्कूली किस्से थे जिन्हें हम बच्चे सुनते हुए बड़े हुए थे. हम छोटे बच्चे उन अनेक पंथों के स्कूलों का यूं जिक्र सुन अचंभित हो जाते थे.


एक और बात


आज उन किस्सों को याद कर एक और बात याद आती है. हमने अपने बुजुर्गों को अपने पुराने गांव, पुराने इलाकों का, बाकी लोगों का जिक्र करते तो देखा था पर तल्खियां पालते और तल्खियां बांटते कभी नहीं देखा था. उनकी पुरानी यादों में प्रेम, भाईचारा, खेलकूद, मस्ती, नेज़ाबाज़ी, तीतर बटेर पालने की बातें होती थीं. विभाजन के दौर का ज़िक्र भी बक्शी द्वारकानाथ यूं करते थे मानो वो और उनका पूरा परिवार जीवन का सबसे बड़ा एडवेंचर पूरा कर इस तरफ के पंजाब आए हुए हों.


विभाजन की तमाम कड़वी यादों के बीच भी उन्होंने अपनी सोच को उदार और प्रगतिशील ही रखा. आज भी जब कभी समुदायों के बीच तनाव देखती हूं और मेरे मन में कभी तल्ख विचार नहीं आते तब सोचती हूं शायद ये बचपन के उन्हीं किस्सों का नतीजा है कि मैं नफरत नहीं कर पाती हूं. बक्शी द्वारकानाथ को सारी उम्र एक ही मलाल रहा कि विभाजन की त्रासदी में वो आखरी बार अपने पिता को भी नहीं देख पाए. वो बात और है कि पिता के ना रहने पर उन्होंने अपने बड़े होने के सारे फर्ज निभाए. परिवार को पढ़ाया लिखाया, काबिल बनवाया. एक अच्छे “बड़े” साबित हुए.


मुझे मलाल इस बात का है कि काश उस ज़माने में एंड्रॉयड फोन होता तो उनके किस्सों को मैं उनकी जुबानी ही सबको सुना पाती. वो बेहद असरदार किस्सागो थे. अच्छी बात ये है कि उनके अपने हाथ से लिखे संस्मरण के कुछ पन्ने कनाडा से उनके पुत्र ने मुझे व्हाट्सएप किए हैं. बावरा मन उन संस्मरणों में छुपे किस्से और उन किस्सों में छुपी नैतिकता को, आगे भी, आप तक लाने की कोशिश करता रहेगा.


धन्यवाद

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: October 16, 2022, 4:49 pm IST

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