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बावरा मन: हसन शाह और खानम जान का इश्क सूफियाना

यूं तो हिंदुस्तान में दास्तान कहने का रिवाज़ बड़ा ही पुराना है. लेकिन, दास्तान लिख के, आने वाली पुश्तों के हाथ सौंपने की रवायत, ज़रा कम ही रही है. ऐसे में हसन शाह, ना सिर्फ़ अपने जीवन की कहानी/अपनी प्रेम कहानी दुनिया से छुप कर कलमबंद करते रहे बल्कि वो उस दौर की तस्वीर भी हमारे सामने रखते रहे. पिछले हफ़्ते आप खानम जान से सती चौरा घाट पर मिले थे, आज हसन शाह को जानिए…

Source: News18Hindi Last updated on: May 28, 2022, 1:16 PM IST
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बावरा मन: हसन शाह और खानम जान का इश्क सूफियाना
हसन शाह ने अपने प्रेम की दास्तान को कागज़ पर उतार दिया था.

वैसे सवा दो सौ साल पहले हसन शाह ने दो अच्छे काम किए थे. एक, उसने टूट के प्रेम किया था और दूसरा, उसने अपनी उस प्रेम की दास्तान को कागज़ पर उतार दिया था.


यूं तो हिंदुस्तान में दास्तान कहने का रिवाज़ बड़ा ही पुराना है. लेकिन, दास्तान लिख के, आने वाली पुश्तों के हाथ सौंपने की रवायत, ज़रा कम ही रही है. ऐसे में हसन शाह, ना सिर्फ़ अपने जीवन की कहानी/अपनी प्रेम कहानी दुनिया से छुप कर कलमबंद करते रहे बल्कि वो उस दौर की तस्वीर भी हमारे सामने रखते रहे. पिछले हफ़्ते आप खानम जान से सती चौरा घाट पर मिले थे, आज हसन शाह को जानिए…


हसन शाह की पृष्ठभूमि 


एक समय था जब रोहिलखंड में रोहिल्ला पठान हफीज़ रहमत खान की तूती बोला करती थी. हफीज़ रहमत खान अच्छे शासक थे. जनता में सब तरफ अमन-चैन था. कारोबार चल रहा था. लेकिन ये अमन चैन ज़्यादा न चला.


यह भी पढ़ें: बावरा मन: हसन शाह का इश्क सूफियाना- पार्ट-1


राजपाट है. राजपाट के मसले बड़े होते हैं. कभी किसी से दोस्ती कभी किसी से दुश्मनी. इधर संधि और उधर युद्ध. अगर इधर रोहिल्ला पठानों ने बरेली और बदायूं से मुगलों का बिस्तर गोल किया तो उधर अवध के नवाब, अंग्रेजों से मिल कर रोहिल्लाओं पर ही चढ़ बैठे. देखते देखते रोहिलखंड, अब अवध में मिल गया था.


क्या है ना, हिंदुस्तान, रियासतों में बंटा हुआ था ऐसे में कंपनी की मौज हो रही थी.


ख़ैर, दो रियासतों की आपसी लड़ाई में, आपसी रंजिश में, सिर्फ दो ही पक्ष नहीं होते हैं. एक तीसरा पक्ष भी होता है. शासकों की खिदमत में लगा पक्ष. शासकों की खिदमत से, उनके साथ दिखने में, यह तबका अपनी शान समझता है. इस तबके में शासकों के सिपहसालार होते हैं, मुंशी, वैद्य हकीम, महल किले के कारिंदे, राजकाज से जुड़े हुए लोग होते हैं. मनोरंजन में लगे संगीतज्ञ और हरम की महिलाएं भी होती है. ये सब लोग धर्म और जाति से ऊपर, सत्ता सुख की वजह से, शासकों के साथ होते हैं. अब सवाल यह है, कि जब एक शासक का तख्तापलट होता है तब इन खिदमतगारों का, इन हारे शासकों से जुड़े तबके का, क्या होता है. आखिर उन पर क्या गुजरती है?


… इनमें से कुछ वफादार लोग, नए शासक की फौजों के हाथ मारे जाते हैं

…कुछ अपनी वफादारी तुरंत बदल लेते हैं, नए शासक के मुरीद हो जाते हैं.

…लेकिन कुछ मुट्ठी भर ऐसे भी होते हैं जो नई व्यवस्था में फिट नहीं बैठते, दर बदर हो जाते हैं. अपने लिए नई मंजिल, नए मालिक की खोज में निकल लेते हैं.


रोहिलखंड से जाजमऊ


रोहिल्ला नवाब की हार और रोहिलखंड के अवध में मिलने के बाद “हकीम मीर मोहम्मद नवाज़” भी नए रोज़गार की तलाश में निकल लिए थे. बुज़ुर्ग थे, पढ़े लिखे सम्मानित हकीम थे. उन्होंने सुन लिया था कि ईस्ट इंडिया कंपनी के फौजी दस्ते “Cawnpore” में गंगा किनारे एनकैंपमेंट कर रहे हैं. अंग्रेज़ी फौजों के इन कैंपों में फारसी जानने वालों की, पढ़े लिखे इल्मी लोगों की वहां ज़रूरत थी.


अंग्रेज़ की नौकरी


हकीम साब अपने दो नातियों को लेके कानपुर आ गए थे. कानपुर के कस्बे जाजमऊ में, गंगा किनारे अपना बड़ा सा घर बना लिया था. मेंबर काउंसिल, कैंप Cawnpore के मिंग साहेब (Manning) के यहां मुंशी हो गए, उन्हें फारसी सिखाने लगे थे. उस ज़माने में फ़ारसी का ज़ोर था. फारसी ही कामकाज की भाषा थी.


अब साहब आप गौर कीजिए, हकीम साब के अपने पिता  “बलख” से आए थे और मुगलों के दरबार में काम करते थे. खुद हकीम साब ने रोहिल्ला नवाबों के महल में इज़्ज़त की नौकरी की थी. लेकिन अब चूंकि वक्त का तकाज़ा था, अंग्रेज़ कंपनी का बोल बाला था. इसलिए हकीम साब भी मुगलों/नवाबों को छोड़, अंग्रेज़ की नौकरी में ही अपनी भलाई समझने लगे थे.


लेकिन कहानी इन हकीम साहब की नहीं है, ये कहानी तो उनके नाती, हसन शाह की है. हसन शाह के प्रेम की है. उस हसन शाह की है जो आगे चल इन सभी हाकिमों को छोड़, प्रेम की गंगा में बहता चला गया. उसने अपनी दास्तान खुद बनाई. और अपने लिए अपनी एक नई “सरकार” चुनी.


गंगा का किनारा और जाजमऊ


कानपुर में गंगा किनारे, दूर दूर तक फैले वीराने में कंपनी के फ़ौजी दस्तों की चहल पहल होने लग गई थी. हकीम साब जाजमऊ में गंगा किनारे वाले अपने घर से मिंग साब के यहां काम पे, घोड़े पर जाया करते थे. युवा मिंग, हकीम साब से कुछ दिन तो फारसी सीखते रहे लेकिन फिर बोर हो गए. उन्हें अपने बुजुर्ग मुंशी की सोहबत की जगह, अपने पड़ोसी कल्लन साब की रंगीन महफिलों से मोहोब्बत हो चली थी. नाच, गाना, रंग महफिल, हुक्का और शतरंज में मन रमने लगा था. युवा मिंग अपनी इस महफिली मसरूफियत में, अपने घर की देखरेख हकीम साब को सुपुर्द कर देना चाहते थे. पर बुजुर्ग हो चुके हकीम साब ने ऐसे माहौल से तौबा करते हुए मिंग साब को साफ़ कहा कि “ये काम अब उनसे ना हो पाई”.


इस तरह मिंग साहेब के यहां उनकी जगह ली, उनके नाती हसन शाह ने.


हसन शाह


हसन शाह भी काबिल नौजवान था. लिखने पढ़ने का शौकीन था. स्वभाव से शर्मिला परंतु उसूली नवयुवक था. शरीफ़ और बेहद ज़हीन. वो ईमानदारी से मिंग साब के सारे खर्च, हिसाब किताब देखा करता. दोनों में उम्र का फासला कम होने की वजह से मिंग साब और उसमें कुछ दोस्ती, कुछ बेतकुलफ्फी और कुछ लिहाज़ का सा रिश्ता कायम हो गया था. मिंग साब को हसन शाह पर भरोसा होने लगा था. इधर जो काम नाना न कर पाए, हिचकिचाते हुए ही सही अब हसन शाह करने लगा था.


पहले अनमने से और फिर मन से, उसे इस नई जिंदगी में मज़ा आने लगा था. ऊपर से तो वो दिखाता कि उसे कल्लन साब और मिंग साब के लिए काम करने वाले ये “कमतर गाने बजाने वाले” लोग बिलकुल पसंद नहीं हैं. पर आते जाते जब उसका उनके साथ उठना बैठना होने लगा तो हसन शाह ने जाना कि इन गाने बजाने वाली टोलियों में भी इल्मी/ज्ञानी लोग रहते हैं. उन्हें अपने फन के अलावा भी… भाषा, साहित्य, पोएट्री, धर्म, रिवाज, देश काल का अच्छा ज्ञान होता है. अब उसको टोली के बुज़ुर्ग, मोहम्मद आज़म (जिन्हें टोली में सब उस्ताद जी कहते थे) से बात करना अच्छा लगने लगा था.


दोनों कभी फारसी के बड़े कवि शेख़ हसीन की कविताओं पर बातचीत करते तो कभी हफीज़ शिराज़ी का किस्सा छेड़ते. टोली वाले यूं तो हसन शाह को मीर साहेब कह कर पुकारते थे पर जब भी उस्ताद जी को कोई इल्मी बात पूछनी होती तो उसे “सैयद साहेब” कह कर याद किया करते.


और एक दिन इसी तरह की एक बैठकी में हसन शाह की मुलाक़ात होती है खानम जान से.


खानम जान का दीदार क्या हुआ जनाब, उसकी खूबसूरती और चांद जैसे मुखड़े को देख हसन शाह को एकदम “लाला राम नारायण” की प्रेम पर कही कविता याद आ गई. यानि उसे प्यार हो गया.


अब तो बस हसन शाह का मन खानम जान के दर्शन को मचलता. टोली के टेंटों के सामने से घोड़े पर मिंग साब के यहां जाते वक्त वो कभी आंख भर के तो कभी दबी आंखों से, कनखियों से उसको देखने की कोशिश करता.


कल्लन साब की रंगीन महफिलें भी अब उसे अपनी ओर खींच रही थीं. मिंग साब के साथ वो भी उनमें शरीक होने लगा था. महफिल में जब खानम जान को अपना हुनर दिखाने पर तनख्वाह, बख्शीश या मेवाखोरी (फल खाने की जेबखर्ची ) के लिए रकम मिलती, हसन शाह के दिल पर सांप लोटते. पर वो खामोश आशिक की तरह अपनी बेचैनी बिलकुल भी ज़ाहिर नहीं होने देता था.


खानम जान चुपचाप सब समझ रही थी. उसका भी ये पहला प्रेम था. इस से पहले किसी मर्द का यूं उस पर असर नहीं हुआ था. लेकिन हसन शाह की खामोशी उसको खला करती थी. कभी कभी उसे चिढ़ाने के लिए वो मिंग साब से हंस बोल के बात कर लिया करती थी. फिर हसन शाह का चिढ़ा हुआ चेहरा देख उसे तसल्ली हो जाती. यकीन हो जाता कि वो कहे न कहे, उधर भी आग लग चुकी है.


इस तरह प्रेम में खानम जान को नई अदाएं आ गईं थीं. इतराना आ गया था. इसी इतराने इतराने में वो हसन शाह को कभी ताना मारती, कभी तड़पाती, कभी तरसाती…उधर प्रेम में डूबा हसन शाह भी अब रेख़्ता में शायरी लिखने लगा था.


दोनों में छुप छुप कर रुक्कों का आदान प्रदान होने लगा था. जब टोली वाले और अन्य मुलाज़िम हाट मेले जाते, दोनों बहाने से पीछे रुक जाते. अकेले में मिल लेते. एक ऐसी ही रात, बुखार में तड़पती खानम जान और हसन शाह चुप चाप एक मौलवी और चार अनजान लोगों को बुलवा, शादी कर लेते हैं.


इस तरह शर्मीले, कम बोलने वाले हसन शाह की जिंदगी एक नया मोड़ ले लेती है. वो इस मोड़ से आगे कहां जाएगा? जानने के लिए एक बार और इंतज़ार कीजिए,बावरा मन बताएगा अगले हफ़्ते.


बाद में रेख़्ता का मायने : गिरा पड़ा, बिखरा हुआ. ये उर्दू भाषा का पुराना नाम है जो उसे पहले प्राप्त था.

धन्यवाद


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: May 28, 2022, 1:16 PM IST
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