बावरा मन: The Nautch Girl और इश्‍क सूफियाना

हसन शाह और खानम जान ने एक रात चार अनजान गवाहों के सामने शादी कर ली थी. इस तरह रुक्कों पर शेरो शायरी के आदान प्रदान से शुरू हुआ उनका ये छुपा हुआ प्रेम अब छुपे हुए इकरारनामे पर आ गया था. ये इकरारनामा दरअसल एक ख़त था जिसे खानम जान ने खुद ही लिखा था. हैरत होती है ये सोच के, कि सवा दो साल पहले की नन्ही उम्र की खानम जान कितनी दिमाग़दार रही होगी.

Source: News18Hindi Last updated on: June 4, 2022, 1:11 pm IST
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बावरा मन: The Nautch Girl और इश्‍क सूफियाना
हसन शाह और खानम जान ने चार अनजान गवाहों के सामने शादी कर ली थी.

हसन शाह और खानम जान ने एक रात दुनिया से छुप कर चार अनजान गवाहों के सामने शादी कर ली थी. इस तरह रुक्कों पर शेरो शायरी के आदान प्रदान से शुरू हुआ उनका ये छुपा हुआ प्रेम अब छुपे हुए इकरारनामे पर आ गया था. ये इकरारनामा दरअसल एक ख़त था जिसे खानम जान ने खुद ही लिखा था. इस ख़त में वो अपने बीच प्रेम और संबंध के कुछ नियम तय करती है. ये इश्किया नियम थे.


इश्किया इकरारनामा



  • …गलती हो या न हो एक दूसरे से माफ़ी मांगने में दोनों कभी हिचकेंगे नहीं.


  • …दोनों अपने बीच की गलतफहमी को बातचीत के ज़रिए दूर कर लेंगे.


  • … दोनों हमेशा एक दूसरे की रजामंदी से ही ज़रूरी निर्णय लेंगे.


  • …दोनों एक दूसरे से कभी कुछ छुपाएंगे नहीं.


  • …दोनों एक दूसरे से कभी झूठ नहीं बोलेंगे.


  • …एक दूसरे के बारे में गप और अफवाहों पर कभी विश्वास नहीं करेंगे.


  • … दोनों में जो प्रेम और विश्वास आज है, भविष्य में भी वो बना रहे इसके लिए वो निरंतर प्रयास करेंगे.




खत रूपी इस इकरारनामे के नीचे एक तरफ़ खानम जान के दस्तख़त थे. दूसरी तरफ़ हसन शाह ने दस्तख़त किए और वापिस उसने ये ख़त खानम जान को भेज दिया. इस तरह इस सवा दो सौ साल पुराने प्रेमी जोड़े ने अपने बीच ये एक खुफिया “पोस्ट नेप्चुअल एग्रीमेंट” कर लिया था.


हैरत होती है ये सोच के, कि सवा दो साल पहले की नन्ही उम्र की खानम जान कितनी दिमाग़दार रही होगी. उसको रिश्तों को बनाने और निभाने की कितनी समझ रही होगी.


रहमुल्लाह


ख़ैर दो प्रेमियों के बीच जो भी कुछ हुआ उसका इन दो के अलावा अगर कोई तीसरा गवाह था तो वो था टोली का छोटा लड़का, रहमुल्लाह. दोनों के प्यार, तकरार, इकरार का वो था इकलौता राज़दार. उसने ये सब अपनी आंखों से देखा था.


दोनों प्रेमियों के बीच रुक्कों और खतों के आदान प्रदान छोटे रहमुल्लाह के ज़रिए ही होता था. दोनों का ये छोटा राज़दार, बड़े पेट वाला था. और उसका ये पेट हमेशा बड़ा ही रहा. कभी उसकी ज़बान किसी तीसरे के सामने न खुली.


आज जब चुनार को जाती खानम जान, गंगा मैया में हिचकोले खाती अपनी नैया में गुमसुम उदास बैठी थी, उसे देख रहमुल्लाह समझ पा रहा था कि उस पर क्या बीत रही होगी.


चुनार को रवानगी


इस तरह कानपुर के सती चौरा घाट से खानम जान और उसकी गाने बजाने वालों की टोली को चुनारगढ़ के लिए रवाना हुए तीन दिन हो चुके थे. हसन शाह भी जहां तीन घंटे में निकलने वाला था, उसे निकलते निकलते तीन दिन लग गए थे. हसन शाह को रह रह कर मिंग साब पे भी गुस्सा आ रहा था. मिंग साब ने उसे काम में फंसा लिया था. बही खातों में उलझा लिया था. सवा दो सौ साल पहले वाला ये मालिक और मुलाज़िम के बीच का “डेडलाइन और टारगेट” वाला खेल हसन शाह की प्रेम कहानी पर भारी पड़ गया था.


हसन शाह एक वफादार आशिक था. पर वो एक ईमानदार मुलाज़िम भी था. मिंग साब उसे लाख प्यार से रखते थे, दोस्ती का सा व्यवहार करते थे. पर थे तो उसके मालिक ही. हसन शाह भी मालिक वाले लिहाज़ में उन्हें अपना राज़ कभी कह न सका. बता दिया होता तो हो सकता है वो उसे समझ पाते. पर अब देर हो चुकी थी. गंगा किनारे खड़े उसे अपना और खानम जान का इकरारनामा याद आ रहा था. उसे बार बार रह रह के खानम जान की चिंता सता रही थी. आखिर वो उसके बारे में क्या सोच रही होगी? वो इसी बात से मरा जा रहा था कि कहीं वो उसे बेवफ़ा न समझ रही हो.


… और खानम जान


उधर, खानम जान का दिल गंगा मईया की गोद में हिचकोले खा रहा था. उसकी आंखें पीछे की तरफ टकटकी लगाए थीं. भूख प्यास सब खत्म थी. अचानक से उसे अपना भविष्य हसन शाह के पहलू में नहीं, नाचने गाने वाली महफिलों में दिखने लगा था. एक ऐसा भविष्य जिसमें बस “मालिक” बदलते थे. कल कल्लन साब ( संभवत: लखनऊ की कल्लन की लाट वाले Col John Collins) मालिक थे, आगे हॉलियर साब (संभवत: Antoine Louis Henri de Polier) होंगे. अब उसे अपना भविष्य जाजमऊ के गृहस्थ आश्रम में नहीं, हॉलियर साब के “रंग महलों” में दिखने लगा था. सोच सोच के वो पीली पड़ने लगी थी. उसका खाना पीना खतम हो गया था. वो जिस जिंदगी को नापाक मान मन से त्याग चुकी थी, खुद को फिर से उसी तरफ़ जाता हुआ देख रही थी. उसे डर था कि देर सवेर उसकी भी अब “मिस्सी” होगी…


इस तरह हसन शाह की जान अपने तोते में और तोते की जान हसन शाह में अटकी थी. दोनों की प्रेम की नैय्या हिचकोले खा रही थी. हसन शाह के दस लड़कों ने दिन रात की परवाह किए बिना गंगा मईया की लहरों पर वो रफ़्तार बनाई जो नामुमकिन सी थी, किसी ने देखी न थी. देखते देखते हसन शाह की नाव इलाहाबाद से कुछ पहले “कारा मानिकपुर” पहुंच गई थी.


(कारा- मानिकपुर मध्यकालीन भारत में एक सूबा था. इसमें दो गढ़ शामिल थे: कारा और मानिकपुर. दोनों गंगा नदी के विपरीत किनारों पर स्थित हैं. इन्हें आज भी कारा-मानिकपुर कहा जाता है. कारा अब कौशाम्बी जिले में पड़ता है, जबकि मानिकपुर प्रतापगढ़ जिले का एक हिस्सा बन गया है .)


पर खानम जान और टोली वाली नाव का कोई अता पता नहीं था. इस तरह एक हफ्ते गंगा मईया की लंबाई नापने के बाद नाव चलाने वाले भी थक हार गए. खाने पीने का समान खतम होने लगा. हसन शाह ने हार कर वापिस कानपुर का रुख करने का फैसला किया. उस ने सोचा वो जल्दी फिर किसी काम के बहाने चुनारगढ़ जाएगा और अपनी खानम को अपने साथ ले आएगा.



the nautch girl by hasan shah



हरकारे और ख़त


उधर, चुनार पहुंच प्रेम में बीमार खानम जान की हालत बिगड़ने लगी थी. वहां के इलाज से जब उसे आराम न हुआ, बात न बनी तो हार कर उसे लखनऊ ले जाने का फैसला हुआ. नाच गाने वाले उस माहौल से निकलने का उसके पास अब यही एक तरीका था. बीमारी…


उस्ताद जी और रहमुल्लाह के साथ बीमार खानम जान अब लखनऊ आ गई. लखनऊ में “भीम का अखाड़ा” इलाके में किसी जान पहचान वालों के यहां उन्होंने डेरा डाल लिया था. लेकिन उसकी हालत देख इधर लखनऊ के हकीमों ने भी हाथ खड़े कर दिए थे. किसी को न बीमारी समझ आ रही थी न इलाज ही समझ आ रहा था. खानम जान का शरीर था कि उसका साथ छोड़ रहा था पर उसका दिमाग…


उसका दिमाग अभी भी काम कर रहा था. खानम जान ने दिमाग लगाया और उस्ताद जी से कहा कि उसका इलाज अब तो बस कानपुर वाले हकीम मीर मोहम्मद नवाज़ जी ही कर सकते हैं. उन्हीं को बुलवा लिया जाए. वो शर्तिया इलाज कर लेंगे. उसके बीमार दिल को ये यकीन था कि हसन शाह इस पैगाम को देख रह न पाएगा और अपने हकीम नाना के साथ उसे देखने कानपुर से लखनऊ ज़रूर आ जाएगा.


इधर, हरकारे ने हकीम मीर मोहम्मद नवाज़ को उस्ताद जी की चिट्ठी पकड़ाई, उधर रात में उसी हरकारे ने चुपके से हसन शाह के हाथ रहमुल्लाह की दी हुई चिट्ठी रखी. ये हसन शाह के नाम खानम जान की चिट्ठी थी. ये खानम जान की आह थी जो शब्दों में बयां हो हसन शाह के पास पहुंची थी.


हसन शाह समझ गया था कि उसको क्या करना है. उस ने नाना से कहा कि वो भी लखनऊ जाना चाहता है, वहां के अपने रिश्तेदारों से मिलना चाहता है. नाना झट मान गए पर मिंग साहेब तभी माने जब हसन शाह ने उनके सारे ज़रूरी काम निपटा दिए. इस तरह दोनों को लखनऊ के लिए निकलते निकलते तीन चार दिन लग गए. जब तक उनके घोड़े भीम के अखाड़े पहुंच खूंटे से बंधे, सब तरफ़ सन्नाटा पसरा था. खानम को गए तीसरा दिन हो चुका था. खानम जान की गीली कब्र पर रोने वालों में बस रहमुल्लाह था. बेचारे हसन शाह की स्थिति देखने लायक थी… अपनी बीवी को आखरी बार ना देख पाया, ना उसके लिए कुछ कर पाया और अब उसके मरने के बाद… रो भी ना पाया. आखिर क्या बतलाता किसी को कि वो क्यों रो रहा है? क्या लगती थी मरने वाली उसकी.


… आधी रात जब सब सो गए, हसन शाह अपनी चारपाई से उठा.  रहमुल्लाह को साथ ले भीम के अखाड़े वाले उस कब्रिस्तान में गया जहां उसकी बीवी दफ़न थी. अपनी बीवी की गीली कब्र देख वो गश खा के ऐसा गिरा कि फिर कई घंटों तक न उठ सका. पसीने और आंसुओं से तरबदर उसके जिस्म से मानो उसका पूरा वजूद बह गया हो. होश खो बैठा था. बस जान ही बच गई थी.


कहते हैं…


हसन शाह ने ना फिर कभी शादी की और न ही कभी नौकरी की. उसने कानपुर और गंगा का किनारा भी हमेशा के लिए छोड़ दिया. उसने अंग्रेज़ छोड़ दिए, नवाब छोड़ दिए. दोबारा किसी की भी मुलाज़मत ना की. सब बंधनों से आज़ाद हो गया. लखनऊ में आ बसा और भीम के अखाड़े को ही अपना घर बना लिया. कुछ वक्त के लिए ज़रूर मशहूर शायर, जुरअत क़लंदर बख़्श का शागिर्द बना पर फिर वहां से भी निकल लिया. फ़कीर हो गया. ऊपर वाले को सरकार मान, हाथ में कलम दवात ले… अपने प्यार को बयां कर गया.


जीते जी जिस प्यार के बारे में वो किसी से भी ना कह पाया, उस प्यार की दास्तान लिख वो खानम जान को हमेशा अमर कर गया.


चलते चलते


रुस्किन बॉन्ड की “फ्लाइट ऑफ़ पिजंस” को श्याम बेनेगल मिले तो “जुनून” बनी. मिर्ज़ा हादी रुसवा की “उमराव जान अदा” को मुज्जफर अली मिले तो “उमराव जान” बनी. लेकिन खानम जान और हसन शाह की इस अमर कहानी को आज भी अपने हिस्से के निर्देशक का इंतज़ार है. उनके लिए कुरातुल्लैन हैदर ने सारी पटकथा 1990 के दशक में ही तैयार कर दी थी जब उन्होंने नश्तर का अंग्रेज़ी में तर्जुमा कर उसे “The Nautch Girl” का टाइटल दिया था.


क्या है ना, धरती के ऊपर जिसने यमुना किनारे ताज महल बनाया उसकी प्रेम कहानी तो सबने जानी. पर जिसकी प्रेम कहानी गंगा किनारे धरती के अंदर दफ़न है, उसको कहने सुनने वाला आखिर कोई तो चाहिए ना. धन्यवाद

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: June 4, 2022, 1:11 pm IST
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