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बावरा मन: पुराने पंजाब के खाने और गाने...

सर्दियों में मां, सर और गले को ढकने के लिए जब निर्देश देती, तो कहतीं, ‘गिलगिती बांध लो’. और फिर खुद ही हंसते हुए कहती, ‘शायद हमारे परिवारों में सदियों से गिलगित के इलाके जैसी ठंड से बचाव के लिए ये नाम दिया गया है, गिलगिती’. गिलगिती यानि सर और गले को गर्म शॉल से अच्छी तरह लपेट कर गांठ बांध लेना. अविभाजित हिंदुस्तान का पहाड़ी इलाका था गिलगित और गिलगित की ठंड के चर्चे सुदूर पंजाब के इलाकों में ठीक इसी तरह ही रहा करती होगी, जैसे मां करती थीं. मां की गिलगिती वाली बातें आजकल इस भयानक सर्दी में खूब याद आती हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: January 22, 2022, 9:00 AM IST
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बावरा मन: पुराने पंजाब के खाने और गाने...


बदलते मौसमों की मार से बच्चे बचे रहें इस के लिए नानी दादी के नुस्खे बहुत काम आते हैं. होता क्या है कि इधर बच्चा पैदा हुआ और उधर ये नुस्खे, घर की बड़ी औरतें, नई मां को घुट्टी की तरह देती हैं. आगे चल कर ये नुस्खे/ ये सबक मांओं को ताउम्र, बच्चों के बड़े होने तक याद रहते हैं. और फिर इसी तरह पीढ़ी दर पीढ़ी कुछ नुस्खे, कुछ सबक अगली पीढ़ी को विरासत में मिलते चले जाते हैं. इसीलिए देखती हूं कि आज जब इतनी कड़कड़ाती ठंड पड़ रही है तो मैं भी बच्चों को वही सबक देती हूं जो बचपन में मां के मुख से सुनती थी.


गिलगिती

सर्दियों में मां, सर और गले को ढकने के लिए जब निर्देश देती, तो कहतीं, ‘गिलगिती बांध लो’. और फिर खुद ही हंसते हुए कहती, ‘शायद हमारे परिवारों में सदियों से गिलगित के इलाके जैसी ठंड से बचाव के लिए ये नाम दिया गया है, गिलगिती’. गिलगिती यानि सर और गले को गर्म शॉल से अच्छी तरह लपेट कर गांठ बांध लेना.


अविभाजित हिंदुस्तान का पहाड़ी इलाका था गिलगित और गिलगित की ठंड के चर्चे सुदूर पंजाब के इलाकों में ठीक इसी तरह ही रहा करती होगी, जैसे मां करती थीं. मां की गिलगिती वाली बातें आजकल इस भयानक सर्दी में खूब याद आती हैं. बच्चों को बताती हूं, फिर हंस लेती हूं.


दरअसल, अविभाजित पंजाब में वो ‘गिलगिती ठंड’ सिर्फ़ गिलगिती बांधने भर से दूर नहीं हुआ करती थी. ठंड से बचने के लिए खान पान का भी खूब ध्यान रखना पड़ता था. सर्दियों में ख़ासतौर पर शरीर को गर्म रखने के लिए, छिट बनाई और खाई जाती थी. पुराने बचे इक्का दुक्का लोगों को शायद इसका नाम याद हो, ‘छिट’.


दिल्ली की सर्दी और छिट

मां और उनके सारे भाई बहन, दिल्ली में बड़े शौक से छिट खाया करते थे. दिल्ली में रहते हुए भी उनकी ‘पिंडी’ वाली  ज़बान का स्वाद/चस्का, खतम नहीं हुआ था. हम अगली पीढ़ी के बच्चे जिस छिट के स्वाद से अपने को जोड़ नहीं पाते थे, अपने बचपन के उसी स्वाद से हमारे घर के बड़े हमेशा ही जुड़े रहे. दिल्ली की सर्दियों में मां अक्सर ‘छिट’ बनाया करती थीं.


छिट उनको उनके बचपन की याद ताज़ा कराती थी. जिस दिन भी हमारे घर छिट बनती, बच्चों की तरह मां फोन मिलाकर बाकी भाई बहनों को खुशी से बतातीं, ‘अज मैं छिट बनाई ऐ’.


छिट यानि पूरी तरह से अदरक लहसुन की सब्ज़ी. इस सब्ज़ी में बहुत सा पिसा/कुटा हुआ अदरक और लहसुन पड़ता है. अदरक लहसुन के तीखे स्वाद को भून भून कर कम किया जाता है. कुछ लोग इसमें पिसा हुआ बादाम भी डाल देते हैं. फिर इसमें अन्य मसालों के साथ, अपने अपने घर की रस्म और रिवाज़ के हिसाब से, टमाटर/ मलाई/ दूध या फिर दही डाला जाता है.


मेरी एक मौसी प्रयोग के तौर पर, अदरक लहसुन के साथ एक दो आलू भी कूट कर डाला करती थीं. अगली पीढ़ी वाली मेरी भाभी तो इसमें उबले अंडे डाल कर इसे अपना एग करी वाला ‘ट्विस्ट’ दे देती हैं. भाभी वाला ‘ट्विस्ट’ बच्चों को पसंद आ जाता है और इसीलिए इन ‘अंडों के दम’ पर हमारे घर में छिट प्रेम अगली पीढ़ी में भी आज जिंदा है.


गर्म गर्म छिट को कटे हुए हरे धनिए से सजाया जाता है. और फिर इस के साथ गर्म गर्म रोटी का मज़ा लिया जाता है. ‘छिट’ यानि ठंड को भगाने की एक प्राचीन पंजाबी रेसिपी.


नानी कहती थीं कि छिट का सेवन न सिर्फ़ ठंड भगाने के लिए है बल्कि ये तो हाजमे और जोड़ों के दर्द के लिए भी मुफ़ीद है.


पंजाबी खान के बाद अब पंजाबी गान

समय के पहिए के साथ सिर्फ़ पंजाब के स्वाद ही नहीं बदले हैं, इधर गानों के बोलों ने भी बदलते वक्त के साथ कदमताल की है. नानी से जो बचपन में एक गीत सुना था, अब देखती हूं अगली पीढ़ी, एक अलग ही अंदाज़ में उसे गा रही है.


नानी के ज़माने में…





बाइसिकल चलांदे हो/चलाई जाने हो

मुंह ते सुटो रुमाल

नजराड़े जानदे हो…मतलब, बाइसिकल चला रहे हो, ज़रा चेहरा रुमाल से ढक लो नहीं तो किसी की नज़र लग जाएगी.


हमारे ज़माने में…

मोटरसाइकिल चलाई जांने हो

ओह त्वाडी कौण लगदी

जिनू पिछे बिठाई जाने हो…


मतलब, मोटरसाइकिल चला रहे हो, वो आपकी कौन लगती है जिसे पीछे बिठा रखा है.


आज के ज़माने में…

लैंबोर्गिनी चलाई जाने हो

सानू वी झूटा दे दो

किथे कल्ले कल्ले जाई जाने हो…

मतलब, लैंबोर्गिनी चला रहे हो, हमें भी सैर करा दो, अकेले अकेले कहां जा रहे हो.


‘पंजाब ऑन व्हील्स’

लोकजीवन से जुड़ा ये लोकगीत, आखिरकार समय का पहिया घुमाते बाइसिकल से लैंबोर्गिनी तक आ पहुंचा है.


लैंबोर्गिनी वाला आज का पंजाब कभी बाइसिकल भी चलाया करता था, सुन कर ‘हनी सिंह पीढ़ी’ को अजीब लग सकता है. आज के पंजाब की अर्थव्यवस्था उसकी गाड़ियों से, उसकी सड़कों से, उसके रेस्टोरेंटों से, उसके पासपोर्ट पर लगे वीजाओं से आंकी जाती है. न कि गिलगिती, छिट या बाइसिकल से.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: January 22, 2022, 9:00 AM IST
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