बावरा मन: रिश्ते ही रिश्ते❣

बिना इंटरनेट के भी अपना नेटवर्क कैसे बनाया जाता है कोई सीखे मरहूम प्रो अरोड़ा जी से. ना होर्डिंग, ना फ्लेक्स, ना टावर और न कोई और तामझाम. अरोड़ा जी ने अपने पेंटर्स को दिल्ली से पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण सभी दिशाओं में भेज भेज कर, रेलवे ट्रैक के दोनो तरफ दीवारों पर अपना नाम छपवा दिया था. और सिर्फ़ दीवार ही नहीं, पठारी इलाकों की चट्टानों पर भी ये नाम और पता, दूर से साफ़ दिख जाया करता था. इस तरह ट्रेन से हर रोज सफर करने वाले लाखों हिंदुस्तानी जान गए थे कि बस अब अरोड़ा जी ही एक हैं, जो शादी का लड्डू खिलवा सकते हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: October 30, 2021, 9:57 AM IST
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बावरा मन: रिश्ते ही रिश्ते❣

स दिन लखनऊ रेजीडेंसी के गेट के बाहर एक सर्व धर्म मैरिज ब्यूरो का कागज़ी इश्तहार देखा. लगा शादी डॉट कॉम के ज़माने में क्या आज भी ये ब्यूरो सांस लेते हैं? और फिर मेरा ये ‘बावरा मन’, सालों पहले वाला अपना वो ट्रेन का सफ़र तय करने लगा.


अब आप कहेंगे कि ट्रेन से मैरिज ब्यूरो का क्या रिश्ता है?


रिश्ता है जनाब. जब ‘शादी डॉट कॉम’ नहीं था, रेलवे ट्रैक से दिखने वाली दीवारों पे ‘रिश्ते ही रिश्ते’ वाले प्रो अरोड़ा थे.


रेल यात्रा

बचपन में दो महीने की गर्मी की छुट्टियों में मिले गृहकार्य में एक निबंध लिखना होता था, ‘मेरी रेल यात्रा’. उस ज़माने में ट्रेन से ऊपर किसी की पहुंच थी नहीं. ट्रेन से ही सफर होता था और उस ट्रेन वाले निबंध में तीन ज़िक्र ज़रूर होते थे…


एक, कुल्लड़ की चाय का व्याख्यान.


दूसरा, ‘ट्रेन के साथ साथ यूं लग रहा था मानो पेड़ और बादल भी हमारे साथ चल रहे हों’ वाला गुणगान.


तीसरा, ‘रिश्ते ही रिश्ते वाले प्रो अरोड़ा’ का नाम.


दरअसल, दिल्ली शहर का वैवाहिक माहौल सिर्फ़ फिल्म ‘बैंड बाजा बारात’ ने ही नहीं बनाया है. बरसों बरस इस माहौल को करोलबाग वाले प्रो अरोड़ा ने भी बनाये रखा है.


एक बार मिल तो लें


एक समय था ट्रेन की खिड़की से सिर्फ़ एक ही नाम दिखता था…प्रो अरोड़ा!! जिधर से भी ट्रेन निकलती खिड़की से बाहर झांकते ही दिखता…


रिश्ते ही रिश्ते,


एक बार मिल तो लें


प्रो अरोड़ा, 28, रैगर पुरा, करोल बाग, दिल्ली 110055


मानो पूरे भारत के रिश्तों का पट्टा अरोड़ा साहेब ने ही ले रखा हो. या कहें तो जिन लोगों की जोड़ी राम जी नहीं बना पाते थे, उनके लिए  संकटमोचन का काम करते थे, रैगरपुरा करोल बाग वाले अरोड़ा जी.


प्रो अरोड़ा जी

बिना इंटरनेट के भी अपना नेटवर्क कैसे बनाया जाता है कोई सीखे मरहूम प्रो अरोड़ा जी से. ना होर्डिंग, ना फ्लेक्स, ना टावर और न कोई और तामझाम. अरोड़ा जी ने अपने पेंटर्स को दिल्ली से पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण सभी दिशाओं में भेज भेज कर, रेलवे ट्रैक के दोनो तरफ दीवारों पर अपना नाम छपवा दिया था. और सिर्फ़ दीवार ही नहीं, पठारी इलाकों की चट्टानों पर भी ये नाम और पता, दूर से साफ़ दिख जाया करता था. इस तरह ट्रेन से हर रोज सफर करने वाले लाखों हिंदुस्तानी जान गए थे कि बस अब अरोड़ा जी ही एक हैं, जो शादी का लड्डू खिलवा सकते हैं.


आज, किसी और की दीवार पर अपना नाम पेंट करवाना, यूं कहीं भी अपना इश्तिहार लगवा देना अपने आप में एक मंहगा सौदा है. आज कोई भी ऐसा इश्तेहारी काम फ्री में नहीं होता. कोई लाख चाहे भी तो ऐसा काम नहीं कर सकता. लोग दावा ठोक दें, हर्जाना मांग लें. पर उस ज़माने के लोग सादा हुआ करते थे. उस समय के हिसाब से ये मार्केटिंग का नायब और सस्ता तरीका था. बोले तो, हींग लगे न फिटकरी रंग भी चोखा होए.


रंग चोखा यानि बढ़िया बिजनेस

प्रो अरोड़ा के सर्व धर्म मैरिज ब्यूरो से पहले हमारे यहां अपने अपने धर्म, जाति, उप जाति, समुदाय, समाज वाले मंच हुआ करते थे, जिनके जरिए परिवारों के बीच रिश्ते बनाए, बिठाए जाते थे. लोग जान पहचान के परिवारों में ही शादी करना पसंद करते थे. इन समुदायों के अपने अपने गजट भी छपा करते थे. इन गजटो के मेट्रिमोनियल कॉलम के जरिए योग्य वर वधु की तलाश पूरी होती थी.


धीरे धीरे आधुनिकीकरण होता गया, पारिवारिक यूनिट छोटी होती गई. अब समाज में अखबारों के ज़रिए से भी रिश्ते होने लगे. लेकिन अखबारी कॉलम, जानपहचान की कमी होने के कारण विश्वसनीयता नहीं ला पाते थे. हमारे देश में जब तक कोई जान पहचान का व्यक्ति बीच में नहीं पड़ता, परिवार वालों का विश्वास ही जागृत नहीं होता. आज भी हिंदुस्तानी शादी का सबसे बड़ा वाला फैक्टर होता है… बिचौलिया. बिचौलिया यानि बीच की कड़ी, मैचमेकर!


1970 के दशक में इसी विश्वसनीय मैचमैकर की कमी पूरी की ‘रिश्ते ही रिश्ते’ वाले प्रो धरम चंद अरोड़ा ने. प्रो धरम चंद अरोड़ा यूं तो फुल टाइम अध्यापक थे. परंतु समाज में कुछ ऐसे अंकल आंटियां होते हैं ना जिनसे लोग पूछते हैं, ‘हमारे मोनू के लिए कोई अच्छा सा रिश्ता हो तो बताएं, भाई साहेब.’ बस, प्रो धरम चंद अरोड़ा वैसे वाले ही अंकल जी थे. चूंकि व्यवस्थित इंसान थे तो उन्होंने इन रिश्तों का लेखा जोखा रखना शुरू कर दिया. इस तरह ‘रिश्ते ही रिश्तों’ की ‘फाइलें ही फाइलें तैयार हो गईं. अध्यापक से अब वो पार्टटाइम मैचमेकेर भी हो गए थे. अरोड़ा जी ने मैरिज ब्यूरो खोल लिया था.


एक बार हमारे एक पत्रकार मित्र उनसे मिलने उनके इसी मशहूर पते पर जब पहुंचे, आसपास के घरों के बाहर चारपाई पर बैठी महिलाओं ने गुस्से में उनके पते की तरफ़ इशारा किया. महिलाओं की शिकायत थी, ‘जिसे देखो रोज कोई न कोई मुंह उठा के चला आता है’. हमारे पत्रकार बंधु को तुरंत समझ में आ गया कि आस पड़ोस के लोगों की अपनी निजता खराब होती है. शायद इसी कारण प्रो अरोड़ा से उनके पड़ोसी नाराज़ नाराज़ से रहते हैं.


आखिर एक इश्तेहारी प्रवृत्ति के इंसान ने कहीं न कहीं, अपने पते को मशहूर करने के चक्कर में, बदनाम कर दिया था.


 बिनिस सेंस और मार्केटिंग के गुर





दरअसल, जिसे पड़ोसी बदनामी कहते रहे उसे आज के बिजनस संस्थानों में मार्केटिंग कहते हैं. आज के देसी मैनेजमेंट गुरुओं को स्टार्ट अप और मार्केटिंग, दोनों ही विधाओं के गुर, दो पुराने देसी गुरु सिखा सकते हैं. एक MDH वाले महाशय धरमपाल गुलाटी और दूसरे अपने मैरिज ब्यूरो वाले ‘प्रो धरमचंद अरोड़ा.


इन दोनों महानुभवों में कई बातें एक जैसी थीं.


…पंजाबियत,


…करोलबाग से संबंध,


…नाम में ‘धरम’ और आखिरी


…ज़बरदस्त मार्केटिंग और बिनिस सेंस.


डिजिटल रिश्ते

ख़ैर आज ‘रिश्ते ही रिश्ते’ वाले प्रो अरोड़ा तो नहीं हैं परंतु उनका बिजनेस, उनकी भांजी, उनके उसी पते से चला रही हैं. प्रो अरोड़ा की ‘फाइलें ही फाइलें’ अब नहीं रहीं. अब सब कुछ डिजिटली होता है. वर वधु के चुनाव की प्रथाएं भी बदल गई हैं. बस एक ही चीज़ है जो आज भी नहीं बदली है. वो है वर वधु के मां बाप की चिंता. वर वधु के मां बाप आज भी किसी इंसान को ही शादी की गारंटी की तरह बीच में रखना पसंद करते हैं. क्या है ना, रिश्ता करते वक्त बीच में कोई हो, तो रिश्ते की विश्वसनीयता बनी रहती है.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: October 30, 2021, 9:57 AM IST
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