बावरा मन : ये तेरा घर, ये मेरा घर… Coexistence!

जिन इलाकों का एक ऐतिहासिक महत्व होता है, उनके लिए. अर्बन रिन्यूअल के लिए जहां एक ओर ऐतिहासिकता, स्थानीय संस्कृति का पूरा ख्याल रखा जाता है वहीं, मिनिमम इकोलॉजिकल इंटरवेंशन हो, इसका भी पूरा ध्यान रखा जाता है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 15, 2021, 10:09 AM IST
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बावरा मन : ये तेरा घर, ये मेरा घर… Coexistence!
सेंट्रल विस्टा एवेन्यू में काम नवंबर 2021 तक पूरा होना है. (फाइल फोटो)
आज के इस दौर में जब कोई खबर सुकून और दिलासा नहीं देती तो राजकपूर की कही एक बात याद आती है,
"The show must go on" ...
परिस्थितियां कितनी भी प्रतिकूल हों, आगे बढ़ने के अलावा दूसरा कोई भी ऑप्शन इंसान के पास नहीं होता है. हर आपदा में एक अवसर होता है और इंसान को अवसर तलाशते रहना चाहिए. ऐसी ही एक आपदा थी और ऐसा ही एक अवसर था. बात है 1784 की और जगह थी लखनऊ, जब एक भारी अकाल के बीच में अवध के नवाब आसफ़उद्दौला ने बड़े इमामबाड़े का निर्माण करवाया था.

लखनऊ के नवाब और यहां का इमामबाड़ा
इस अद्भुत इमारत के निर्माण के पीछे एक दिलचस्प किस्सा जुड़ा है. माना जाता है कि लखनऊ में अकाल की वजह से रोजगार की कमी और भयावह भुखमरी की समस्या आ गई थी. आवाम की भलाई और भर पेट भोजन की व्यवस्था करने के लिए इमामबाड़े के निर्माण का निर्णय लिया गया, जिसकी वजह से कहते हैं कि उन दिनों 22000 लोगों को रोजगार का अवसर मिला और अकाल को मात दी गई. इमामबाड़े और रूमी दरवाज़े के गाइड्स तो इस कहानी को दो कदम और आगे ले जाते हैं. उनका तो कहना है कि नवाब दिन में काम चालू रखवाते थे और रात को तुड़वाते थे. ताकि लोगों को निरंतर काम मिलता रहे. लोग नवाब साहब की इस दरियादिली से इतने प्रसन्न हुए कि अवध में मशहूर हो गया…
"जिसको ना दे मौला,
उसको दे असफ उद दौला."11 सालों में बन के तैयार हुई इन इमारतों के टूटने बनने की कहानी के पीछे एक और किवदंती भी जुड़ी है. कहा जाता है कि दिन में इन इमारतों को बनाने का काम तो आम गरीब गुरबा, मिस्त्री मजदूर करते थे परंतु रात के अंधेरे में तोड़ने का काम, दुर्दिन में फंसे शहर के अमीर लोग छुप छुप के किया करते थे. ताकि कोई पहचान न ले. बनने की गति, टूटने से ज़्यादा थी लिहाज़ा, 11 साल में बन कर ये इमारत, तैयार भी हो गई.

नवनिर्माण, हम और हमारा पर्यावरण
ख़ैर, रोज़गार देने वाली ये नवाबी कहानी मुझे इसलिए भी याद आई क्योंकि आज फिर आपदा का वक्त है, रोज़गार की भी जरूरत है और इसके लिए दिल्ली में एक बड़ा नवनिर्माण भी हो रहा है. इस नवनिर्माण के लिए कुछ पुराने दरख़्तों को रीलोकेट भी किया जा रहा है. लोगों को इन दरख़्तों की चिंता भी है. और क्यों न हो, जिन दिल्लीवालों को आज इन पेड़ों से ऑक्सीजन की जरूरत है उन्हीं दिल्ली वालों की तीन पीढ़ियों ने इन रिलोकेट होते जामुन के पेड़ों से उसके फल, जामुन भी खाए हैं. दरअसल, राजपथ के दोनों ओर लगे ये तरतीबदार जामुन के पेड़ अपने आप में एक eco system हैं. एक बड़ी सी शोरगुल वाली दुनिया के बीचोबीच, छोटी सी दुनिया. इस छोटी सी दुनिया में 100 साल से तोते, मैना, घेंघा, खुग्गी, बंदर सबने अपना बसेरा जमाया है. बरसात के दिनों में इंडिया गेट के चारों तरफ़ डब्बों में सजे ये जामुन जब बिकने आते हैं, कितने ही लोगों की इनसे कमाई होती है और कितने ही लोगों ने इनके स्वाद से जीभ काली की है.

कुल मिला के, हम लोग, ये पेड़, हमारा रोज़गार, ये जीवजंतु, सभी तो एक दूसरे से जुड़े हैं, एक दूसरे पर निर्भर हैं और एक दूसरे पर आश्रित हैं.


जामुन के पेड़ और बच्चे
जामुन के पेड़ों की बात चली है तो उसी से जुड़ा ये एक किस्सा भी सुनिए. ये किस्सा बड़े लोग तो भूल गए हैं पर स्कूल की किताबों में आज भी बच्चों के लिए दर्ज है. कहते हैं एक बार पंडित जवाहरलाल नेहरू दफ़्तर जा रहे थे. उन्होंने देखा कि रास्ते में जिन जामुन के पेड़ों के इर्द गिर्द बच्चे ही बच्चे होते थे, जामुन तोड़ और खा रहे होते थे, वहां उस दिन सन्नाटा पसरा था. पंडित जी को पूछने पर मालूम चला, "बच्चे जामुन खा खूब गंदगी फैलाते थे. इस जगह का रख रखाव हो सके, इसलिए इन पेड़ों को ठेके पर चढ़ा दिया गया है. आमदनी की आमदनी और मेंटेनेंस की मेंटेनेंस."

पंडित जी ने तुरंत संबंधित अधिकारी से बात की. हाथों हाथ जामुन के पेड़ों का ठेका कैंसल किया. ठेकेदार का एडवांस वापस हुआ और अगले दिन से पेड़ों के इर्द गिर्द दोबारा बच्चों की चहल पहल शुरू हो गई. इस तरह एक प्रधानमंत्री की बच्चों के नाम ये छोटी सी सौगात, सबके दिलों में उतर गई.

पेड़ और घर के बुजुर्ग
रस्किन बॉन्ड की एक किताब में सालों पहले ये पढ़ा था "Blessed is the house upon whose walls
The shade of an old tree softly falls.’

इन पंक्तियों का इस्तेमाल कई संदर्भों में किया जा सकता है. पेड़ों के संदर्भ में, घर के बुजुर्गों के संदर्भ में और अपनी संस्कृति के संदर्भ में. मेरा मानना है, वो घर भाग्यशाली हैं जिनपे बड़े पेड़ों की छाया रहती है. वो परिवार भाग्यशाली हैं जिनपे बुजुर्गों का आशीर्वाद रहता है, जिसमें तीन पीढि़यां एक साथ रहती हैं. और वो समाज भाग्यशाली होते हैं जिनपर प्राचीन, वृहद संस्कृति की रहमत होती है. हम भाग्यशाली हैं कि हमारी झोली में ये तीनों संदर्भ, किस्मत से परिवेश वश आ गिरे हैं. हमें अपने पेड़ों की, अपने बुजुर्गों की और अपनी वृहद संस्कृति की, रक्षा भी करनी है. नवनिर्माण की कोशिशों के बीच इन्हें भी बचा के रखने का काम करना है और इसके लिए दुनिया भर में टाउन प्लानिंग के भरपूर मॉडल्स हैं.

री जोनिंग, अर्बन रिन्यूअल
दुनियाभर के देशों में री ज़ोनिंग, रिडेवलपमेंट होता आया है और होता रहेगा. पुराने को नया रूप देना, ये वक्त के साथ चलने की परंपरा का ही हिस्सा है. इस री जोनिंग के भी अपने कुछ कायदे हैं. कुछ प्रोटोकॉल्स होते हैं. खासकर जिन इलाकों का एक ऐतिहासिक महत्व होता है, उनके लिए. अर्बन रिन्यूअल के लिए जहां एक ओर ऐतिहासिकता, स्थानीय संस्कृति का पूरा ख्याल रखा जाता है वहीं, मिनिमम इकोलॉजिकल इंटरवेंशन हो, इसका भी पूरा ध्यान रखा जाता है. एक शहर की आत्मा, उसकी धरोहर से, उसकी वनस्पति से, कम से कम छेड़छाड़ की जाती है. रोम, पेरिस, एथेंस, मैड्रिड, बार्सिलोना, प्राग जैसे पुराने यूरोपीय शहरों की री ज़ोनिंग उनके पुरातन चरित्र से बिना छेड़छाड़ के, की गई है. उधर नवीन, खुले इलाकों में रीयल एस्टेट को बढ़ावा देने के लिए री जोनिंग के अलग मॉडल्स अपनाए जाते हैं.

ये तेरा घर ये मेरा घर
नवनिर्माण और घर बनाना, सृजन का प्रतीक है. सभ्यता के विकास में सृजन ज़रूरी भी है. इस सृजन में हमें लोगों का भी ध्यान रखना है, उन्हें रोज़गार भी देना है, रिलोकेट होते बुज़ुर्ग पेड़ों की चिंता भी करनी है और Rosy Starlings(मैनाओं की किस्में) को भी बचाना है. ये रोज़ी स्टार्लिंग्स हर शाम सैंकड़ों की तादाद में इंडिया गेट के ऊपर के आसमान पर स्वछंद उड़ान भरा करती हैं, हम इंसानों को सामूहिक जीवन, सामाजिक जीवन जीने की प्रेरणा दिया करती हैं. शाम को बसेरा करते वक्त, इनकी चहचहाहट, हमें एक ज़िंदा कौम होने का आभास दिया करती है. सिखाती हैं हमें एक दूसरे के घर का ख्याल रखना है. तभी तो हम सब मिलकर, ये तेरा घर, ये मेरा घर वाला संसार बना पाएंगे.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: May 15, 2021, 10:09 AM IST
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