बावरा मन: किसान आंदोलन का हासिल और गांधी

किसान आंदोलन के पूरे एक साल 14 दिन के सफ़र पर नज़र डालें तो इसमें इंकार नहीं कि आंदोलन के दौरान अलग-अलग कारणों से तकरीबन 500 लोगों की मृत्यु भी हुई है. शांतिपूर्ण आंदोलन के दौरान भी अगर लोग मरते हैं, तो ये दुर्भाग्यपूर्ण बात है. किसी भी सरकारी कानून/फरमान के कारण एक भी जान का जाना, किसी भी व्यक्ति को जानलेवा मुसीबत में डालना, किसी भी तरह से सही नहीं कहलाया जा सकता है.

Source: News18Hindi Last updated on: December 18, 2021, 2:42 pm IST
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बावरा मन: किसान आंदोलन का हासिल और गांधी


पिताजी दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज कानपुर के छात्र रहे थे. बताया करते थे कि उन दिनों कॉलेज, हॉस्टल और खाने के मेस में अनुसूचित जाति तथा जनजाति के विद्यार्थियों के साथ छुआछूत व जातीय भेदभाव हुआ करता था. इसी कारण, 1961/62 में उन्होंने वहां अपने अन्य मित्रों के साथ मिलकर एक एसोसिएशन बनाई] जिसका नाम रखा गया ‘शेड्यूल कास्ट यंग एसोसिएशन’.


पिताजी इस एसोसिएशन के अध्यक्ष बनाए गए और उनसे उम्र में काफ़ी सीनियर मोतीराम जी को उसी एसोसिएशन का सचिव बनाया गया. सभी मित्रों ने मिलकर इस एसोसिएशन की नियमावली बनाई तथा कानपुर के सभी कॉलेजों में उसकी उप इकाइयां तैयार की गईं. प्रत्येक माह कानपुर के ऐतिहासिक ग्रीन पार्क में इस एसोसिएशन की मीटिंग होती जिसमें लगभग 250/300 विद्यार्थी उपस्थित होते और हर कॉलेज की समस्याओं का इस मीटिंग में जायजा लिया जाता.


इसके बाद, संबंधित कॉलेज में जाकर वहां के प्रधानाचार्य व हॉस्टल के वॉर्डन से मिलकर समस्याओं का समाधान कराने का प्रयत्न किया जाता. कानपुर कृषि महाविद्यालय जिसे पत्थर कॉलेज के नाम से भी जाना जाता है, विशेषकर उसके हॉस्टल के बारे में सबसे अधिक भेदभाव व अत्याचार की शिकायतें मिलती रहती थी. एसोसिएशन के बहुत प्रयासों के बाद अनुसूचित जाति के छात्रों को आखिर मेस में बैठकर खाना खाने की इजाजत मिल गई.


यानी एसोसिएशन के प्रयासों को सफलता मिलनी भी शुरू हो गई थी. इस से कानपुर में अनुसूचित जाति/जनजाति के छात्रों का एक सशक्त संगठन बन गया, जिसका छात्रों में बहुत अच्छा संदेश गया तथा वे अपने सामाजिक अधिकारों के प्रति जागरूक हो गए. छात्र जीवन से ही, आंदोलन का असर, पिताजी ने देखा था. इसीलिए बाद में, सत्तर के दशक में होने वाले छात्र आंदोलनों के प्रति भी पिताजी की सहानुभूति बनी रही.


आज ये सब बातें इसलिए, क्योंकि हाल ही में एक बड़े किसान आंदोलन की समाप्ति हुई है और बावरा मन भी आंदोलन पर कहने को ‘आंदोलित’ हो रहा है.


कामयाबी बड़ी चीज़ है…

एक साल 14 दिन के लंबे संघर्ष के बाद सरकार ने किसानों के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है. संयुक्त मोर्चा ने घोषणा की, कि सभी किसान मोर्चों पर जीत का जश्न मनाएंगे और उसके बाद आंदोलन की वापसी होगी. इस तरह, वक्त ज़रूर लगा पर आखिर सब वैसे ही हुआ जैसा इन किसानों ने चाहा. कहने वाले इसे आंदोलन का असर भी कह सकते हैं और इलेक्शन का डर भी. ख़ैर…


आंदोलन

इस आंदोलन के पूरे एक साल 14 दिन के सफ़र पर नज़र डालें तो इसमें इंकार नहीं कि आंदोलन के दौरान अलग-अलग कारणों से तकरीबन 500 लोगों की मृत्यु भी हुई है. शांतिपूर्ण आंदोलन के दौरान भी अगर लोग मरते हैं, तो ये दुर्भाग्यपूर्ण बात है. किसी भी सरकारी कानून/फरमान के कारण एक भी जान का जाना, किसी भी व्यक्ति को जानलेवा मुसीबत में डालना, किसी भी तरह से सही नहीं कहलाया जा सकता है.


लेकिन, हम बात सरकारी कानून या फिर किसी सरकारी फरमान पर नहीं करेंगे. हम बात इस युग में ‘आउटडेटेड, अनफेशनेबल, अनकूल’ हो चुके गांधीवाद और सविनय अवज्ञा आंदोलन पर करेंगे. ‘आंदोलनजीवी’ के जीवट को समझेंगे. जानेंगे कि पिछले कुछ सालों में किन दो आंदोलनों ने देश की दिशा और दशा बदली है.


अन्ना आंदोलन

जब अन्ना आंदोलन शुरू हुआ था तो उस वक्त तक के भारत का, हम लोगों का, गांधीवाद पर यकीन अभी कायम था. …गांधी अभी ‘बेकार’ साबित नहीं हुए थे.


… ‘इतिहास वामपंथियों ने ही लिखा है’ की कहानी बाज़ार में बिकी नहीं थी.


…दसवीं के बाद साइंस लेने वालों ने ‘हमें इतिहास नहीं पढ़ाया गया’ की दुहाई देनी नहीं शुरू की थी.


….’व्हाट्सएप युनिवर्सिटी’ अभी नहीं खुली थी.


स्कूल से ले कर सिविल सेवा के ‘उम्मीदवारों’ तक के लिए, बस एनसीईआरटी की किताबें हमारी बाइबल हुआ करती थीं और गांधी को हम, राजू हिरानी के ‘बंदे में था दम’ के पैमाने पर ही तौलते थे.


शायद इसीलिए रामलीला मैदान में अन्ना जब अनशन पे बैठे, तब सारे देश को उनमें गांधी ही दिखाई दिया था. गांधी टोपी एक नए अंदाज़ में एक बार फिर लोगों के सर पर काबिज़ हो गई थी. जिस तरह गांधी की जगाई अलख से भारतवासियों ने विदेशी हुकूमत की चूल्हें हिला दी थीं, अन्ना के शांतिप्रिय अनशन वाले आंदोलन ने, उस वक्त की यूपीए सरकार की हवा टाइट कर दी थी. लोगों को आंदोलित कर दिया था. लोगों में बदलाव की इच्छा जागृत कर दी थी.


जैसे गांधी अपने मिशन में कामयाब हुए थे, वैसे ही अन्ना भी अपने मिशन में कामयाब हुए. 1947 से पहले गांधी ने और 2014 के पहले अन्ना ने एक युग परिवर्तन की भूमि तैयार की. दोनों ने एक नए युग की शुरुआत की. हम गांधी को अन्ना के सामने खड़ा कर उनके कद को कम नहीं कर रहे हैं, बस इतना कह रहे हैं कि जिस स्कूल के संस्थापक प्रधानाचार्य गांधी थे, उसी स्कूल से बरसों बाद शिक्षा ले अन्ना ने भी आंदोलन का जलवा उसी भारत में बिखेरा था.


गांधी/अन्ना/किसान

पूरी दुनिया में शांतिप्रिय आंदोलन के ‘हासिल’, ‘असर’ का इस से बढ़िया कोई और दूसरा नमूना हो ही नहीं सकता. गांधी के सत्याग्रह पर आज सवालिया निशान उठाने वाली पीढ़ी को गांधी, अन्ना और अब किसानों से सीखना चाहिए कि कैसे एक शांतिप्रिय आंदोलन, आज़ादी भी दिलवा सकता है, सत्ता पलट करवाने की भूमिका भी तैयार कर वोटों से भी अपना मकसद हासिल कर सकता है और एक बेहद लोकप्रिय सरकार को ‘रोल बैक’ के लिए भी तैयार कर सकता है.


गांधीवादी आंदोलन में क्रांतिकारी प्रतीक

ये बात सच है कि किसान आंदोलनकारियों ने मंच पर फोटो क्रांतिकारियों की ही लगाई पर ये भी सच है कि उन्होंने तरीका, गांधी का ही अपनाया. लालकिले पर हुई हिंसा की प्रतिक्रिया में किसान संयमित रहे, संगठित रहे. टूटे नहीं. ना मनोबल से और न ही एकता में. इसी तरह लखीमपुर खीरी कांड के वक्त किसानों ने हिंसा झेली, मौतें झेलीं और क्षणिक हिंसक प्रतिक्रिया के अलावा सूझबूझ से काम लिया. नतीजा सबके सामने है. हिंसा करने वाला आरोपी आज जेल में है. शांतिप्रिय आंदोलन करने वाले किसान अपने घर लौट चुके हैं.


एक तपस्या आम लोगों की भी

इस एक साल तक चलने वाले किसानों के आंदोलन में उन लाखों आम लोगों का भी किसानों को सहयोग रहा जिन्होंने इस आंदोलन की वजह से सैंकड़ों परेशानियां झेली और उफ्फ भी न की. इन स्थानीय लोगों ने अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी में आवागमन में रूकावटें देखीं, रास्तों और दिशाओं का बदलाव झेला, वक्त की बरबादी सही… पर उन्होंने किसानों का विरोध न कर के भी एक तरह से किसानों का साथ ही दिया है.


बिना भाग लिए भी इस आंदोलन में इन शहरी निवासियों ने अपनी भागीदारी दर्ज करवाई है. अब जब सफलता हाथ लग गई है, लक्ष्य प्राप्त हो चुका है, किसान नेताओं को दिल से उन सभी स्थानीय लोगों का शुक्रिया अदा करना चाहिए, कष्ट के लिए खेद व्यक्त करना चाहिए जिन्होंने जाने अंजाने उनके साथ एक तपस्या की है.


शोध कार्य

अब जब सब ठीक हो गया है, आंदोलन खत्म हो गया है, ज़रूरत है विचार विमर्श की, गहन अध्ययन की. शांतिप्रिय आंदोलनों के प्रभावों और उनकी आज के युग में उपयोगिता के हासिल पर अब एक नए सिरे से शोध का सही वक्त आ गया है. ये इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि आने वाली नस्लों को, युवा पीढ़ी को हम कह सकें कि


…आंदोलन शांतिप्रिय भी होते हैं.


…आंदोलन कामयाब भी होते हैं… धन्यवाद

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: December 18, 2021, 2:42 pm IST