बावरा मन: मेरी मर्जी, मेरा पर्दा

इसमें कोई शक नहीं कि धार्मिक चिह्न इज्‍जत के काबिल होते हैं लेकिन परंपराओं का निर्वहन तभी तक अच्छा लगता है जब तक उसमें अपनी मर्जी हो. मसला हमारी निजी चॉइस का भी तो है. जिसको पसंद है, जिसकी आस्था है, वो बिलकुल पहने. जिसको नहीं पसंद, वो न पहने. मोरल पोलिसिंग के डर से या किसी लालच की वजह से निभाई गई परंपरा में आध्यात्मिक सुख नहीं मिलता है.

Source: News18Hindi Last updated on: October 2, 2022, 6:53 pm IST
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बावरा मन: मेरी मर्जी, मेरा पर्दा

दोस्तों मैं ‘अमर, अकबर, एंथनी’ वाला अकबर इलाहाबादी हूं. कुछ दिन से सोच रहा हूं कि जिस जोश के साथ मैंने उस जमाने में कह दिया था कि ‘पर्दा नशीं को बेपर्दा न कर दूं तो अकबर मेरा नाम नहीं है.‘ क्या आज के युग में मैं ये कव्वाली गा पाता? उस समय तो मैंने ये मजे मजे में गा दिया. दर्शक हमारे फिल्मी ससुर मुकरी पर खूब हंसे, महबूबा बाग बाग होते ‘हाय मैं शर्म से लाल हुई’ वाली अदा मारने लगी. फिल्म सुपर डुपर हिट हो गई. मनमोहन देसाई की आत्मा को शांति मिले, सब ठीक ठाक निपट गया था. अमर, अकबर, एंथनी, ऑल टाइम आइकॉनिक फिल्म साबित हुई. लेकिन सोचिए अगर यही कव्वाली आज के समय गाई जाती तो ये भी दीपिका की पद्मावत की तरह बहुत से लोगों को नाराज कर सकती थी. हेट आर्मी पीछे पड़ सकती थी. फतवा जारी हो सकता था. अब प्रश्न ये उठता है कि… क्या सत्तर के दशक में दुनिया ज्‍यादा उदार थी? हमारे भारत के लिए तो थी. पर सबके लिए नहीं थी.


उदार भारत की उदार तस्वीर

आज मुझे याद आ रहा है कि सत्तर के जिस दशक में मैं पर्दा नशीं को बेपर्दा करने वाला गाना गा रहा था, उसी समय ईरान में पर्दा प्रथा को और मज़बूत करने की कवायद चल रही थी. वहां के तथाकथित उदारवादी शाह, देश से पलायन कर रहे थे. शाह की मॉडर्न बीवियां, फराह दीबा और सुरैया बरसों ईरानी महिलाओं के लिए फैशन आइकन रहीं थी. लेकिन अब जब समाज शाह के खिलाफ उठ खड़ा हुआ था, बाकी के मसलों के अलावा लोगों को लगने लगा था कि शाह की खुली सोच उन्हें धर्म से दूर ले जा रही है. इस तरह सत्तर के दशक वाले हमारे भारत में जब हम ये कव्वाली गा पा रहे थे, ईरान में उदारवादी सोच रखने वाले ईरानी समाज की औरतों को एक बार फिर धार्मिक कारणों से पर्दा अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा था. शाह की मुखालफत में ईरान के लोग कट्टरपंथ को अपनाने के लिए भी तैयार हो गए थे. और फिर वही हुआ जो होना था.


ईरान की इस्लामिक क्रांति के बाद खोमेनी के ईरान में औरतें पर्दा नशीं हो गईं. शुरू में जरूर उन्हें लगा होगा कि ये कुछ समय की ही बात होगी. पर धीरे धीरे ये नियम बन गया. पर्दा/हेडस्कार्व या हिजाब उन ईरानी औरतों की नियति बन गया. आज 40 साल बाद ईरान में पर्दा/हेडस्कार्व वहां की सरकार के लिए एक मुसीबत बन गया है. हिजाब की वजह से हो रहे प्रदर्शनों ने ईरान की कानून व्यवस्था को कमजोर कर दिया है.


मेरी मर्जी

इसमें कोई शक नहीं कि धार्मिक चिह्न इज्‍जत के काबिल होते हैं. मान्यताओं की भी अपनी मर्यादा होती है. पर सिर्फ उनके लिए जो उसमें आस्था रखते हैं. आज दुनिया भर में पर्दे के नाम पे इतने प्रदर्शन हो रहे हैं कि मसला ईरान से निकल तुर्की और अमेरिका तक पहुंच गया है. पर्दा नशीं खुद कह रही हैं, “बस बहुत हुआ, और नहीं चहिए पर्दा”. ये कह कर महिलाएं कैंची से अपने बाल काट रही हैं. आज बाल काटना हिजाब के खिलाफ, मुखालफत की निशानी बन गया है. ठीक वैसे ही जैसे जिया के पाकिस्तान में साड़ी पहनना विद्रोह की निशानी हो गया था.


माहसा अमीनी

ईरान में ये सारी कहानी तब शुरू हुई जब कुछ दिनों पहले बाइस साल की युवती, माहसा अमीनी की पुलिस कस्टडी में मौत हो गई. अमीनी को सर ना ढ़ंकने की वजह से हिरासत में लिया गया था. हिरासत में उसकी तबियत बिगड़ गई थी और फिर तीन दिन अस्पताल में रहने के बाद उसकी मौत हो गई. अमीनी की मौत ने ईरान की महिलाओं को रोष से भर दिया. जगह जगह प्रदर्शन होने लगे. इन प्रदर्शनों का दुनिया के कई हिस्सों से महिलाओं ने समर्थन भी किया. इस्तांबुल टर्की में मशहूर गायिका मालिक मोस्सो ने स्टेज पर परफॉर्म करते समय अपने चाहने वालों के सामने तालियों के बीच, केंची से अपने बाल काट ईरान की महिलाओं के साथ अपनी सहानुभूति व्यक्त की.


इस सीन को देख कर जेहन में इक़बाल बानो की याद ताज़ा हो गई. ये वो दौर था जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति जियाउल हक़ ने महिलाओं के साड़ी पहनने पर रोक लगा रखी थी. इसी साड़ी बैन के खिलाफ़ इक़बाल बानो ने सरे आम अपने शो में न सिर्फ साड़ी पहनी थी बल्कि फैज़ की इंकलाबी नज़्म हम देखेंगे भी गाई थी. यूट्यूब पर मौजूद इक़बाल बानो की ये रोंगटे खड़े कर देने वाली परफॉर्मेंस, हर मुल्क और हर समय की महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत है.


क्रिश्चियान अमनपोर

उधर, इसी दौरान अमरीका में सीएनएन की वरिष्ठ एंकर क्रिश्चियान अमनपोर को न्यूयॉर्क में ईरानियन राष्ट्रपति को इंटरव्यू करना था. जब उन्हें इंतज़ार करते बहुत देर हो गई, राष्ट्रपति के सहयोगी ने आके उनसे कहा कि ये इंटरव्यू तभी संभव हो पाएगा जब क्रिश्चियान अपना सर ढंकेंगी. क्रिश्चियान ईरानी मूल की अमरीकी हैं. उन्हें अमरीकी धरती पर ये शर्त हास्यास्पद लगी और उन्होंने इस शर्त को मानने से इंकार कर दिया. इस से पहले बतौर एंकर क्रिश्चियान ने अपने जीवन में कई ईरानियन राष्ट्रपतियों की इंटरव्यू की है पर ये शर्त उनके सामने पहली बार रखी गई थी. शायद अपने देश के हिजाब विरोधी प्रदर्शनों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रपति को ये अजीब फैसला लेना पड़ा था.


अल्बानियन और तुर्की लड़कियां

पूर्वी यूरोप के देशों में रहने वाली अल्बेनियन मुस्लिम लड़कियों में हिजाब का चलन न के बराबर था. लेकिन सऊदी सरकार के बेनिफिट्स की वजह से पिछले दो दशकों से वहां भी हिजाब/हेडस्कार्व का चलन बढ़ गया है. टर्की में भी अर्दोगन की सरकार की नीतियों की वजह से वहां की औरतों में हिजाब/हेडस्कार्व का चलन बढ़ा है.


वैसे परंपराओं का निर्वहन तभी तक अच्छा लगता है जब तक उसमें अपनी मर्जी हो. मसला हमारी निजी चॉइस का भी तो है. जिसको पसंद है, जिसकी आस्था है, वो बिलकुल पहने. जिसको नहीं पसंद, वो न पहने. मोरल पोलिसिंग के डर से या किसी लालच की वजह से निभाई गई परंपरा में आध्यात्मिक सुख नहीं मिलता है. परंपराओं को निभाने में जितनी ज़रूरी आस्था है उस से कहीं ज्‍यादा जरूरी निजी आज़ादी है. आखिर आस्थाएं जोर जबरदस्ती से नहीं निर्णय की आजादी से ही बचती हैं, सार्थक होती हैं.

धन्यवाद

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: October 2, 2022, 6:53 pm IST
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