Choose Municipal Ward
    CLICK HERE FOR DETAILED RESULTS

    मनी हीस्ट, बेला चाओ और क्रांतिकारी गीत

    क्रांतिकारी विचार, क्रांतिकारी भाषा, इंकलाबी शायरी, इंकलाबी साहित्य, नौजवानों को हमेशा प्रभावित करते हैं. इनकी नौजवानों में पैठ रहती है. इसीलिए युवा वन्देमातरम्, इंकलाब ज़िंदाबाद, हो हो हो ची मिन्ह, वी शैल फाइट वी शैल विन, हम देखेंगे और बेला चाओ (Bella ciao) से बहुत जल्दी प्रभावित होते हैं.

    Source: News18Hindi Last updated on: November 21, 2020, 9:53 AM IST
    शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
    मनी हीस्ट, बेला चाओ और क्रांतिकारी गीत
    बेला चाओ, कभी रहा होगा इटली में क्रांति का द्योतक. आज की पीढ़ी उसे 'प्रोफेसर' के चोरों के गीत की तरह ही जानती है. (फोटो साभार- नेटफ्लिक्स )
    Una mattina mi son alzato
    O bella ciao, bella ciao, bella ciao, ciao, ciao
    Una mattina mi son alzato
    E ho trovato l'invasor
    बेला चाओ (Bella Ciao) यानी Goodbye (Ciao) beautiful girl (Bella)!
    कभी-कभी बच्चे भी हमें बच्चा समझते हैं. उन्हें लगता है शायद हम भी नादान हैं. करीब हफ़्ता भर पहले मेरा बेटा और उसके दोस्त, आपस में बातें कर रहे थे और ज़िक्र चल पड़ा मनी हीस्ट (Money Heist) के बारे में. और फिर ज़िक्र हुआ 'बेला चाओ' का. बच्चे पहले ज़रा सकपकाए, फिर खुशी से सुनने लगे. हमने उन्हें 'बेला चाओ' की कहानी सुनाई, उसका इतिहास बताया. और हां, उन्हें ये अच्छा लगा कि हम भी बेला चाओ और मनी हीस्ट पर उनसे बात कर सकते हैं.

    क्रांतिकारी गीत या तो विद्रोह को आवाज़ देते हैं या फिर राष्ट्रवंदन को. कभी इन गीतों का प्रयोग आंदोलनकारी सत्ता की दमनकारी नीतियों के खिलाफ़ करते हैं, तो कभी इनका प्रयोग देश के प्रति निष्ठा दिखाने में होता है. लेकिन दोनों ही में देशप्रेम का पुट ज़रूर होता है. आजकल बेला चाओ को मनी हीस्ट ने पॉपुलर कर दिया है. एंटी फासीवादी वॉर क्राई, बेला चाओ, कभी रहा होगा इटली में क्रांति का द्योतक. आज की पीढ़ी उसे 'प्रोफेसर' के चोरों के गीत की तरह ही जानती है. जो गीत आंदोलनकारियों को जोश देता था, 2017 तक मनी हीस्ट में लगे चोरों को जोश देने लगा.
    2020 में समय ने पलटी मारी. कोविड से त्रस्त इटली, स्पेन, जर्मनी और फिर पूरी दुनिया की हारी हुई, उदासीन जनता को एक बार दोबारा बेला चाओ का सहारा मिला. इस गीत ने मुश्किल समय में टूटी हुई जनता को एक सहारा दिया. अपने घरों की छतों से, बालकानियों से, जगह-जगह लोग इसे गाने लगे, अपने वाद्य यंत्रों पर बजाने लगे. मानो इस गीत ने फिर लोगों को आशा की किरण दिखाई हो. गीत बेला चाओ अब वायरल हो चुका था. आखिरकार ये गीत हमेशा से हारे हुओं का ही तो सहारा रहा है.


    क्रांतिकारी गीत
    दरअसल क्रांतिकारी विचार, क्रांतिकारी भाषा, इंकलाबी शायरी, इंकलाबी साहित्य, नौजवानों को हमेशा प्रभावित करते हैं. इनकी नौजवानों में पैठ रहती है. इसीलिए युवा वन्देमातरम्, इंकलाब ज़िंदाबाद, हो हो हो ची मिन्ह, वी शैल फाइट वी शैल विन, हम देखेंगे और बेला चाओ (Bella ciao) से बहुत जल्दी प्रभावित होते हैं.

    ब्रिटिश राज के दौरान प्रतिबन्धित छोटी-छोटी पुस्तिकाओं में प्रकाशित देशभक्ति वाले गीतों ने पूरे हिन्दुस्तान की आम जनता को एक क्रान्तिकारी बदलाव के लिये आन्दोलित किया था. लोगों में एक अलख जगाया था. इन गीतों में सबसे ज्यादा पवित्र है 'वन्देमातरम'. मुझे ये गीत बचपन से ही ज़बानी याद था, पसन्द था क्योंकि इसमें मेरा नाम 'ज्योत्सना' था. बालमन को, या फिर कहिए 'बावरे मन' को बस इतनी सी बात के लिए ये गीत पसंद था. बाद में चलकर इसकी ऐतिहासिकता के कारण भी प्रिय हो गया.

    वन्देमातरम
    बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने ये गीत, संस्कृत बांग्ला मिश्रित भाषा में रचा था. इस गीत का प्रकाशन सन् 1882 में उनके द्वारा लिखे उपन्यास 'आनन्द मठ' में दिए एक गीत के रूप में हुआ था. उपन्यास में यह गीत भवानन्द नाम के संन्यासी द्वारा गाया गया है. इसकी धुन यदुनाथ भट्टाचार्य ने बनायी थी. यदुनाथ भट्टाचार्य, रवीन्द्रनाथ ठाकुर के संगीत गुरु थे.

    बंगाल में स्वाधीनता आंदोलन के दौरान रैलियों में जोश भरने के लिए यह गीत गाया जाता था. धीरे-धीरे यह गीत लोगों में ज़बरदस्त लोकप्रिय होता गया. ब्रिटिश सरकार भी इसकी लोकप्रियता से डरने लगी थी. सन् 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने यह गीत गाया था. पांच साल बाद यानी सन् 1901 में कलकत्ता में हुए एक और अधिवेशन में श्री चरणदास ने यह गीत पुनः गाया. सन् 1905 के बनारस अधिवेशन में इस गीत को सरलादेवी चौधरानी ने स्वर दिया.

    कांग्रेस-अधिवेशनों के अलावा आज़ादी के आंदोलन के दौरान इस गीत के प्रयोग के काफी उदाहरण मौजूद हैं. लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस 'जर्नल' का प्रकाशन शुरू किया था, उसका नाम वन्दे मातरम् रखा था. सन् 1907 में मैडम भीखाजी कामा ने जब जर्मनी के स्टुटगार्ट में तिरंगा फहराया तो उसके मध्य में 'वन्दे मातरम्' ही लिखा हुआ था.

    सन् 2003 में बीबीसी द्वारा आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे में उस समय तक के सबसे मशहूर दस गीतों का चयन करने के लिए दुनिया भर से लगभग 7000 गीतों को चुना गया था, उसमें वन्दे मातरम् टॉप के 10 गीतों में दूसरे स्थान पर था.

    सरफरोशी की तमन्ना
    भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 'सरफरोशी की तम्मना' को भी एक ऊंचा मुक़ाम हासिल है. सरफरोशी की तमन्ना भारतीय क्रान्तिकारी बिस्मिल अज़ीमाबादी द्वारा लिखित एक प्रसिद्ध देशभक्तिपूर्ण नज़्म है. जब ये कालजई नज़्म लिखी गई होगी, क्या मालूम था कि 2020 की जवान नस्ल भी इससे इत्तेफ़ाक़ रखेगी. ये हर वक्त के आंदोलनकारियों के लिए एक प्रेरणा मंत्र बन जाएगी. दरअसल, पुराने पटना शहर के रहने वाले बिस्मिल अज़ीमाबादी की इस तमन्ना को जब रामप्रसाद बिस्मिल की आवाज़ मिली तो ये नज़्म उस समय के युवा क्रान्तिकारियों का मूल मन्त्र बन गई, बेहद मशहूर हो गई और इंकलाबी शायरी का सर्वोत्तम नमूना हो गई.

    इस नज़्म को बिस्मिल बहुत पसंद करते थे और अक्सर अपने इंकलाबी साथियों के बीच बैठ इसे सुनाया भी करते थे. रामप्रसाद बिस्मिल ने ये शेर, फांसी के फंदे पर झूलते वक्त भी कहा था और शायद इसीलिए इस शेर को अमरत्व की प्राप्ति हो गई और लोग इसे राम प्रसाद बिस्मिल जी से ही जोड़ के देखने लग गए.


    बिस्मिल की शहादत के बाद इसे स्वतन्त्रता सेनानियों की नौजवान पीढ़ी, जैसे शहीद भगत सिंह तथा चन्द्रशेखर आजाद आदि के साथ भी जोड़ा जाता रहा है.

    क्रांतिकारी गीत और फिल्में
    कई फिल्मों में इन इंकलाबी गीतों को जगह मिली है. इन फिल्मों के ज़रिए सरफ़रोशी की तमन्ना, मेरा रंग दे बसन्ती चोला!, वन्देमातरम ने पॉपुलर कल्चर में प्रवेश किया है. आजकल तो पॉपुलर कल्चर का एक स्तम्भ वेब सिरीज़ भी बन गईं हैं. मनी हीस्ट में प्रोफेसर के ज़रिये आजकल युवा पीढ़ी में बेला चाओ बहुत हिट हो रहा है. सीएए-एनआरसी के खिलाफ़ आन्दोलन में जहां बेल चाओ का भारतीय हिन्दी रूपांतरण सड़कों पर छात्रों द्वारा गाया गया. वहीं फ़ैज़ की क्रांतिकारी नज़्म 'हम देखेंगे' भी खूब प्रचलित हुई. 'हम देखेंगे' के यूं तो हजारों प्रचलित रूपांतर यूट्यूब पर देखने सुनने को मिल सकते हैं पर जो बात इक़बाल बानो के गाए इस नज़्म की है, उसकी बात ही कुछ और है.

    हम देखेंगे
    दरअसल इक़बाल बानो की आवाज़ ने उस समय बगावत की नुमाइंदगी की थी, जब पाकिस्तान में ज़ियाउल हक़ की सरकार थी. रूढ़ीवादी सरकार ने 'साड़ी और फ़ैज़' दोनों पर पाबंदी लगा रखी थी. उस वक्त इक़बाल बानो ने 50,000 लोगों के सामने न सिर्फ साड़ी पहनी, बल्कि फ़ैज़ की नज़्म 'हम देखेंगे' भी गाई.

    इस नज़्म में बीच में जब आता है - 'सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख़्त गिराए जाएंगे', तो एक लाख हाथों ने आपस में मिलकर वह शोर मचाया कि स्टेडियम गूंज उठा. तकरीबन दस मिनट तक लगातार तालियां बजती रहीं. इक़बाल बानो ने पाबंदियों की धज्जियां उड़ाकर रख दी थीं. माहौल में गर्मी देखकर पुलिस की हिम्मत नहीं हुई कि उन्हें गिरफ्तार कर सके.


    हो हो हो ची मिन्ह
    वियतनाम के इंडो चीनी आवाम के लीडर हो ची मिन्ह कहते थे, 'वियतनामी मुक्तिसंग्राम विश्व-मुक्ति-संग्राम का ही एक हिस्सा है और मेरी जिंदगी विश्वक्रांति के लिए समर्पित है.' और इसीलिए उनके नाम से जुड़ी... 'हो हो हो चि मिन्ह, वी शैल फाइट, वी शैल विन' की वॉर क्राई के साथ, तीन करोड़ वियतनामी जनता ने अमेरिकी साम्राज्यवादियों के हौसले पस्त कर दिए थे. अमरीका के लिए वियतनाम एक मिसएड्वेंचर था, जिस मिसएड्वेंचर पर ना जाने कितनी ही फिल्में बन चुकी हैं.

    कुल मिलाकर दुनिया भर में पीढ़ियों ने क्रांतिकारी गीतों, नगमों और नारों से प्रेरणा पाई है. इस प्रेरणा से ही असंभव को संभव किया है. क्रांति का आग़ाज़ किया है. लिबर्टी, इक्वालिटी, फ्रेटरनिटी का ख़्वाब देखा है. नई पुरानी नस्लों को जीने का हौसला दिया है. एक बेहतर कल की उम्मीद दिखाई है. और इसी उम्मीद पर दुनिया कायम है. हम सब कायम हैं.

    PS- दो दिन पहले उस समय मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब मेरे बेटे के मित्र सिद्धार्थ ने बेला चाओ (Bella Ciao) को गिटार पर रिकॉर्ड कर मेरे लिए खास तोहफे के तौर पर वॉट्सएप किया. उसका ज़िक्र इसलिए भी जरूरी है क्योंकि उसी की रिकॉर्डिंग सुनकर मुझे इस आर्टिकल की प्रेरणा मिली. धन्यवाद सिद्धार्थ!
    ब्लॉगर के बारे में
    ज्योत्स्ना तिवारी

    ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

    ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

    और भी पढ़ें

    facebook Twitter whatsapp
    First published: November 21, 2020, 9:53 AM IST
    पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर