बावरा मन: ख़ाण, अख्यान, कहावतें और लोकोक्तियां

मिट्टी से जुड़ी ये कहावतें आज बेशक भुला दी गई हों, लेकिन इनको यादकर हम आज भी दुनियादारी का पाठ पढ़ सकते हैं. सही गलत का अंदाज़ लगा सकते हैं. हम कहां से चले थे और आज कहां तक पहुंचे हैं इसका मूल्यांकन कर सकते हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: October 10, 2020, 9:59 AM IST
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बावरा मन: ख़ाण, अख्यान, कहावतें और लोकोक्तियां
पंजाब में आपको कच्चा घर और उदास चेहरा बड़ी ही मुश्किल से मिलेगा. (प्रतीकात्मक)
पंजाब की धरती को सिर्फ पांच दरयाओं ही ने नहीं, खून, पसीने और अथरुंओं /हंजुओं (आसूंओं) ने भी सींचा है. इस धरती को अनुभवों ने अमीर किया है. सदियों और पीढ़ियों की इस भोगी हुई सच्चाई ने यहां के लोगों को सदा ही तल्ख़ियां छोड़, आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है. इन्हें समय की क्षणभंगुरता का एहसास करवाया है. अपनी बाहों पर, अपने कर्मों पर विश्वास रखना सिखाया है. फितरतन यहां का निवासी मेहनती और 'खुशरेणा' है. शायद यही कारण है कि पंजाब में आपको कच्चा घर और उदास चेहरा बड़ी ही मुश्किल से मिलेगा.

हर हाल में जीना और खुश रहना पंजाब के लोगों का मिज़ाज है और यही मिजाज़ इन्हें दुनिया के हर कोने में हर दिल अज़ीज़ बनाता है. पेश हैं पंजाब की धरती के जनजीवन से जुड़े कुछ मुहावरे और लोकोक्तियां, जो मुझे मौखिक परंपरा के ज़रिये मिले हैं. इन्हें साहित्य में शायद जगह ना मिली हो, पर एक वक्त था जब येे सब लोगों की रोज़मर्रा की बातचीत में शामिल थे. बड़ी मेहनत से मैंने इन्हें एकत्र किया है, ख़ास आपके के लिए...

1. मेहनतकशी
चूंकि मेहनतकशी यहां के बाशिंदों के खून में है. इसी लिए ये मेहनती लोग मानते हैं...
ध्रिग उन्हांना जीवणा, जिन्हाँ परायी आस
तर ओ सूर्या, आपणी बाईं
धिक्कार है उसकी ज़िन्दगी को जिसे दूसरों से कोई आस होती है. सूर्या यानि शूरवीर वो होता है जो अपनी ही बाहों के बल पर, अपने कर्मों से, ज़िन्दगी से दो-दो हाथ करता है.पर अधीन सपणे सुख नहीं!
पराधीन रहकर सपने देखना बेकार है. आज़ाद ख्याल रहकर, आज़ाद सपने देखने में ही सुख है.

बेकार से बेगार भली
खाली बैठने से कहीं अच्छा है कि बिना दाम के ही, जो काम मिले वो कर लो. मेहनत करते रहो, कर्म करते रहो. खाली बिल्कुल भी न बैठो.

2. अच्छी सेहत
अच्छी सेहत बड़ी नियामत होती है, इसलिए सेहतमंद रहना ज़रूरी है. इसीलिए कहा गया है कि...
अखाँ गईयां ते जहान गया
दंद गए ते स्वाद
आंखों और दांतों, दोनों की हिफ़ाज़त ज़रूरी है. आंख नहीं, तो इंसान दुनिया देखने से रह जाता है और अगर दांत नहीं, तो वो स्वाद से महरूम रह जाता है.

जो करे घ्यो
ना करे मां, ते ना करे प्यो
किसी भी व्यक्ति के अच्छे स्वास्थ्य के लिए, रोग क्षमता बढ़ाने के लिए, मां बाप की दुआओं से बढ़कर, देसी घी, शरीर को फ़ायदा पहुंचाता है. यानी देसी घी रॉक्स

3. पैसा
पैसे की अहमियत दुनिया का हर इंसान समझता है, इसीलिए ही इस धरती पर कहा जाता था...

दाम सो जो मुट्ठी में

उसी पैसे को अपना समझो जो अपने पास हो. मुश्किल वक़्त में जो अपने हाथ में पैसा होता है, वही काम आता है. दूसरे की तरफ़ उम्मीद नहीं लगानी पड़ती. क्योंकि पैसे की चीज़ तो बनती है, चीज़ के पैसे नहीं बनते. कुल मिलाकर समझिए कि फ़िज़ूल खर्ची अच्छी नहीं होती, इंसान को बचत करनी चाहिए.

देंण फजूली, लेंण हिक्मत
बड़े बुजुर्ग कहा करते थे, किसी को आप पैसा उधार देते हैं, तो वो पैसा फ़िज़ूल ही जाता है. क्योंकि वापिस लेने के समय, इंसान को तमाम हिक्मत (सूझबूझ, दिमाग, मिन्नत, तरले) करनी पड़ती हैं. पुराने लोग कहते थे, पैसा उधार देना आसान है, वापिस मांगो तो रिश्ते खराब हो जाते हैं. और वहीं अगर हाथ में पैसा हो तो नए रिश्ते भी बन जाते हैं... वेख माया दी फेरी, मां तेरी है कि मेरी.

4. पुरुषप्रधान समाज के वक्त वाली रिश्तों के प्रति सोच
कभी कहा जाता था...

भेड़ी रन, घरे नी चट्टी
ना मारी जाए, ना सट्टी

भेड़ी यानि ख़राब, रन यानि घरवाली. खर्चीली घरवाली घर को दीमक की तरह चटकर जाती है. ना उसपर हाथ उठा सकते हैं, और ना ही वो सट्टी यानी फेंकी जा सकती है. ऐसी पत्नी को घर में बसाकर रखना मजबूरी हो जाती है. यानी अच्छी पत्नी, किस्मत से मिलती है.

दुधली गायीं नी लत वी चंगी.
जो भरपूर दूध देने वाली गाय होती है, वो अगर दुलत्ती भी मारती हो, तब भी अच्छी होती है. उसके नखरे भी सहे जा सकते हैं. यानी ऐसी घरवाली जो कड़वा बोलती हो पर घरबनाऊ हो, अच्छी होती है.

ना मैं सोणी, ना गुण पल्ले.
घरवाली में अगर ना सुन्दरता हो ना ही कोई गुण (सिफ्त), तो वो बेकार होती है. औरत बेशक सुन्दर ना हो पर उस में कोई ना कोई गुण ज़रूर होना चाहिए.

लेकिन सारी उम्मीद सिर्फ पत्नी से ही रखी जाए, ऐसा भी नहीं है. यहां के समाज में पति से भी उतनी ही उम्मीद रखी जाती थी.

चन्द्रा ग्वांड ना होवे, लायिलग ना होवे घरवाला
उलटी सोच रखने वाला पड़ोस और इधर-उधर मुंह मारने वाला पति, दोनों नहीं होने चाहिए. दोनों ही जीवन से सारे सुख समाप्त कर देते हैं, जीवन भर का दुख देते हैं. क्योंकि दोनों को आप बदल नहीं सकते. यानी घर में सुख शान्ति के लिए अच्छा पति और अच्छा पड़ोस होना जरूरी है.

रीसें लाइये, रीसें खाइए, रीसें कतिये सूत
रीसें हथ ना आंवदे, धन, जोबन और पूत
रीस यानि नकल. इंसान चाहे जितनी भी नकल कर के खा ले, ओढ़ ली, पहन ले.
नकल से भी ये तीन चीज़ें कभी हाथ नहीं आतीं...धन, खूबसूरती और बेटे.
(याद रहे ये पुरुष प्रधान समाज के वक्त की गढ़ी हुई लोकोक्तियाँ हैं)

5. वफादारी
इस धरती पर बहादुरी और वफादारी की मिसालें बनी हैं. पहले ज़माने में बहादुरी और वफादारी की कसम कुछ इस तरह से ली जाती थी कि...

बांह जिन्हां नी पकड़िए
सिर दीजे, बांह ना छोड़िए
एक बार जिससे प्यार, दोस्ती कर लो, किसी का हाथ पकड़ लो तो फिर सर कटवा दो, पर हाथ और साथ ना छोड़ो.

6... ह्यूमर/सटायर
जिसने घर दाणें, उसने कमले वी स्याणें
जो दाणें यानी दाने/अनाज/ पैसे वाला होता है उसकी औलाद अगर कमली यानी पागल/बेकार/निखट्टू भी हो तो, काम की ही कहलाती है.

(और उन्हें ब्याह के लिए अच्छी लड़की भी मिल जाती है)

मुंह खाणा है, ते अखां शर्माणियां ने
किसी का एहसान/तोहफ़ा/रिश्वत कभी नहीं लेना चाहिए. एक बार ये ऐब मुंह लग जाएं तो आंखों में, देने वाले के लिए लिहाज़ आ जाता है. आप उसका काम करने के लिए मजबूर हो जाते हैं. इसलिए, दूसरे का दिया, कभी नहीं लेना चाहिए.

अखों दिसना नहीं, ते नाम रोशनायी
यानी नाम बड़े दर्शन छोटे

आपणा ही नक, ते अपणी ही छुरी
यानी अपने ही नाक को अपनी ही छुरी से काटना. अपनों के हाथों ही अपना नुकसान करवा बैठना.
यानी ज़िन्दगी के वो शर्मनाक क्षण, जो किसी अपने की गलती द्वारा ही दिए गए हों.

चिड़िया चोग चुगेदी फाती, तू क्यों फाताँ एं कौवा?
यानी चिड़िया तो दाना चुगने के लालच में जाल में फंसी, हे कौवे तुम क्यों बिना कारण जाल में फंस गए.
यानी गेहूं के साथ घुन का भी पिस जाना.

7. व्यापार और वैश्वीकरण
ये कहावतें व्यापारियों के लिए कही गई होंगी, पर इनका इस्तेमाल आम ज़िन्दगी में भी खूब होता था.

सुख ना सुतां एं थोरिया, क्यों जन्म्यां एं पेढ़े वार
सुख की नींद व्यापारी को कहां नसीब, मानो उसका जन्म ही खराब दिन/वार में हुआ हो. वो दिन रात चल कर लंबा सफ़र तय किया करते थे. दरअसल जिस भी व्यक्ति के हिस्से काम ही काम होता था, आराम की नींद कम, उसी के लिए येे कहावत कही जाती थी. चाहे वो किसान हो, जवान हो या फिर व्यापारी हो.

सौ कोहे, घर आपणा सोहे.
सौ कोस चल लो, लेकिन अपना ही घर आखिर सुख देता है.

जो सुख झज्जू दे चौबारे, ओ ना बलख़ ना बुखारे
जो सुख अपने गांव में, अपने पिता के चौबारे में है, वो ना बलख़ शहर (अफ़ग़ानिस्तान का ऐतिहासिक शहर) में है, ना बुखारा शहर (उज़्बेकिस्तान के शहर) में है.

अपणे घरे नी, अधि वी चंगी.
अपने घर की आधी रोटी, बाहर विदेश, दूर देश की पूरी रोटी से ज़्यादा अच्छी है.

8. गुण
और आखिर में ये एक कहावत जो पीढ़ियों से हमने घर में सुनी और मेरे बावरे मन को बहुत पसन्द है...

नहीं मोहताज ज़ेवर के, जिसे खूबी खुदा ने दी
देखो चांद कितना खुशनुमा लगता है, बिन गहने.
ज़ेवर से ज़्यादा खूबी यानि गुण की अहमियत होती है.
इंसान अपने गुणों से पहचाना जाता है ना कि गहनों और कपड़ों से.

मिट्टी से जुड़ी ये कहावतें आज बेशक भुला दी गई हों, लेकिन इनको यादकर हम आज भी दुनियादारी का पाठ पढ़ सकते हैं. सही गलत का अंदाज़ लगा सकते हैं. हम कहां से चले थे और आज कहां तक पहुंचे हैं इसका मूल्यांकन कर सकते हैं.
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: October 10, 2020, 9:59 AM IST
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