बावरा मन: तनिष्क का ऐड देखा तो ख्याल आया- 'मियां बीबी राज़ी तो क्या करेगा काज़ी'

पहली बार तनिष्क का ऐड देखा तो लगा इससे खूबसूरत कुछ हो ही नहीं सकता. एक समावेशी समाज की परिकल्पना का प्रतिबिंब यह ऐड, मन को पहली नजर में भा गया. वो इसलिए कि अभी तक मेरे अन्दर की गट फीलिंग काम कर रही थी. परंतु जैसे ही लोगों की प्रतिक्रिया आनी शुरू हुई और वह प्रतिक्रिया मैंने सुननी शुरू की, मेरे अन्दर भी एक द्वंद्व शुरू हो गया.

Source: News18Hindi Last updated on: October 17, 2020, 10:32 AM IST
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बावरा मन: तनिष्क का ऐड देखा तो ख्याल आया- 'मियां बीबी राज़ी तो क्या करेगा काज़ी'
तनिष्‍क के विज्ञापन को लेकर विवाद चल रहा है.
पहली बार तनिष्क का ऐड देखा तो लगा इससे खूबसूरत कुछ हो ही नहीं सकता. एक समावेशी समाज की परिकल्पना का प्रतिबिंब यह ऐड, मन को पहली नजर में भा गया. वो इसलिए कि अभी तक मेरे अन्दर की गट फीलिंग काम कर रही थी. परंतु जैसे ही लोगों की प्रतिक्रिया आनी शुरू हुई और वह प्रतिक्रिया मैंने सुननी शुरू की, मेरे अन्दर भी एक द्वंद्व शुरू हो गया. जब सुना कि गुजरात के एक शहर में तनिष्क के एक शोरूम पर अटैक हो गया है, तब लगा कि जब इतने लोग मुख़ालफ़त कर रहे हैं तो इसमें ज़रूर कुछ बात होगी. बात को जानने के लिए टीवी खोला, बस वहीं गलती हो गई.

टीवी पर समाज के शुभचिंतक
टीवी खोलते ही सामने आने लगे समाज के शुभचिंतक और उन शुभचिंतकों का अपना अपना पॉइंट ऑफ व्यू. कोई कहता ये लव नहीं जिहाद है. कोई कहता, आंकड़े दिखाते हैं कि ये एक सोची समझी साजिश रची जा रही है. लड़कियों को बरगलाया जा रहा है. फिर न्यूज़ एंकरों ने इतनी कड़वाहट फैलाई कि लव कम और जिहाद ज़्यादा हो गया. मुझे भी लगा, इतने लोग जब कह रहे हैं, ऊंची आवाज़ में बोल रहे हैं, तो उनके सोचने के पीछे भी तर्क हैं ही. फिर मेरा दिमाग उसी दिशा में चल पड़ा, जिधर से वो आवाज़ें आ रही थीं. फिर मुख़ालफ़त भरी उन आवाज़ों के चलते कम्पनी ने भी वो ऐड वापिस ले लिया. अब तो मेरा शक यकीन में बदल गया कि, शोर में दम है. अब मेरा दिमाग मेरे गट पर हावी होता जा रहा था.

अंतर्मन की शांत आवाज़ बनाम शोर का दम
फिर मैंने शोर ख़त्म किया. एक बार फिर टीवी के डिबेट्स बंद कर उस पहले पल पर चली गई जब मैंने पहले पहल उस ऐड को फेसबुक पर देखा था. कितने लोगों को वो ऐड पसंद आया था और उसे शेयर किया था. लेकिन धीरे-धीरे लगने लगा कि इसके कारण तल्ख़ियां बढ़ने लगीं. और हमने इन तल्ख़ियों का, कड़वाहट का त्याग करने की बजाय, इसे बाकी समाज में फैला दिया था. अब समझ आने लगा कि जो प्रेम विरोधी हो सकता है वो समाज प्रेमी कैसे हो सकता है?? आखिर समाज तो प्रेम से ही चलता है ना!

अब ये बात पक्की हो गई कि किसी भी चीज को देखने का जो पहला नजरिया होता है, वही सही होता है. यानी प्रथम दृष्टया ही चीजें सही पाई जाती हैं. वो तो बाद में जब हम उन्हें और गहराई से नापने, जोखने और समझने लग जाते हैं, तब कई और दृष्टिकोण सामने आने लग जाते हैं. यानी अब ओपिनियन वाईड भी होती जाती है और कलर्ड भी. खैर, मैं बात कर रही हूं गट फीलिंग की. एक और ऐड में आता है ना, 'दाग अच्छे हैं' वाला. मैं तो कहूंगी, अंतर्मन की आवाज़ भी अच्छी ही होती है.

एंटी लव मैरिज स्क्वाड यानी एंटी वूमेन स्क्वाडये शुभचिंतक दरअसल एंटी लव मैरिज स्क्वाड का हिस्सा हैं. जब इन्हें दो अलग-अलग किस्म के लोगों में प्रेम ही पसन्द नहीं तो उनके बीच शादी कैसे मंज़ूर हो सकती है. जबकि लव का तो बेसिक मूल्य ही है... Opposites attract! जिन लोगों को इस तरह के प्रेम संबंधों से बनी शादियां पसंद नहीं, उन्हें प्रेम भी पसन्द नहीं होगा. वो तो बस एक जैसों में ही, रिश्ता चाहते हैं.

इन शुभचितकों को सिर्फ अलग धर्म वालों के बीच की शादी ही पसन्द नहीं. अलग जातियों के बीच के प्रेम विवाह से भी इन्हें सख़्त परहेज़ है. इन्हें हिजाब/पर्दा पसन्द नहीं. इन्हें फटी जीन्स भी पसंद नहीं. वो लड़कियों के कपड़ों पे कॉमेंट करना, अपना कर्तव्य समझते हैं. क्योंकि लड़कियों को आंकने का एक ही तो पैमाना है उनके पास... उनके कपड़े!


ये नफरती शुभचिंतक, किसी एक धर्म या किसी एक जाति के नहीं होते, ये हर धर्म में, हर जाति में होते हैं. और समाज के ये शोर मचाते शुभचिंतक, समाज के लिए शुभ संकेत बिल्कुल भी नहीं है!

ये वो शुभचिंतक हैं जिन्हें औरत का मन से पहना कपड़ा, उसका मन से किया प्यार और उसके मन से की गई शादी… कुछ पसन्द नहीं आ सकता.

स्पेशल मैरिज एक्ट
स्पेशल मैरिज एक्ट अपने मन की करने की इजाजत देता है. भारत में ज़्यादातर शादियां अलग-अलग धर्मों के क़ानून और 'पर्सनल लॉ' के तहत होती हैं. इसके लिए मर्द और औरत दोनों का उसी धर्म का होना ज़रूरी है. यानी अगर दो अलग-अलग धर्म के लोगों को आपस में शादी करनी हो तो उनमें से एक को धर्म बदलना ही होगा. पर हर व्यक्ति मोहब्बत के लिए अपना धर्म बदलना चाहे, ये ज़रूरी नहीं है. इस के लिए 'स्पेशल मैरिज ऐक्ट' है. स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत अलग-अलग धर्म के मर्द और औरत बिना धर्म बदले क़ानूनन शादी कर सकते हैं.

ये एक्ट धर्मनिरपेक्ष होने के नाते, विवाह की पारंपरिक आवश्यकताओं से लोगों को मुक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इस तरह दो लोगों के लिए अपने संबंधित समुदाय के जनादेश के बाहर शादी करना मुमकिन हो पाता है.

प्रक्रिया
साधारण कोर्ट मैरिज में मर्द और औरत अपने फोटो, 'एड्रेस प्रूफ़', 'आईडी प्रूफ़' और गवाह को साथ ले जाएं तो 'मैरिज सर्टिफ़िकेट' उसी दिन मिल जाता है जबकि ‘स्पैशल मैरिज ऐक्ट' में व़क्त लगता है. इस एक्ट के तहत की जा रही 'कोर्ट मैरिज' में ज़िले के 'मैरिज अफ़सर' यानी एसडीएम के यहां ये सारे दस्तावेज़ जमा किए जाते हैं, जिसके बाद वो एक नोटिस तैयार करते हैं.

इस नोटिस में साफ़-साफ़ लिखा होता है कि किसी को इस शादी से अगर आपत्ति हो तो 30 दिन के अंदर 'मैरिज अफ़सर' को सूचित कर दें. ये नोटिस 30 दिन तक कोर्ट के परिसर में लगा रहता है. इस नोटिस का मक़सद ये है कि शादी करने वाला मर्द या औरत कोई झूठ या फ़रेब के बल पर शादी ना कर पाए और ऐसा कुछ हो तो एक महीने में सच सामने आ जाए. हिंदू मैरिज ऐक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है.

इसीलिए शुक्र है हम राजा महाराजा और सुलतानों वाले हिन्दुस्तान में नहीं, डॉ. आबेडकर के बनाए संविधान और कानून वाले भारत में रह रहे हैं. शुक्र है आज़ाद भारत में प्रेम करने की आज़ादी है और स्पेशल मैरिज एक्ट प्रेमियों को बन्धन में विधिवत बंधने की मज़बूती देता है. जितनी मान्यता चर्च के I do में होती है, जितनी पाकीज़गी से कुबूल है कहा जाता है और जिस पवित्रता से अग्नि के सात फेरे लिए जाते हैं... कुछ उतनी ही मान्यता, दो प्रेमियों के लिए मजिस्ट्रेट के सामने काग़ज़ पर किए हुए दो हस्ताक्षरों की भी होती है. (डिसक्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: October 17, 2020, 10:32 AM IST
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