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    स्टूडेंट ऑफ द सेंच्युरी, मोहन!!

    लंदन प्रवास में मोहन के कुछ और मित्र भी बन गए थे. जैसे प्राणजीवन जगजीवन मेहता. मोहन जब विलायत के लिए घर से निकले थे तो मां की हिदायतें और प्राणजीवन जगजीवन मेहता के नाम एक चिट्ठी लेकर निकले थे. मेहता, चूंकि पहले से ही लंदन में थे, इसलिए मोहन की पहली पहली जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर थी.

    Source: News18Hindi Last updated on: October 2, 2020, 11:19 AM IST
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    स्टूडेंट ऑफ द सेंच्युरी, मोहन!!
    फोटो- PTI
    दिल्ली के संसद मार्ग पर, AIR के भव्य broadcasting हाउस के दरवाज़े के ठीक ऊपर, महात्मा गांधी की एक कही बात लिखी है. वो कहते हैं, "मैं नहीं चाहता कि मेरा घर चारों ओर दीवारों से घिरा रहे. ना मैं अपनी खिड़कियों को ही कस कर बंद रखना चाहता हूं. मैं तो सभी देशों की संस्कृति का अपने घर में बेरोक- टोक संचार चाहता हूं. पर ऐसी संस्कृति के किसी झंकोरे से मेरे पांव उखड़ जाएं, ये मुझे मंज़ूर नहीं. मेरा धर्म, बंदीगृह का धर्म नहीं. ईश्वर के रचे नन्हे से नन्हे जीव के लिए उसमें जगह है. लेकिन जाति, धर्म और वर्ण का दंभ उसे छू भी नहीं सकता."

    ये बोल बापू ने तब कहे थे जब वो महात्मा हो चुके थे. लेकिन महात्मा बनने से कहीं पहले, वो अपने इस कहे पर, अमल करते आ रहे थे. विद्यार्थी के रूप में इसकी शुरुआत, मोहन के लंदन प्रवास से ही हो गई थी. "मोहन से महात्मा तक" का ये सफर बहुत कुछ उनके लंदन प्रवास के पहले अनुभव का ही नतीजा था. दरअसल उन्नीसवीं सदी के अंत का वो लंदन, मोहन के 19 साल के उस युवा मस्तिष्क के क्रमिक विकास के लिए एक बेहतरीन मंज़िल साबित हुआ. पूरा शहर मानो उनके लिए एक यूनिवर्सिटी हो गया. हर व्यक्ति से सीखा, हर अनुभव से प्रेरणा ली. त्याग, धर्म, minimalism यानी अतिसूक्ष्मवाद, शाकाहार और गीता लंदन की धरती से ही उनके व्यक्तित्व का एक अभिन्न अंग बने. 19 से 20 साल की उम्र में ये सब उनके लिए इसलिए संभव हो पाया, क्योंकि उस छोटी उम्र में भी मोहन ने अपने दिमाग की खिड़की दरवाज़े खुले रखने की कोशिश की थी. इस कोशिश की शुरुआत 4 सितम्बर 1888 से हुई थी.

    यात्रा
    4 सितम्बर 1888 में 19 साल के मोहन ने बॉम्बे से इंग्लैंड जाने वाला SS Clyde नामक एक जहाज़ बोर्ड किया. ये सफर, आने वाले समय में ना सिर्फ उनको, बल्कि उनके पूरे समाज को एक नई दिशा देने वाला था. लंदन, वो बैरिस्टर बनने का ख्वाब ले के जा रहे थे. पर बैरिस्टरी के अलावा वापिस लाए, कुछ जीवन भर साथ रहने वाली आदतें, कुछ कभी ना भूलने वाले मूल्य और बहुत से ज़रूरी अनुभव!! लेकिन बात करते हैं पहले उनके दोस्तों की…
    जब मोहन ने सीखी फ़्रेंच, लैटिन और अंग्रेजी
    SS Clyde नाम के जहाज पर ही सवार हो एक और शख्स, मोहन के साथ इंग्लैंड आए थे त्रियंबक राय मजूमदार. दोनों में काफ़ी अच्छी दोस्ती हो गई थी. मजूमदार भांप गए कि मोहन अंग्रेजी बोलने में कमज़ोर हैं. उन्होंने मोहन को समझाया कि उन्हें खूब अंग्रेजी बोलनी चाहिए, गलतियों की परवाह किए बगैर. उन्हें अंग्रेजी बोलने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहिए. त्र्यंबक राय मिलनसार थे और मोहन बेहद शर्मीले. मजूमदार की हिदायतों का कुछ असर तो मोहन पर हुआ पर मोहनदास की हिचक, वो ना जा पाई. वो बात और है कि मोहन की अंग्रेजी बोलने और सीखने की कोशिश, अंग्रेजी तौर-तरीकों को सीखने की ललक, लंदन में निरंतर जारी रही. इसीलिए अब मोहन ने अपनी कानून की पढ़ाई के साथ फ़्रेंच, लैटिन और अंग्रेज़ी सीखने के लिए London matriculation में भी enrollment ले लिया था.

    अब मोहन अखबार पढ़ने लगे थेलंदन प्रवास में मोहन के कुछ और मित्र भी बन गए थे. जैसे प्राणजीवन जगजीवन मेहता. मोहन जब विलायत के लिए घर से निकले थे तो मां की हिदायतें और प्राणजीवन जगजीवन मेहता के नाम एक चिट्ठी लेकर निकले थे. मेहता, चूंकि पहले से ही लंदन में थे, इसलिए मोहन की पहली पहली जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर थी. मेहता, मोहन के गाइड हो गए थे. उन्होंने ही मोहन को समझाया कि लंदन प्रवास में उन्हें अंग्रेज़ियत सीखनी चाहिए, जिसके लिए उन्हें किसी अंग्रेज परिवार के साथ रहना चाहिए. अब ऐसे परिवार को खोजने का काम किया उनके एक और मित्र दलपतराम शुक्ला ने.

    दलपतराम शुक्ला ने मेहता के बताए अनुसार मोहन के रहने का इंतजाम, ऐसे ही एक परिवार के साथ किया. शुक्ला सौराष्ट्र के ही रहने वाले थे और उन्होंने वेस्ट केनसिंगटन में मोहन के रहने का प्रबंध कर दिया. मोहन ने लंदन जाने से पहले अख़बार नहीं पढ़ी थी. दलपतराम शुक्ला वो शख्स थे जिन्होंने मोहन को लंदन प्रवास के दौरान अखबार पढ़ना सिखाया. उन्हें अख़बार की आदत डाली और फिर मोहन को अखबार पढ़ने का ऐसा चस्का लगा कि वह चस्का ताउम्र रहा.


    नया देस, नया भेस और डांस क्लास
    मोहन के इंग्लिश जेंटलमैन बनने के रास्ते में उनके मुंबई कट वाले कपड़े रोड़ा अटका रहे थे. तो एक दिन मोहन, आर्मी और नेवी के स्टोर में चले गए. वहां उन्होंने पूरे 10 पाउंड खर्च करके अपने लिए नया इवनिंग सूट खरीदा. लेकिन जेंटलमैन बनने का ख्वाब बिना नृत्य और संगीत सीखे कैसे पूरा होता? इसलिए मोहन ने लंदन में डांस क्लासेस ज्वॉइन कर लीं. क्लासेस के लिए उन्होंने 3 पाउंड की डाउन पेमेंट भी कर दी थी. मोहन, तीन हफ्तों में 6 क्लासेज ही ले पाए थे कि उन्हें समझ आ गया कि नृत्य के लिए जो लचक और बेबाकी चाहिए, वो उनमें नहीं थी.

    संगीत/वायलिन

    खैर, नृत्य ना सही संगीत ही सही. मोहन ने नृत्य छोड़ अब वायलिन सीखना शुरू किया. संगीत की क्लास ज्वॉइन की, उसकी फीस जमा की और 3 पाउंड, एक वॉयलेन में भी इन्वेस्ट कर दिए. मोहन ने नृत्य से अब संगीत की दिशा में कदम बढ़ा दिए थे. लेकिन तीन ही महीने में उन्हें समझ आ गया था कि वो एक मृगतृष्णा में फंस रहे हैं. समझ आते ही उन्होंने नृत्य और संगीत, दोनों की क्लासेस छोड़ दीं….नृत्य और संगीत सीखने की उनकी ललक और फिर दोनों का त्याग, दिखाता है कि 19 से 21साल के मोहन ने दिमाग और सोच के दरवाज़े तो खोल रखे थे, पर उन्हें अपनी हदें भी समझ आ रहीं थीं. अपनी हदों को वो अपनाना भी सीख रहे थे. साथ ही मजबूती से पैर कहां और किस संस्कृति में रखने हैं, उन्हें ये एहसास भी धीरे धीरे हो रहा था. हां, इवनिंग सूट और अंग्रेजी कपड़ों का त्याग करना, अभी उनके लिए बाकी था. उस रिलाइजेशन के लिए उन्हें अभी एक लंबा सफ़र और तय करना बाकी था.

    मोहन की किताबी प्रेरणा
    1...Henry Stephens Salt's "Plea for Vegetarianism"
    मोहन का लंदन प्रवास मां के वचन से बंधा हुआ था. विदेशी धरती पर, शाकाहारी होने के कारण उन्हें तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ता था. कई बार भूखे भी रहना पड़ता था. इसी कशमकश में एक दिन उन्हें एक bookstore पर एक किताब दिखी "Plea for Vegetarianism". किताब सेल पर थी, जिसे उन्होंने 1 शिलिंग में तुरन्त खरीद लिया. इस किताब ने मोहन के मन मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ी. यहां तक कि कुछ ही दिनों में मोहन ने, Vegetarian Society of London की मेंबरशिप भी ले ली और जल्दी ही उसकी executive committee में भी दाख़िल हो गए. इस तरह मां के शाकाहार वाले विश्वास को Salt की इस किताब से theoretical सपोर्ट मिल गई थी. Henry Stephens Salt की इस किताब और Vegetarian Society of London ने, मोहन को अब जीवन भर के लिए मन कर्म वचन से, शाकाहारी बना दिया था. याद रहे ये सब प्रयोग, मोहन, 19 से 21 साल की उम्र में ही कर रहे हैं. इस छोटी उम्र वाले मोहन के प्रयोग, आज की 19 से 21 तक की पीढ़ी के लिए भी एक सबक हैं.

    2…Sir Edwin Arnold's The Song Celestial
    यही वो जगह थी और यही वो उम्र जिसमें मोहन की मुलाक़ात एक दिन Theosophical Society के दो मेंबर्स से होती है. दोनों भाई थे, दोनों कुंवारे थे और दोनों आध्यात्म की दुनिया से जुड़े थे. उन्होंने मोहन को Sir Edwin Arnold की अंग्रेज़ी में अनुवादित गीता पढ़ने को दी. फिर तीनों के लिए रोज़ाना शाम को गीता पढ़ना, एक क्रम बन जाता है. इस तरह मोहन के जीवन में भागवत गीता हमेशा के लिए शामिल हो जाती है.

    3…Sir Edwin Arnold's Light of Asia
    मोहन तो सब कुछ पढ़ना चाहते थे. वो किसी एक सोच में सीमित नहीं होना चाहते थे. इसमें भी उन दोनों भाइयों ने मोहन की मदद की और Sir Edwin Arnold की ही Light of Asia पढ़ने को कहा. महात्मा बुद्ध पर लिखी 'Light of Asia' तो मोहन ने पढ़ी ही, उन्होंने बाइबल भी पढ़ी और बाकी के धर्म ग्रंथ भी. मोहन को Old Testament की बजाय New Testament ने प्रेरित किया. सब धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन करने के बाद, 19 से 21 बरस वाले इस मोहन ने निष्कर्ष निकाला कि त्याग ही धर्म है. सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं है. सत्य ही हर धर्म की पहचान है.

    कुल मिला के हम कह सकते हैं कि, मोहन का जीवन, मोहन की सीख, उनके अकेले के लिए नहीं हैं. खिड़की दरवाज़े खुले रखने का उनका मशवरा, सिर्फ 19 से 21 साल के आयु वर्ग के लिए ही नहीं है. सबके लिए है. याद रखें, जीवन में कुछ स्थाई नहीं होता है. विचार भी नहीं, विचारधारा भी नहीं. हर नया दिन अपने साथ एक नया मौका ले के आता है. कुछ नया जानने और नया सीखने के लिए. हर नई सीख हमारे व्यक्तित्व को कुछ और संवारती है. हमें बीते कल से थोड़ा और बेहतर बनाती है. महात्मा ना सही, हमें एक बेहतर इंसान ज़रूर बनाती है.
    ब्लॉगर के बारे में
    ज्योत्स्ना तिवारी

    ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

    ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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    First published: October 2, 2020, 11:19 AM IST
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